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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished889 pages

अथ दशमोऽध्यायः

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| अ० १० ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७१ | | :--- | :--- |

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अथ दशमोऽध्यायः

कर्मकी गहन गतिका वर्णन तथा इस सम्बन्धमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका उदाहरण

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>कथितं चरितं ब्रह्मञ्छक्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>स्थानभ्रंशस्तथा दुःखप्राप्तिरुक्ता विशेषतः॥ १<br>यत्र देवाधिदेव्याश्च महिमातीव वर्णितः।<br>सन्देहोऽत्र ममाप्यस्ति यच्छक्रोऽपि महातपाः॥ २जनमेजय बोले—हे ब्रह्मन्! आपने अद्भुत कर्म करनेवाले इन्द्रका आख्यान कहा, जिसमें उनके पदच्युत होने और दुःख प्राप्त करनेका विशेषरूपसे वर्णन किया गया है तथा जिसमें देवताओंकी भी अधीश्वरी देवी भगवतीकी महिमा विस्तारसे वर्णित हुई है॥ १ १/२ ॥
देवाधिपत्यमासाद्य दुःसहं दुःखमन्वभूत्।<br>मखानां तु शतं कृत्वा प्राप्तं स्थानमनुत्तमम्॥ ३<br>देवेशत्वं च सम्प्राप्य भ्रष्टः स्थानादसौ कथम्।<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व कारणं करुणानिधे॥ ४मुझे महान् सन्देह है कि महान् तपस्वी इन्द्रको देवाधिपतिका पद प्राप्त होनेपर भी दारुण दुःख प्राप्त हुआ। सौ यज्ञ करके उन्होंने अतिश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया; और देवताओंके स्वामीका पद प्राप्त करके भी वे अपने स्थानसे कैसे च्युत हो गये?॥ २-३ १/२ ॥
सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ पुराणानां प्रवर्तकः।<br>नावाच्यं महतां किञ्चिच्छिष्ये च श्रद्धयान्विते॥ ५<br>तस्मात्कुरु महाभाग मत्सन्देहापनोदनम्।हे दयानिधे! इस सबका कारण सम्यक् रूपसे बताइये। हे मुनिश्रेष्ठ! आप सब कुछ जाननेवाले और पुराणोंके प्रवर्तक हैं, महापुरुषोंके लिये अपने श्रद्धालु शिष्यसे कुछ भी अकथ्य नहीं होता, इसलिये हे महाभाग! मेरे सन्देहका निवारण कीजिये॥ ४-५ १/२ ॥
सूत उवाच<br>इति पृष्टः स राज्ञा वै तदा सत्यवतीसुतः॥ ६<br>तमाहातिप्रसन्नात्मा यथानुक्रममुत्तरम्।सूतजी बोले—तब राजाके ऐसा पूछनेपर सत्यवतीपुत्र वेदव्यासजी प्रसन्नतापूर्वक उनके प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर देने लगे॥ ६ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ कारणं परमाद्भुतम्॥ ७<br>कर्मणस्तु त्रिधा प्रोक्ता गतिस्तत्त्वविदां वरैः।<br>सञ्चितं वर्तमानं च प्रारब्धमिति भेदतः॥ ८<br>अनेकजन्मस्सञ्जातं प्राक्तनं सञ्चितं स्मृतम्।<br>सात्त्विकं राजसं कर्म तामसं त्रिविधं पुनः॥ ९व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इसका अत्यन्त अद्भुत कारण सुनो। श्रेष्ठ तत्त्वज्ञानियोंने संचित, वर्तमान और प्रारब्धके भेदसे कर्मकी तीन गतियाँ बतलायी हैं। अनेक जन्मोंका संचित प्राक्तन कर्म संचित-कर्म कहा गया है; फिर वे कर्म भी सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकारके होते हैं॥ ७—९॥
शुभं वाप्यशुभं भूप सञ्चितं बहुकालिकम्।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं सुकृतं दुष्कृतं तथा॥ १०<br>जन्मजन्मनि जीवानां सञ्चितानां च कर्मणाम्।<br>निःशेषस्तु क्षयो नाभूत्कल्पकोटिशतैरपि॥ ११हे राजन्! बहुत समयके संचित शुभ या अशुभ कर्म पुण्य या पापके रूपमें अवश्य ही भोगने पड़ते हैं। जीवोंके प्रत्येक जन्मके संचित कर्म बिना भोग किये करोड़ों कल्पोंमें भी नहीं नष्ट होते॥ १०-११॥
क्रियमाणं च यत्कर्म वर्तमानं तदुच्यते।<br>देहं प्राप्य शुभं वापि ह्यशुभं वा समाचरेत्॥ १२<br>सञ्चितानां पुनर्मध्यात्समाहृत्य कियान्किल।<br>देहारम्भे च समये कालः प्रेरयतीव तत्॥ १३जो कर्म किया जा रहा है, उसे वर्तमान कहा जाता है, जीव देह प्राप्तकर शुभ या अशुभ कार्यमें प्रवृत्त होता है। संचित कर्मोंके कारण देह प्राप्त होनेपर काल जीवको पुनः कर्मके लिये प्रेरित करता है॥ १२-१३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 C

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| ७७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |

| प्रारब्धं कर्म विज्ञेयं भोगात्तस्य क्षयः स्मृतः।<br>प्राणिभिः खलु भोक्तव्यं प्रारब्धं नात्र संशयः ॥ १४<br><br>पुरा कृतानि राजेन्द्र ह्यशुभानि शुभानि च।<br>अवश्यमेव कर्माणि भोक्तव्यानीति निश्चयः ॥ १५<br><br>देवैर्मनुष्यैरसुरैर्यक्षगन्धर्वकिन्नरैः ।<br>कर्मैव हि महाराज देहारम्भस्य कारणम् ॥ १६ | प्रारब्ध कर्म उसे जानना चाहिये, जिसका भोगसे क्षय हो जाता है। प्राणियोंको यहाँ प्रारब्ध कर्म अवश्य भोगना पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे राजेन्द्र! देवता, मनुष्य, असुर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—इन सभीको पूर्वकालमें किये गये शुभ-अशुभ कर्मोंका फल भोगना पड़ता है—यह निश्चित है। हे महाराज! सबके देह-धारणका कारण उनका कर्म ही होता है। कर्मके समाप्त हो जानेपर प्राणियोंका जन्म लेना भी समाप्त हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं है॥ १४–१६ १/२ ॥ | | कर्मक्षये जन्मनाशः प्राणिनां नात्र संशयः।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र इन्द्राद्याश्च सुरास्तथा ॥ १७<br><br>दानवा यक्षगन्धर्वाः सर्वे कर्मवशाः किल।<br>अन्यथा देहसम्बन्धः कथं भवति भूपते ॥ १८<br><br>कारणं यस्तु भोगस्य देहिनः सुखदुःखयोः।<br>तस्मादनेकजन्मोत्थसञ्चितानां च कर्मणाम् ॥ १९<br><br>मध्ये वेगः समायाति कस्यचित्कालपाकतः।<br>तत्प्रारब्धवशात्पुण्यं करोति च यथा तथा ॥ २० | हे राजन्! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि देवता, दानव, यक्ष और गन्धर्व—ये सभी कर्मके वशीभूत हैं, अन्यथा जीवके सुख-दुःखमें भोगका जो कारणरूप देहसम्बन्ध है वह कैसे होता? इसीलिये किसी कालविपाकके योगसे यथासमय अनेक जन्मोंमें किये हुए संचित कर्मोंका प्रभाव प्रकट हो जाता है। उसी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ही मनुष्य पुण्य या पाप करता है, उसी प्रकार देवता आदि भी करते हैं॥ १७–२० १/२ ॥ | | पापं करोति मनुजस्तथा देवादयोऽपि च।<br>तथा नारायणो राजन्नरश्च धर्मजावुभौ ॥ २१<br><br>जातौ कृष्णार्जुनौ काममंशौ नारायणस्य तौ।<br>पुराणपीठिकेयं वै मुनिभिः परिकीर्तिता ॥ २२ | हे राजन्! भगवान् विष्णुके अंशसे धर्मपुत्र नर और नारायण ही कृष्ण और अर्जुनके रूपमें प्रकट हुए। मुनियोंके द्वारा इस पौराणिक आख्यानका विवेचन किया गया है॥ २१–२२ ॥ | | देवांशः स तु विज्ञेयो यो भवेद्विभवाधिकः।<br>नानृषिः कुरुते काव्यं नारुद्रो रुद्रमर्चते ॥ २३<br><br>नादेवांशो ददात्यन्नं नाविष्णुः पृथिवीपतिः।<br>इन्द्रादग्नेर्यमाद्विष्णोर्धनदादिति भूपते ॥ २४<br><br>प्रभुत्वं च प्रभावं च कोपं चैव पराक्रमम्।<br>आदाय क्रियते नूनं शरीरमिति निश्चयः ॥ २५ | जो अधिक वैभवशाली होता है उसे देवांश जानना चाहिये। जो ऋषि नहीं है वह काव्यकी रचना नहीं कर सकता; जो रुद्र नहीं है वह रुद्रकी अर्चना नहीं कर सकता। जिसमें देवांश नहीं है वह अन्नदान नहीं कर सकता और जिसमें विष्णुका अंश नहीं है वह राजा नहीं हो सकता। हे राजन्! विष्णु, इन्द्र, अग्नि, यम और कुबेरसे प्रभुत्व, प्रभाव, कोप और पराक्रम प्राप्त करके ही निश्चितरूपसे यह शरीर बनता है॥ २३–२५ ॥ | | यः कश्चिद्बलवाँल्लोके भाग्यवानथ भोगवान्।<br>विद्यावान्दानवान्वापि स देवांशः प्रपठ्यते ॥ २६ | इस संसारमें जो कोई बलवान्, भाग्यवान्, भोगवान्, विद्यावान् या दानशील है, उसे देवांश कहा जाता है॥ २६ ॥ | | तथैवैते मयाख्याताः पाण्डवाः पृथिवीपते।<br>देवांशो वासुदेवोऽपि नारायणसमद्युतिः ॥ २७ | हे राजन्! उसी प्रकार मैंने पाण्डवोंको भी देवांश बताया था। वासुदेव श्रीकृष्ण तो नारायणके अंश और उन्हींके समान कान्तियुक्त थे॥ २७ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—25 D

