देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 759, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 759
| ७५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ७<br>न सुखं कृतवैरस्य भवतीति विनिर्णयः।<br>संग्रामरसिकाः शूराः प्रशंसन्ति न पण्डिताः॥ ८<br>युद्धं शृङ्गारचतुरा इन्द्रियार्थविघातकम्।<br>पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः॥ ९ | इस संसारमें सुख ही ग्राह्य है और दुःख सर्वथा त्याज्य है—यही परम्परा है। वैर करनेवालेको सुख नहीं प्राप्त होता, यह निश्चित सिद्धान्त है। इसलिये युद्धप्रेमी वीर इन्द्रिय सुखको नष्ट करनेवाले युद्धकी प्रशंसा करते हैं, किंतु शृंगाररसके प्रेमी विद्वान् उसकी प्रशंसा नहीं करते। पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंकी तो बात ही क्या?॥ ७–९॥ |
| युद्धे विजयसन्देहो निश्चयं बाणताडनम्।<br>दैवाधीनमिदं विश्वं तथा जयपराजयौ॥ १०<br>दैवाधीनाविति ज्ञात्वा न योद्धव्यं कदाचन।<br>कालेऽथ भोजनं स्नानं शय्यायां शयनं तथा॥ ११<br>परिचर्यापरा भार्या संसारे सुखसाधनम्।<br>किं सुखं युध्यतः संख्ये बाणवृष्टिभयङ्करे॥ १२<br>खड्गपातातिरौद्रे च तथारातिसुखप्रदे।<br>संग्रामे मरणात्स्वर्गसुखप्राप्तिरिति स्फुटम्॥ १३ | युद्धमें विजय ही हो—यह सन्देहास्पद है, परंतु उसमें बाणोंसे शरीरको पीड़ा प्राप्त होना निश्चित है। यह समस्त विश्व दैवके अधीन है, उसी प्रकार जय-पराजय भी उसीके अधीन हैं। अतः इन्हें दैवाधीन जानकर युद्ध कभी नहीं करना चाहिये। समयपर स्नान, भोजन, शय्यापर शयन और सेवा-परायण पत्नी—ये ही संसारमें सुखके साधन हैं। बाणवर्षासे भयंकर, खड्ग-प्रहारसे अत्यन्त रौद्र तथा शत्रुको सुख प्रदान करनेवाले संग्राममें युद्ध करनेसे क्या सुख प्राप्त हो सकता है?॥ १०–१२½॥ |
| प्रलोभनपरं वाक्यं नोदनार्थं निरर्थकम्।<br>छित्त्वा देहं व्यथां प्राप्य शृगालकरटादिभिः॥ १४<br>पश्चात्स्वर्गसुखावाप्तिं को वा वाञ्छति मन्दधीः।<br>सख्यं भवतु ते वृत्र शक्रेण सह नित्यदा॥ १५ | ऐसा स्पष्ट कथन है कि युद्धमें मरनेसे स्वर्ग-सुखकी प्राप्ति होती है—यह तो प्रलोभन और प्रेरणा देनेवाला तथा निरर्थक वचन है। ऐसा कौन मन्दबुद्धि है जो शरीरको अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल कराकर सियार और कौओंसे नोचवाकर स्वर्गसुखकी प्राप्तिकी कामना करेगा!॥ १३-१४½॥ |
| अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रश्चापि निरन्तरम्।<br>वयं च तापसाः सर्वे गन्धर्वाश्च निजाश्रमे॥ १६<br>सुखवासं गमिष्यामः शान्ते वैरेऽधुनैव वाम्।<br>संग्रामे युवयोर्धीर वर्तमाने दिवानिशम्॥ १७<br>पीड्यन्ते मुनयः सर्वे गन्धर्वाः किन्नरा नराः।<br>सर्वेषां शान्तिकामनां सख्यमिच्छामहे वयम्॥ १८ | हे वृत्र! इन्द्रके साथ तुम्हारी स्थायी मैत्री हो जाय, जिससे तुम्हें और इन्द्र—दोनोंको निरन्तर सुखकी प्राप्ति हो। आप दोनोंका वैर शान्त हो जानेसे हम सब तपस्वी और गन्धर्वगण भी अपने-अपने आश्रमोंमें सुखपूर्वक रह सकेंगे। हे धीर! आप दोनोंके दिन-रातके युद्धमें हम सभी मुनियों, गन्धर्वों, किन्नरों और मनुष्योंको कष्ट प्राप्त होता है। सभी लोगोंको शान्ति प्राप्त हो सके—इस कामनासे हम सब आप दोनोंमें मैत्री कराना चाहते हैं॥ १५–१८॥ |
| मुनयस्त्वं च शक्रश्च प्राप्नुवन्तु सुखं किल।<br>मध्यस्थाश्च वयं वृत्र युवयोः सख्यकारणे॥ १९<br>शपथं कारयित्वात्र योजयामो मिथः प्रियम्।<br>शक्रस्तु शपथान्कृत्वा यथोक्तांश्च तवाग्रतः॥ २० | हे वृत्र! मुनिगण, तुम्हें और इन्द्रको सुख प्राप्त हो। हमलोग तुम दोनोंकी मित्रता करानेमें मध्यस्थ बनेंगे। हम शपथ कराकर आप दोनोंको एक-दूसरेका प्रिय मित्र बना देंगे। आप जैसा कहेंगे, वैसे ही इन्द्र भी आपके सम्मुख शपथ लेकर आपके मनको प्रेमसे |