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अ० १० ]षष्ठ स्कन्ध७७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरं प्राणिनां नूनं भाजनं सुखदुःखयोः।<br>शरीरी प्राप्नुयात्कामं सुखं दुःखमनन्तरम्॥ २८प्राणियोंका शरीर सुख-दुःखका भाजन होता है; शरीरधारी सुख-दुःख प्राप्त करता रहता है॥ २८॥
देही नास्ति वशः कोऽपि दैवाधीनः सदैव हि।<br>जननं मरणं दुःखं सुखं प्राप्नोति चावशः॥ २९कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है, बल्कि सदैव दैवके अधीन रहता है। वह विवश होकर जन्म, मरण, सुख तथा दुःख प्राप्त करता है॥ २९॥
पाण्डवास्ते वने जाताः प्राप्तास्तु स्वगृहं पुनः।<br>स्वबाहुबलतः पश्चाद्राजसूयं क्रतूत्तमम्॥ ३०<br>वनवासं पुनः प्राप्ता बहुदुःखकरं परम्।<br>अर्जुनेन तपस्तप्तं दुष्करं ह्यजितेन्द्रियैः॥ ३१<br>सन्तुष्टैस्तु सुरैर्दत्तं वरदानं पुनः शुभम्।<br>नरदेहकृतं पुण्यं क्व गतं वनवासजम्॥ ३२<br>नरदेहे तपस्तप्तं चोग्रं बदरिकाश्रमे।<br>नार्जुनस्य शरीरे तत्फलदं सम्बभूव ह॥ ३३दैववश ही पाण्डव वन गये और पुनः उन्होंने अपना राज्य प्राप्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने बाहुबलसे राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किया और बादमें अत्यन्त दुःखदायक वनवास उन्हें पुनः प्राप्त हुआ। वहाँ अर्जुनने अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुष्कर तपस्या की। तब [उस तपस्यासे] सन्तुष्ट होकर देवताओंने उन्हें कल्याणकारी वरदान दिया। उस वनवास और नरावतारमें किया गया पुण्य कहाँ गया ? नरावतारमें उन्होंने बदरिकाश्रममें उग्र तपस्या की थी, परंतु अर्जुनके रूपमें उन्हें उस तपस्याका फल नहीं मिला!॥ ३०—३३॥
प्राणिनां देहसम्बन्धे गहना कर्मणो गतिः।<br>दुर्ज्ञेया सर्वथा दैवर्मानवानां तु का कथा॥ ३४प्राणियोंके देह-सम्बन्धी कर्मोंकी गति अत्यन्त गहन है; यह देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय है तो मनुष्योंकी क्या बात !॥ ३४॥
वासुदेवोऽपि सञ्जातः कारागारेऽतिसङ्कटे।<br>नीतोऽसौ वसुदेवेन नन्दगोपस्य गोकुलम्॥ ३५<br>एकादशैव वर्षाणि संस्थितस्तत्र भारत।<br>पुनः स मथुरां गत्वा जघानोग्रसुतं बलात्॥ ३६<br>मोचयामास पितरौ बन्धनाद् भृशदुःखितौ।<br>उग्रसेनं च राजानञ्चकार मथुरापुरे॥ ३७<br>जगाम द्वारवत्यां स म्लेच्छराजभयात्पुनः।<br>सर्वं भाविवशात्कृष्णः कृतवान्पौरुषं महत्॥ ३८वासुदेव श्रीकृष्ण भी अत्यन्त संकटमय कारागारमें उत्पन्न हुए और वसुदेवके द्वारा गोकुलमें नन्दगोपके घर ले जाये गये। हे भारत! वे वहाँ ग्यारह वर्षतक रहे और पुनः मथुरा जाकर उन्होंने बलपूर्वक उग्रसेनके पुत्र कंसका वध किया। तदनन्तर अत्यन्त दुःखित माता-पिताको बन्धनसे मुक्त किया तथा उग्रसेनको मथुरापुरीका राजा नियुक्त किया। पुनः वे म्लेच्छराज कालयवनके भयसे द्वारका चले गये। श्रीकृष्णने यह सब महान् पराक्रम दैवके अधीन होकर ही किया॥ ३५—३८॥
कृत्वा कार्याण्यनेकानि द्वारवत्यां जनार्दनः।<br>देहं त्यक्त्वा प्रभासे तु सकुदुम्बो दिवं गतः॥ ३९<br>पुत्राः पौत्राश्च सुहृदो भ्रातरो जामयस्तथा।<br>प्रभासे यादवाः सर्वे विप्रशापात्क्षयं गताः॥ ४०<br>एवं ते कथिता राजन् कर्मणो गहना गतिः।<br>वासुदेवोऽपि व्याधस्य बाणेन निधनं गतः॥ ४१वे जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारकामें अनेक कार्य करके और प्रभासक्षेत्रमें देहका परित्यागकर अपने कुटुम्बसहित स्वर्ग चले गये। विप्रशापके कारण समस्त यादवगण पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, भाइयों और बहनोंसहित प्रभासक्षेत्रमें नष्ट हो गये और वासुदेव श्रीकृष्ण भी व्याधके बाणसे निधनको प्राप्त हुए। हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे कर्मकी गहन गतिका वर्णन कर दिया॥ ३९—४१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
कर्मणां गहनगतिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

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७७४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

युगधर्म एवं तत्सम्बन्धी व्यवस्थाका वर्णन

जनमेजय उवाचजनमेजय बोले—
भारावतारणार्थाय कथितं जन्म कृष्णयोः।<br>संशयोऽयं द्विजश्रेष्ठ हृदये मम तिष्ठति॥ १<br><br>पृथिवी गोस्वरूपेण ब्रह्माणं शरणं गता।<br>द्वापरान्तेऽतिदीनार्ता गुरुभारप्रपीडिता॥ २हे द्विजश्रेष्ठ! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलराम और श्रीकृष्णके अवतारकी बात आपने कही, किंतु मेरे मनमें एक संशय है॥ १॥<br><br>द्वापरयुगके अन्तमें अत्यन्त दीन तथा आतुर होकर भारी बोझसे दबी हुई पृथ्वी गौका रूप धारण करके ब्रह्माजीकी शरणमें गयी॥ २॥
वेधसा प्रार्थितो विष्णुः कमलापतिरीश्वरः।<br>भूभारोत्तारणार्थाय साधूनां रक्षणाय च॥ ३<br><br>भगवन् भारते खण्डे देवैः सह जनार्दन।<br>अवतारं गृहाणाशु वसुदेवगृहे विभो॥ ४तब ब्रह्माजीने लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुसे प्रार्थना की—‘हे भगवन्! हे विभो! हे जनार्दन! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये और साधुजनोंकी रक्षाके लिये आप देवताओंके साथ भारतवर्षमें वसुदेवके घरमें शीघ्र ही अवतार लीजिये’॥ ३-४॥
एवं सम्प्रार्थितो धात्रा भगवान्देवकीसुतः।<br>बभूव सह रामेण भूभारोत्तारणाय वै॥ ५<br><br>कियानुत्तारितो भारो हत्वा दुष्टाननेकprimary:शः।<br>ज्ञात्वा सर्वान्दुराचारान्यापबुद्धिन्नृपानिह॥ ६ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये बलरामके साथ देवकीके पुत्र हुए; तब उन्होंने अनेक दुष्टों तथा सभी दुराचारी और पापबुद्धि राजाओंको ज्ञात करके उन्हें मारकर पृथ्वीका कितना भार उतारा?॥ ५-६॥
हतो भीष्मो हतो द्रोणो विराटो द्रुपदस्तथा।<br>बाह्लीकः सोमदत्तश्च कर्णो वैकर्तनस्तथा॥ ७<br><br>यैर्लुण्ठितं धनं सर्वं हृताश्च हरियोषितः।<br>कथं न नाशिता दुष्टा ये स्थिताः पृथिवीतले॥ ८<br><br>आभीराश्च शका म्लेच्छा निषादाः कोटिशस्तथा।<br>भारावतरणं किं तत्कृतं कृष्णेन धीमता॥ ९<br><br>सन्देहोऽयं महाभाग न निवर्तति चित्ततः।<br>कलावस्मिन्प्रजाः सर्वाः पश्यतः पापनिश्चयाः॥ १०भीष्म मारे गये, द्रोणाचार्य मारे गये; इसी प्रकार विराट, द्रुपद, बाह्लीक, सोमदत्त और सूर्यपुत्र कर्ण मारे गये। परंतु जिन्होंने कृष्णकी पत्नियोंका हरण किया और उनका सारा धन लूट लिया, उन दुष्टोंको तथा जो करोड़ों आभीर, शक, म्लेच्छ और निषाद पृथ्वीतलपर स्थित थे—उन सबको उन्होंने नष्ट क्यों नहीं कर दिया? तब उन बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पृथ्वीका कौन-सा भार उतार दिया! हे महाभाग! मेरे चित्तसे यह सन्देह नहीं हटता है; इस कलियुगमें तो समस्त प्रजा पापपरायण ही दिखायी देती है॥ ७—१०॥
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
राजन् यस्मिन्युगे यादृक्प्रजा भवति कालतः।<br>नान्यथा तद्भवेन्नूनं युगधर्मोऽत्र कारणम्॥ ११हे राजन्! जैसा युग होता है, कालप्रभावसे प्रजा भी वैसी ही होती है, इसके विपरीत नहीं होता; इसमें युगधर्म ही कारण है॥ ११॥
ये धर्मरसिका जीवास्ते वै सत्ययुगेऽभवन्।<br>धर्मार्थरसिका ये तु ते वै त्रेतायुगेऽभवन्॥ १२<br><br>धर्मार्थकामरसिका द्वापरे चाभवन्युगे।<br>अर्थकामपराः सर्वे कलावस्मिन्भवन्ति हि॥ १३जो धर्मानुरागी जीव हैं, वे सत्ययुगमें हुए; जो धर्म और अर्थसे प्रेम रखनेवाले प्राणी हैं, वे त्रेतायुगमें हुए; धर्म, अर्थ और कामके रसिक प्राणी द्वापरयुगमें हुए और अर्थ तथा काममें आसक्ति रखनेवाले सभी प्राणी इस कलियुगमें होते हैं॥ १२-१३॥
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| अ० ११ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
युगधर्मस्तु राजेन्द्र न याति व्यत्ययं पुनः।<br>कालः कर्तास्ति धर्मस्य ह्यधर्मस्य च वै पुनः॥ १४हे राजेन्द्र! युगधर्मका प्रभाव विपरीत नहीं होता है; काल ही धर्म और अधर्मका कर्ता है॥ १४॥
राजोवाच<br>ये तु सत्ययुगे जीवा भवन्ति धर्मतत्पराः।<br>कुत्र तेऽद्य महाभाग तिष्ठन्ति पुण्यभागिनः॥ १५<br>त्रेतायुगे द्वापरे वा ये दानव्रतकारकाः।<br>वर्तन्ते मुनयः श्रेष्ठाः कुत्र ब्रूहि पितामह॥ १६<br>कलावद्य दुराचारा येऽत्र सन्ति गतत्रपाः।<br>आद्ये युगे क्व यास्यन्ति पापिष्ठा देवनिन्दकाः॥ १७<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते।<br>सर्वथा श्रोतुकामोऽस्मि यदेतद्धर्मनिर्णयम्॥ १८राजा बोले—हे महाभाग! सत्ययुगमें जो धर्मपरायण प्राणी हुए हैं, वे पुण्यशाली लोग इस समय कहाँ स्थित हैं? हे पितामह! त्रेतायुग या द्वापरमें जो दान तथा व्रत करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हुए हैं, वे अब कहाँ विद्यमान हैं; मुझे बतायें। इस कलियुगमें जो दुराचारी, निर्लज्ज, देवनिन्दक और पापी लोग विद्यमान हैं, वे सत्ययुगमें कहाँ जायेंगे? हे महामते! यह सब विस्तारपूर्वक कहिये; मैं इस धर्मनिर्णयके विषयमें सब कुछ सुनना चाहता हूँ॥ १५—१८॥
व्यास उवाच<br>ये वै कृतयुगे राजन् सम्भवन्तीह मानवाः।<br>कृत्वा ते पुण्यकर्माणि देवलोकान्व्रजन्ति वै॥ १९व्यासजी बोले—हे राजन्! जो मनुष्य सत्ययुगमें उत्पन्न होते हैं, वे अपने पुण्यकार्योंके कारण देवलोकको चले जाते हैं॥ १९॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>स्वधर्मनिरता यान्ति लोकान्कर्मजितान्किल॥ २०हे नृपश्रेष्ठ! अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्मोंसे अर्जित लोकोंमें चले जाते हैं॥ २०॥
सत्यं दया तथा दानं स्वदारगमनं तथा।<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु समता सर्वजन्तुषु॥ २१<br>एतत्साधारणं धर्मं कृत्वा सत्ययुगे पुनः।<br>स्वर्गं यान्तीतरे वर्णा धर्मतो रजकादयः॥ २२<br>तथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरेऽथ युगे तथा।<br>कलावस्मिन्युगे पापा नरकं यान्ति मानवाः॥ २३<br>तावत्तिष्ठन्ति ते तत्र यावत्स्याद्युगपर्ययः।<br>पुनश्च मानुषे लोके भवन्ति भुवि मानवाः॥ २४सत्य, दया, दान, एकपत्नीव्रत, सभी प्राणियोंमें अद्रोहभाव तथा सभी जीवोंमें समभाव रखना—यह सत्ययुगका साधारण धर्म है। सत्ययुगमें इसका धर्मपूर्वक पालन करके रजक आदि इतर वर्णके लोग भी स्वर्ग चले जाते हैं। हे राजन्! त्रेता और द्वापरयुगमें यही स्थिति रहती है, किंतु इस कलियुगमें पापी मनुष्य नरक जाते हैं और वे वहाँ तबतक रहते हैं जबतक युगका परिवर्तन नहीं होता, उसके बाद मनुष्यके रूपमें पुनः पृथ्वीपर जन्म लेते हैं॥ २१—२४॥
यदा सत्ययुगस्यादिः कलेरन्तश्च पार्थिव।<br>तदा स्वर्गात्पुण्यकृतो जायन्ते किल मानवाः॥ २५हे राजन्! जब कलियुगका अन्त और सत्ययुगका आरम्भ होता है, तब पुण्यशाली लोग स्वर्गसे पुनः मनुष्यके रूपमें जन्म लेते हैं॥ २५॥
यदा कलियुगस्यादिर्द्वापरस्य क्षयस्तथा।<br>नरकात्पापिनः सर्वे भवन्ति भुवि मानवाः॥ २६जब द्वापरका अन्त और कलियुगका प्रारम्भ होता है, तब नरकके सभी पापी पृथ्वीपर मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं॥ २६॥
एवं कालसमाचारो नान्यथाभूत्कदाचन।<br>तस्मात्कलिरसत्कर्ता तस्मिंस्तु तादृशी प्रजा॥ २७इस प्रकार युगके अनुरूप ही आचार होता है, उसके विपरीत कभी नहीं। कलियुग असत्-प्रधान होता है, इसलिये उसमें प्रजा भी वैसी ही होती है।
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७७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कदाचिद्दैवयोगात् प्राणिनां व्यत्ययो भवेत्।<br>कलौ ये साधवः केचिद् द्वापरे सम्भवन्ति ते ॥ २८<br>तथा त्रेतायुगे केचित्केचित्सत्ययुगे तथा।<br>दुष्टाः सत्ययुगे ये तु ते भवन्ति कलावपि ॥ २९<br>कृतकर्मप्रभावेण प्राप्नुवन्त्यसुखानि च।<br>पुनश्च तादृशं कर्म कुर्वन्ति युगभावतः ॥ ३०दैवयोगसे कभी-कभी इन प्राणियोंके जन्म लेनेमें व्यतिक्रम भी हो जाता है। कलियुगमें कुछ जो साधुजन हैं, वे द्वापरके मनुष्य हैं। उसी प्रकार द्वापरके मनुष्य कभी-कभी त्रेतामें और त्रेताके मनुष्य सत्ययुगमें जन्म लेते हैं। जो सत्ययुगमें दुराचारी मनुष्य होते हैं, वे कलियुगके हैं। वे अपने किये हुए कर्मके प्रभावसे दुःख पाते हैं और पुनः युगप्रभावसे वे वैसा ही कर्म करते हैं॥ २७-३०॥
जनमेजय उवाच<br>युगधर्मान्महाभाग ब्रूहि सर्वानशेषतः।<br>यस्मिन्वै यादृशो धर्मो ज्ञातुमिच्छामि तं तथा ॥ ३१जनमेजय बोले— हे महाभाग! आप समस्त युगधर्मोंका पूर्णरूपसे वर्णन करें; जिस युगमें जैसा धर्म होता है, उसे मैं जानना चाहता हूँ॥ ३१॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपशार्दूल दृष्टान्तं ते ब्रवीम्यहम्।<br>साधूनामपि चेतांसि युगभावाद् भ्रमन्ति हि ॥ ३२व्यासजी बोले— हे नृपशार्दूल! ध्यानपूर्वक सुनिये, इस सम्बन्धमें मैं एक दृष्टान्त कहता हूँ। साधुजनोंके मन भी युगधर्मसे प्रभावित होते हैं॥ ३२॥
पितुर्यथा ते राजेन्द्र बुद्धिर्विप्रावहेलने।<br>कृता वै कलिना राजन् धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥ ३३<br>अन्यथा क्षत्रियो राजा ययातिकुलसम्भवः।<br>तापसस्य गले सर्पं मृतं कस्मादयोजयत् ॥ ३४हे राजेन्द्र! आपके महात्मा और धर्मज्ञ पिताकी भी बुद्धि कलियुगने विप्रका अपमान करनेकी ओर प्रेरित कर दी थी; अन्यथा ययातिके कुलमें पैदा हुए क्षत्रिय राजा परीक्षित् एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प क्यों डालते?॥ ३३-३४॥
सर्वं युगबलं राजन्वेदितव्यं विजानता।<br>प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्म विशेषतः ॥ ३५हे राजन्! विद्वान्को इसे युगका ही प्रभाव समझना चाहिये। इसलिये विशेषरूपसे धर्माचरण ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये॥ ३५॥
नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>पराशक्त्यर्चनरता देवीदर्शनलालसाः ॥ ३६<br>गायत्रीप्रणवासक्ता गायत्रीध्यानकारिणः।<br>गायत्रीजपसंसक्ता मायाबीजैकजापिनः ॥ ३७<br>ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासादकरणोत्सुकाः।<br>स्वकर्मनिरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः ॥ ३८<br>त्रय्युक्तकर्मनिरतास्तत्त्वज्ञानविशारदाः।<br>अभवन्क्षत्रियास्तत्र प्रजाभरणतत्पराः ॥ ३९<br>वैश्यास्तु कृषिवणिज्यगोसेवानिरतास्तथा।<br>शूद्राः सेवापरास्तत्र पुण्ये सत्ययुगे नृप ॥ ४०हे राजन्! सत्ययुगमें सभी ब्राह्मण वेदके ज्ञाता, पराशक्तिकी पूजामें तत्पर रहनेवाले, देवीदर्शनकी लालसासे युक्त, गायत्री और प्रणवमन्त्रमें अनुरक्त, गायत्रीका ध्यान करनेवाले, गायत्रीजपपरायण, एकमात्र मायाबीजमन्त्रका जप करनेवाले, प्रत्येक गाँवमें भगवती पराम्बाका मन्दिर बनानेके लिये उत्सुक रहनेवाले, अपने-अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले, सत्य-पवित्रता-दयासे समन्वित, वेदत्रयी कर्ममें संलग्न रहनेवाले और तत्त्वज्ञानमें पूर्ण निष्णात होते थे। क्षत्रिय प्रजाओंके भरण-पोषणमें संलग्न रहते थे। हे राजन्! उस पुण्यमय सत्ययुगमें वैश्यलोग कृषि, व्यापार और गो-पालन करते थे तथा शूद्र सेवापरायण रहते थे॥ ३६-४०॥
पराम्बापूजनासक्ताः सर्वे वर्णाः परे युगे।<br>तथा त्रेतायुगे किञ्चिन्न्यूना धर्मस्य संस्थितिः ॥ ४१उस सत्ययुगमें सभी वर्णोंके लोग भगवती पराम्बाके पूजनमें आसक्त रहते थे। उसके बाद त्रेतायुगमें धर्मकी स्थिति कुछ कम हो गयी। सत्ययुगमें
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अ० ११ ]षष्ठ स्कन्ध७७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
द्वापरे च विशेषेण न्यूना सत्ययुगस्थितिः।<br>पूर्वं ये राक्षसा राजन् ते कलौ ब्राह्मणाः स्मृताः॥ ४२जो धर्मकी स्थिति थी, वह द्वापरमें विशेषरूपसे कम हो गयी। हे राजन्! पूर्वयुगोंमें जो राक्षस समझे जाते थे, वे ही कलियुगमें ब्राह्मण माने जाते हैं॥ ४१-४२॥
पाखण्डनिरताः प्रायो भवन्ति जनवञ्चकाः।<br>असत्यवादिनः सर्वे वेदधर्मविवर्जिताः॥ ४३<br>दाम्भिका लोकचतुरा मानिनो वेदवर्जिताः।<br>शूद्रसेवापराः केचिन्नानाधर्मप्रवर्तकाः॥ ४४<br>वेदनिन्दाकराः क्रूरा धर्मभ्रष्टातिवादुकाः।<br>यथा यथा कलिर्वृद्धिं याति राजंस्तथा तथा॥ ४५<br>धर्मस्य सत्यमूलस्य क्षयः सर्वात्मना भवेत्।<br>तथैव क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च धर्मवर्जिताः॥ ४६<br>असत्यवादिनः पापास्तथा वर्णेतराः कलौ।<br>शूद्रधर्मरता विप्राः प्रतिग्रहपरायणाः॥ ४७वे प्रायः पाखण्डी, लोगोंको ठगनेवाले, झूठ बोलनेवाले तथा वेद और धर्मसे दूर रहनेवाले होते हैं। उनमेंसे कुछ तो दम्भी, लोकव्यवहारमें चालाक, अभिमानी, वेदप्रतिपादित मार्गसे हटकर चलनेवाले, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले, विभिन्न धर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले, वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मभ्रष्ट और व्यर्थ वाद-विवादमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे राजन्! जैसे-जैसे कलियुगकी वृद्धि होती है, वैसे-वैसे सत्यमूलक धर्मका सर्वथा क्षय होता जाता है और वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इतर वर्णोंके लोग भी धर्महीन, मिथ्यावादी तथा पापी होते हैं। ब्राह्मण शूद्रधर्ममें संलग्न और प्रतिग्रहपरायण हो जाते हैं॥ ४३-४७॥
भविष्यन्ति कलौ राजन् युगे वृद्धिं गताः किल।<br>कामचाराः स्त्रियः कामलोभमोहसमन्विताः॥ ४८<br>पापा मिथ्याभिवादिन्यः सदा क्लेशरता नृप।<br>स्वभर्तृवञ्चका नित्यं धर्मभाषणपण्डिताः॥ ४९हे राजन्! कलियुगका प्रभाव और बढ़नेपर स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी तथा काम, लोभ और मोहसे युक्त हो जायेंगी। हे राजन्! वे पापाचारिणी, झूठ बोलनेवाली, सदा कलह करनेवाली, अपने पतिको ठगनेवाली और नित्य धर्मका भाषण करनेमें निपुण होंगी। कलियुगमें इस प्रकारकी पापपरायण स्त्रियाँ होती हैं॥ ४८-४९ १/२॥
भवन्त्येवंविधा नार्यः पापिष्ठाश्च कलौ युगे।<br>आहारशुद्ध्या नृपते चित्तशुद्धिस्तु जायते॥ ५०<br>शुद्धे चित्ते प्रकाशः स्याद्धर्मस्य नृपसत्तम।<br>वृत्तसङ्करदोषेण जायते धर्मसङ्करः॥ ५१<br>धर्मस्य सङ्करे जाते नूनं स्याद्वर्णसङ्करः।<br>एवं कलियुगे भूप सर्वधर्मविवर्जिते॥ ५२<br>स्ववर्णधर्मवार्तैषा न कुत्राप्युपलभ्यते।<br>महान्तोऽपि च धर्मज्ञा अधर्मं कुर्वते नृप॥ ५३<br>कलिस्वभाव एवैष परिहार्यो न केनचित्।<br>तस्मादत्र मनुष्याणां स्वभावात्पापकारिणाम्॥ ५४<br>निष्कृतिर्न हि राजेन्द्र सामान्योपायतो भवेत्।हे राजन्! आहारकी शुद्धिसे ही अन्तःकरणकी शुद्धि होती है और हे नृपश्रेष्ठ! चित्त शुद्ध होनेपर ही धर्मका प्रकाश होता है। आचारसंकरता (दूसरे वर्णोंके अनुसार आचरण)-दोषसे धर्ममें व्यतिक्रम (विकार) उत्पन्न होता है और धर्ममें विकृति होनेपर वर्णसंकरता उत्पन्न होती है। हे राजन्! इस प्रकार सभी धर्मोंसे हीन कलियुगमें अपने-अपने वर्णाश्रम-धर्मकी चर्चा भी कहीं नहीं सुनायी देती। हे राजन्! धर्मज्ञ और श्रेष्ठजन भी अधर्म करने लग जाते हैं। यह कलियुगका स्वभाव ही है; किसीके भी द्वारा इसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता। अतः हे राजेन्द्र! इस कालमें स्वभावसे ही पाप करनेवाले मनुष्योंकी निष्कृति सामान्य उपायसे नहीं हो सकती॥ ५०-५४ १/२॥
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७७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| जनमेजय उवाच<br>भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ॥ ५५<br>कलावधर्मबहुले नराणां का गतिर्भवेत्।<br>यद्यस्ति तदुपायश्चेद्दया तं वदस्व मे ॥ ५६ | जनमेजय बोले— हे भगवन्! हे समस्त धर्मोंके ज्ञाता! हे समस्त शास्त्रोंमें निपुण! अधर्मके बाहुल्यवाले कलियुगमें मनुष्योंकी क्या गति होती है? यदि उससे निस्तारका कोई उपाय हो तो उसे दयापूर्वक मुझे बतलाइये॥ ५५-५६॥ | | व्यास उवाच<br>एक एव महाराज तत्रोपायोऽस्ति नापरः।<br>सर्वदोषनिरासार्थं ध्यायेद्देवीपदाम्बुजम् ॥ ५७<br>न सन्त्यघानि तावन्ति यावती शक्तिरस्ति हि।<br>नाम्नि देव्याः पापदाहे तस्माद्भीतिः कुतो नृप ॥ ५८<br>अवशेनापि यन्नाम लीलयोच्चारितं यदि।<br>किं किं ददाति तज्ज्ञातुं समर्था न हरादयः ॥ ५९ | व्यासजी बोले— हे महाराज! इसका एक ही उपाय है दूसरा नहीं है; समस्त पापोंके शमनके लिये देवीके चरणकमलका ध्यान करना चाहिये। हे राजन्! देवीके पापदाहक नाममें जितनी शक्ति है, उतने पाप तो हैं ही नहीं। इसलिये भयकी क्या आवश्यकता? यदि विवशतापूर्वक भी भगवतीके नामका उच्चारण हो जाय, तो वे क्या-क्या दे देती हैं, उसे जाननेमें भगवान् शंकर आदि भी समर्थ नहीं हैं!॥ ५७-५९॥ | | प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रीदेवीनामसंस्मृतिः।<br>तस्मात्कलिभयाद्राजन् पुण्यक्षेत्रे वसेन्नरः ॥ ६०<br>निरन्तरं पराम्बाया नामसंस्मरणं चरेत्।<br>छित्त्वा भित्त्वा च भूतानि हत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६१ | भगवती देवीके नामका स्मरण ही समस्त पापोंका प्रायश्चित्त है, इसलिये हे राजन्! मनुष्यको कलिके भयसे पुण्यक्षेत्रमें निवास करना चाहिये और पराम्बाके नामका निरन्तर स्मरण करना चाहिये। जो देवीको भक्तिभावसे नमस्कार करता है, वह प्राणियोंका छेदन-भेदन और सारे संसारको पीड़ित करके भी उन पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ६०-६१ १/२॥ | | देवीं नमति भक्त्या यो न स पापैर्विलिप्यते।<br>रहस्यं सर्वशास्त्राणां मया राजन्नुदीरितम् ॥ ६२<br>विमृश्यैतदशेषेण भज देवीपदाम्बुजम्।<br>अजपां नाम गायत्रीं जपन्ति निखिला जनाः ॥ ६३<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>गायत्रीं ब्राह्मणाः सर्वे जपन्ति हृदयान्तरे ॥ ६४<br>महिमानं न जानन्ति मायाया वैभवं महत्।<br>एतत्सर्वं समाख्यातं यत्पृष्टं तत्त्वया नृप।<br>युगधर्मव्यवस्थायां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६५ | हे राजन्! यह मैंने आपसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके रहस्यको कह दिया, इसपर भलीभाँति विचारकर आप देवीके चरणकमलकी आराधना करें। [वैसे तो] सभी लोग 'अजपा' नामक गायत्रीका जप करते हैं, लेकिन वे [मायासे मोहित होनेके कारण] उन महामायाकी महिमा और महान् वैभवको नहीं जानते। सभी ब्राह्मण अपने हृदयमें गायत्रीका जप करते हैं, परंतु वे भी उन महामायाकी महिमा और उनके महान् वैभवको नहीं जानते। हे राजन्! युगधर्मकी व्यवस्थाके विषयमें आपने जो कुछ पूछा था, यह सब मैंने कह दिया, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६२-६५॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे युगधर्मव्यवस्थावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥

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अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७७९


अथ द्वादशोऽध्यायः

पवित्र तीर्थोंका वर्णन, चित्तशुद्धिकी प्रधानता तथा इस सम्बन्धमें विश्वामित्र और वसिष्ठके परस्पर वैरकी कथा, राजा हरिश्चन्द्रका वरुणदेवके शापसे जलोदरग्रस्त होना

राजोवाच**राजा बोले—**हे मुनिश्रेष्ठ! अब आप मुझे मनुष्यों और देवताओंके द्वारा सेवनीय इस पृथ्वीपर स्थित पुण्य तीर्थों, क्षेत्रों तथा नदियोंके विषयमें बताइये। उन तीर्थोंमें स्नान तथा दानका जैसा फल मिलता है, उसे और विशेषरूपसे तीर्थयात्राकी विधि तथा नियमोंको भी बताइये॥ १-२॥
तीर्थानि भुवि पुण्यानि ब्रूहि मे मुनिसत्तम।<br>गम्यानि मानवैर्देवैः क्षेत्राणि सरितस्तथा॥ १
फलं च यादृशं यत्र तीर्थेषु स्नानदानतः।<br>विधिं तु तीर्थयात्रायां नियमांश्च विशेषतः॥ २
व्यास उवाच**व्यासजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, मैं उन विविध तीर्थोंका वर्णन करूँगा, जिन तीर्थोंमें देवियोंके प्रशस्त मन्दिर विद्यमान हैं॥ ३॥
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तीर्थानि विविधानि च।<br>येषु तीर्थेषु देवीनां प्रशस्तान्यायनानि च॥ ३
नदीनां जाह्नवी श्रेष्ठा यमुना च सरस्वती।<br>नर्मदा गण्डकी सिन्धुर्गोमती तमसा तथा॥ ४नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, इसी प्रकार यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गण्डकी, सिन्धु, गोमती, तमसा, कावेरी, चन्द्रभागा, पुण्या, शुभ वेत्रवती, चर्मण्वती, सरयू, तापी तथा साभ्रमती भी हैं—इन्हें मैंने बतला दिया। हे राजन्! इनके अतिरिक्त सैकड़ों अन्य नदियाँ भी हैं। उनमेंसे समुद्रमें गिरनेवाली नदियाँ पुण्यमयी हैं तथा समुद्रमें न गिरनेवाली नदियाँ अल्प पुण्यवाली हैं। समुद्रगामिनी नदियोंमें वे बहुत पवित्र हैं जो सदा जलपूरित होकर बहती हैं। श्रावण और भाद्रपद—इन दो महीनोंमें सभी नदियाँ रजस्वला होती हैं; क्योंकि उनमें वर्षाकालमें ग्रामीणजल प्रवाहित होता है॥ ४–७ ½॥
कावेरी चन्द्रभागा च पुण्या वेत्रवती शुभा।<br>चर्मण्वती च सरयूस्तापी साभ्रमती तथा॥ ५
एताश्च कथिता राजन्नन्याश्च शतशः पुनः।<br>तासां समुद्रगाः पुण्याः स्वल्पपुण्या ह्यनब्धिगाः॥ ६
समुद्रगानां ताः पुण्याः सर्वदौघवहास्तु याः।<br>मासद्वयं श्रावणादौ ताश्च सर्वा रजस्वलाः॥ ७
भवन्ति वृष्टियोगेन ग्राम्यवारिवहास्तथा।
पुष्करं च कुरुक्षेत्रं धर्मारण्यं सुपावनम्॥ ८पुष्कर, कुरुक्षेत्र, धर्मारण्य, प्रभास, प्रयाग, नैमिषारण्य और विख्यात अर्बुदारण्य—ये अत्यन्त पवित्र तीर्थ हैं। इसी प्रकार श्रीशैल, सुमेरु और गन्धमादन पवित्र पर्वत हैं। सरोवरोंमें सर्वविख्यात मानसरोवर, श्रेष्ठ बिन्दुसर और पवित्र अच्छोदसरोवर पुण्य सरोवर हैं॥ ८–१० ½॥
प्रभासं च प्रयागं च नैमिषारण्यमेव च।<br>विश्रुतं चार्बुदारण्यं शैलाश्च पावनास्तथा॥ ९
श्रीशैलश्च सुमेरुश्च पर्वतो गन्धमादनः।<br>सरांसि चैव पुण्यानि मानसं सर्वविश्रुतम्॥ १०
तथा बिन्दुसरः श्रेष्ठमच्छोदं नाम पावनम्।
आश्रमास्तु तथा पुण्या मुनीनां भावितात्मनाम्॥ ११इसी प्रकार शुद्ध मनवाले मुनियोंके आश्रम भी पुण्यस्थल हैं। विख्यात बदरिकाश्रम सदैव पुण्यशाली आश्रमके रूपमें कहा गया है जहाँ नर-नारायण नामके दो मुनियोंने तपस्या की थी। ऐसे ही वामनाश्रम और शतयूपाश्रम भी विख्यात हैं। जिस ऋषिने जहाँ तपस्या की वह आश्रम उसीके नामसे प्रसिद्ध हो गया॥ ११–१३॥
विश्रुतस्तु सदा पुण्यः ख्यातो बदरिकाश्रमः।<br>नरनारायणौ यत्र तेपाते तौ मुनी तपः॥ १२
वामनाश्रम आख्यातः शतयूपाश्रमस्तथा।<br>येन यत्र तपस्तप्तं तस्य नाम्नातिविश्रुतः॥ १३
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७८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं पुण्यानि स्थानानि ह्यसंख्यातानि भूतले।<br>मुनिभिः परिगीतानि पावनानि महीपते॥ १४<br>एषु स्थानेषु सर्वत्र देवीस्थानानि भूपते।<br>दर्शनात्तापहारीणि वसन्ति नियमेन च॥ १५<br>कथयिष्यामि तान्यग्रे प्रसङ्गेन च कानिचित्।हे राजन्! इस प्रकार इस भूतलपर असंख्य पवित्र पुण्यस्थल हैं, जो मुनियोंद्वारा पवित्र कहे गये हैं। हे राजन्! इन सभी स्थानोंमें देवीके मन्दिर हैं, जो दर्शन कर लेने मात्रसे पापका हरण करते हैं, वहाँ बहुत-से भक्त नियमपूर्वक वास करते हैं। उन कतिपय स्थानोंका वर्णन आगे करूँगा॥ १४-१५ १/२ ॥
तीर्थानि नृप दानानि व्रतानि च मखास्तथा॥ १६<br>तपांसि पुण्यकर्माणि सापेक्षाणि महीपते।<br>द्रव्यशुद्धिं क्रियाशुद्धिं मनःशुद्धिमपेक्ष्य च॥ १७<br>पावनानि हि तीर्थानि तपांसि च व्रतानि च।<br>कदाचिद् द्रव्यशुद्धिः स्यात्क्रियाशुद्धिः कदाचन॥ १८<br>दुर्लभा मनसः शुद्धिः सर्वेषां सर्वदा नृप।<br>मनस्तु चञ्चलं राजन्ननेकविषयाश्रितम्॥ १९<br>कथं शुद्धं भवेद्राजन्नानाभावसमाश्रितम्।हे राजन्! तीर्थ, दान, व्रत, यज्ञ, तपस्या और सभी पुण्यकर्म शुद्धिसापेक्ष हैं। द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मानसिक शुद्धिके आधारपर ही तीर्थ, तप और व्रत पवित्र होते हैं। कभी द्रव्यशुद्धि और कभी क्रियाशुद्धि हो पाती है, लेकिन हे राजन्! मानसिक शुद्धि सबके लिये सदा ही दुर्लभ होती है; क्योंकि हे नृप! मन बड़ा चंचल है और अनेक विषयोंमें भटकता रहता है। तब हे राजन्! विविध विषयोंके आश्रित रहनेवाला मन कैसे शुद्ध रह सकता है?॥ १६—१९ १/२ ॥
कामक्रोधौ तथा लोभो ह्यहङ्कारो मदस्तथा॥ २०<br>सर्वविघ्नकरा ह्येते तपस्तीर्थव्रतेषु च।<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः॥ २१<br>स्वधर्मपालनं राजन् सर्वतीर्थफलप्रदम्।<br>नित्यकर्मपरित्यागान्मार्गे संसर्गदोषतः॥ २२<br>व्यर्थं तीर्थाधिगमनं पापमेवावशिष्यते।काम, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मद—ये सभी तपस्या, तीर्थसेवन और व्रतोंमें विघ्नकारी होते हैं। हे राजन्! अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह और अपने धर्मका पालन—समस्त तीर्थोंका फल प्रदान करते हैं। नित्यकर्मके परित्याग और मार्गमें संसर्गदोषसे तीर्थमें जाना व्यर्थ हो जाता है, केवल पाप ही लगता है॥ २०—२२ १/२ ॥
क्षालयन्ति हि तीर्थानि सर्वथा देहजं मलम्॥ २३<br>मानसं क्षालितुं तानि न समर्थानि वै नृप।<br>शक्तानि यदि चेत्तानि गङ्गातीरनिवासिनः॥ २४<br>मुनयो द्रोहसंयुक्ताः कथं स्युर्भावितेश्वराः।<br>वसिष्ठसदृशाः प्रह्रा विश्वामित्रादयः किल॥ २५<br>रागद्वेषरताः सर्वे कामक्रोधाकुलाः सदा।<br>चित्तशुद्धिमयं तीर्थं गङ्गादिभ्योऽतिपावनम्॥ २६हे राजन्! तीर्थ तो केवल शरीरजन्य मलको ही धोते हैं, वे अन्तःकरणको धोनेमें समर्थ नहीं होते। यदि वे तीर्थ [मनको शुद्ध करनेमें] समर्थ होते तो गंगाके तटपर रहनेवाले विश्वामित्र और वसिष्ठसदृश ईश्वर-चिन्तनपरायण भक्त मुनि द्रोहभावसे युक्त क्यों होते? इस प्रकार तीर्थोंमें रहनेवाले लोग भी सदैव राग-द्वेषपरायण तथा काम-क्रोधसे व्याकुल रहते हैं। अतः चित्तशुद्धिरूपी तीर्थ गंगा आदि तीर्थोंसे भी अधिक पवित्र है॥ २३—२६॥
यदि स्याद्दैवयोगेन क्षालयत्यान्तरं मलम्।<br>विशेषेण तु सत्सङ्गो ज्ञाननिष्ठस्य भूपते॥ २७<br>न वेदा न च शास्त्राणि न व्रतानि तपांसि न।<br>न मखा न च दानानि चित्तशुद्धेस्तु कारणम्॥ २८हे राजन्! यदि दैवयोगसे ज्ञाननिष्ठ पुरुषका सत्संग प्राप्त हो जाय तो वह आन्तरिक मैलको धो देता है। हे राजन्! वेद, शास्त्र, व्रत, तप, यज्ञ तथा दान—ये चित्तकी शुद्धिके कारण नहीं हैं॥ २७-२८॥
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| अ० १२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८१ | | :--- | :--- | | वसिष्ठो ब्रह्मणः पुत्रो वेदविद्याविशारदः।<br>रागद्वेषान्वितः कामं गङ्गातीरसमाश्रितः॥ २९<br>आडीबकं महायुद्धं विश्वामित्रवसिष्ठयोः।<br>जातं निरर्थकं द्वेषाद्देवानां विस्मयप्रदम्॥ ३०<br>विश्वामित्रो बकस्तत्र जातः परमतापसः।<br>शप्तः स तु वसिष्ठेन हरिश्चन्द्रस्य कारणात्॥ ३१<br>कौशिकेन वसिष्ठोऽपि शप्त्वाडीदेहभाक्कृतः।<br>शापादाडीबकौ जातौ तौ मुनी विशदप्रभौ॥ ३२<br>निवासं प्राप्तुस्तीरे सरसो मानसस्य च।<br>चक्रतुर्दारुणं युद्धं नखचञ्चुप्रताडनैः॥ ३३<br>वर्षाणामयुतं यावत्तावृषी रोषसंयुतौ।<br>युयुधाते मदोन्मत्तौ सिंहाविव परस्परम्॥ ३४ | ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ वेदविद्यामें पारंगत थे और गङ्गाजीके तटपर रहते थे, फिर भी वे राग-द्वेषसे युक्त हो गये। विश्वामित्र और वसिष्ठके मध्य देवताओंको भी विस्मयमें डाल देनेवाला आडीबक नामक महायुद्ध हुआ, जो द्वेषके कारण व्यर्थ ही हुआ था। उस युद्धमें परम तपस्वी विश्वामित्र बक हुए थे, उन्हें वसिष्ठने हरिश्चन्द्रके कारण शाप दे दिया था। विश्वामित्रने भी वसिष्ठको शाप देकर आडी पक्षीके देहवाला बना दिया। इस प्रकार निर्मल कान्तिवाले वे दोनों मुनि शापके कारण आडी और बक पक्षीके रूपमें हो गये। वे मानसरोवरके तटपर रहने लगे और वहाँ नखों और चोंचके प्रहारसे भयंकर युद्ध करते रहे। वे दोनों ऋषि मदोन्मत्त सिंहोंके समान रोषयुक्त होकर दस हजार वर्षोंतक आपसमें युद्ध करते रहे॥ २९-३४॥ | | राजोवाच<br>कथं तौ मुनिशार्दूलौ तापसौ धर्मतत्परौ।<br>परस्परं वैरपरौ सञ्जातौ केन हेतुना॥ ३५<br>शापं परस्परं केन कारणेन महामती।<br>दत्तवन्तौ मिथः क्लेशकारकौ दुःखदौ नृणाम्॥ ३६ | राजा बोले— श्रेष्ठ तपस्वी और धर्मपरायण वे दोनों मुनिश्रेष्ठ किस कारण परस्पर वैरपरायण हुए? उन दोनों बुद्धिमान् ऋषियोंने किस कारणसे एक-दूसरेको शाप दिया? जो मनुष्योंके लिये कष्टकारक और दुःखदायक सिद्ध हुए॥ ३५-३६॥ | | व्यास उवाच<br>हरिश्चन्द्रो नृपश्रेष्ठस्त्रिशंकुतनयः पुरा।<br>बभूव रविवंशीयो रामचन्द्रस्य पूर्वजः॥ ३७<br>अनपत्यः स राजर्षिर्वरुणाय महाक्रतुम्।<br>प्रतिजज्ञे पुत्रकामो नरमेधं दुरासदम्॥ ३८<br>वरुणस्तस्य सन्तुष्टो यज्ञस्य नियमे कृते।<br>दधार गर्भं राज्ञस्तु भार्या परमसुन्दरी॥ ३९ | व्यासजी बोले— पूर्वकालमें सूर्यवंशमें त्रिशंकुके पुत्र हरिश्चन्द्र नामक एक श्रेष्ठ राजा हुए, जो रामचन्द्रजीके पूर्वज थे॥ ३७॥<br>वे राजर्षि सन्तानहीन थे, अतः पुत्रकी कामनासे वरुणदेवकी प्रसन्नताके लिये उन्होंने 'नरमेध' नामक दुष्कर महायज्ञ करनेकी प्रतिज्ञा की। उस यज्ञका व्रत लेनेसे वरुणदेव उनपर प्रसन्न हो गये और राजाकी परम रूपवती भार्याने गर्भ धारण किया॥ ३८-३९॥ | | राजा बभूव सन्तुष्टो दृष्ट्वा भार्यां सदोहदाम्।<br>चकार विधिवत्कर्म गर्भसंस्कारकारकम्॥ ४० | रानीको गर्भवती देखकर राजा प्रसन्न हुए और उन्होंने विधिपूर्वक गर्भको संस्कारित करनेवाला कर्म सम्पन्न कराया॥ ४०॥ | | सुषुवे तनयं नारी सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>मुदं प्राप नृपस्तत्र पुत्रे जाते विशाम्पते॥ ४१<br>कृतवाञ्जातकर्मादिसंस्कारविधिमुत्तमम् ।<br>ददौ हिरण्यं गा दोग्ध्रीर्ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥ ४२ | हे राजन्! रानीने समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके उत्पन्न होनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने जातकर्म आदि संस्कारकी उत्तम विधि सम्पन्न की। ब्राह्मणोंको विशेषरूपसे स्वर्ण और पयस्विनी गौएँ प्रदान कीं॥ ४१-४२॥ |

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७८२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जन्मोत्सवेऽतिसंवृत्ते गेहे वै यादसाम्पतिः।<br>आजगाम महाराज विप्रवेषधरस्तथा ॥ ४३<br><br>पूजितः पार्थिवेनाथ दत्त्वा विधिवदासनम्।<br>कार्ये पृष्टेऽब्रवीद्वाक्यं वरुणोऽस्मीति भूपतिम् ॥ ४४<br><br>कुरु यज्ञं सुतं कृत्वा पशुं परमपावनम्।<br>सत्यवाग्भव राजेन्द्र संकल्पस्तु त्वया कृतः ॥ ४५हे महाराज ! जब घरमें जन्मोत्सव धूमधामसे मनाया जा रहा था। उसी समय ब्राह्मणका वेश धारण करके वरुणदेव आये, आसन प्रदान करके राजाने विधिवत् उनकी पूजा की। आगमनके विषयमें पूछे जानेपर ‘मैं वरुण हूँ’—यह वाक्य उन्होंने राजासे कहा। हे राजेन्द्र ! जैसा आपने संकल्प किया था, अब अपने पुत्रको बलिपशु बनाकर परम पवित्र यज्ञ कीजिये और सत्यवादी बनिये ॥ ४३-४५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विह्वलोऽतिव्यथाकुलः।<br>संस्तभ्याधिं नृपः प्राह वरुणं सत्कृताञ्जलिः॥ ४६<br><br>स्वामिन् करोमि तं यज्ञं सर्वथा विधिपूर्वकम्।<br>मया ते यत्प्रतिज्ञातं भवामि सत्यवागहम्॥ ४७उनकी यह बात सुनकर राजा व्यथासे व्याकुल तथा विह्वल हो गये; पुनः अपनी मनोव्यथाको शान्त करके उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर वरुणदेवसे कहा—हे स्वामिन् ! मैंने जिस यज्ञका संकल्प लिया है, उस यज्ञको मैं विधिपूर्वक करूँगा और सत्यवादी होऊँगा ॥ ४६-४७ ॥
पूर्णे मासे विशुध्येत धर्मपत्नी सुरोत्तम।<br>विशुद्धायां तु भार्यायां कर्तव्यः स पशोर्मखः॥ ४८हे सुरश्रेष्ठ ! एक माह पूर्ण होनेपर मेरी धर्मपत्नी [जननाशौचसे] शुद्ध हो जायँगी, पत्नीके शुद्ध हो जानेपर मैं उस पशुयज्ञको करूँगा ॥ ४८ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्ते वचने राज्ञा वरुणः स्वगृहं गतः।<br>राजा बभूव सन्तुष्टः किञ्चिच्चिन्तातुरस्तथा ॥ ४९<br><br>पूर्णे मासि पुनः पाशी परीक्षार्थं नृपालये।<br>आजगाम द्विजो भूत्वा सुवेषः सुष्ठुभाषकः ॥ ५०व्यासजी बोले—राजाके यह कहनेपर वरुणदेव अपने घर चले गये। अब राजा सन्तुष्ट हो गये, किंतु कुछ-कुछ चिन्तातुर रहने लगे ॥ ४९ ॥<br>एक माह पूर्ण होनेपर वरुणदेव सुन्दर और मृदुभाषी ब्राह्मणका वेश बनाकर परीक्षा लेनेके लिये पुनः राजमहलमें आये ॥ ५० ॥
कृतार्हणं सुखासीनं भूपतिस्तं सुरोत्तमम्।<br>उवाच विनयोपेतो हेतुगर्भं वचस्तदा॥ ५१तब सम्यक् रूपसे पूजित होकर सुखदायी आसनपर विराजमान उन सुरश्रेष्ठ वरुणसे राजाने विनयपूर्वक उद्देश्यपरक यह बात कही—॥ ५१ ॥
असंस्कृतं सुतं स्वामिन् यूपे बध्नामि तं कथम्।<br>संस्कृत्य क्षत्रियं कृत्वा यजेऽहं यज्ञमुत्तमम् ॥ ५२हे स्वामिन् ! पुत्र तो अभी संस्काररहित है, उसे यूपमें कैसे बाँधूँ ? संस्कार करके उसे क्षत्रिय बनाकर मैं उस उत्तम यज्ञको सम्पन्न करूँगा ॥ ५२ ॥
दयसे यदि देव त्वं ज्ञात्वा दीनं स्वसेवकम्।<br>असंस्कृतस्य बालस्य नाधिकारोऽस्ति कुत्रचित् ॥ ५३हे देव ! संस्कारहीन बालकका कहीं भी अधिकार नहीं होता है, अतः यदि मुझपर दया करें तो मुझे अपना सेवक और दीन जानकर कुछ समय और दे दीजिये ॥ ५३ ॥
वरुण उवाच<br>प्रतारयसि राजेन्द्र कृत्वा समयमग्रतः।<br>दुस्त्यजस्तव जानामि सुतस्नेहो ह्यपुत्रिणः ॥ ५४<br><br>गृहं व्रजामि भूपाल वचनात्तव कोमलात्।<br>कियत्कालं प्रतीक्ष्याहमागमिष्यामि ते गृहम् ॥ ५५वरुण बोले—हे राजन् ! आप समयको आगे बढ़ाकर धोखा दे रहे हैं; निःसन्तान होनेके कारण आपका पुत्रस्नेह छोड़ना दुष्कर है—इसे मैं जानता हूँ। हे राजेन्द्र ! आपकी मधुर वाणी सुनकर मैं घर जा रहा हूँ, कुछ समयतक प्रतीक्षा करके मैं पुनः आपके

अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३

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अ० १२] षष्ठ स्कन्ध ७८३

भवितव्यं त्वया तात तदा सत्यवचोऽन्वितम्।<br>अन्यथा त्वयि मुञ्चामि कोपं शापसमन्वितम्॥ ५६घर आऊँगा। हे तात! उस समय आपको अपनी बातको सत्य सिद्ध करना होगा, अन्यथा मैं क्रुद्ध होकर आपको शाप दे दूँगा॥ ५४—५६॥
राजोवाच<br>समावर्तनकर्मान्ते सर्वथा यादसांपते।<br>कृत्वा पुत्रपशुं यज्ञे यजिष्ये विधिपूर्वकम्॥ ५७**राजा बोले—**हे जलाधिनाथ! मैं समावर्तनसंस्कार हो जानेपर पुत्रको यज्ञ-पशु बनाकर विधिपूर्वक यज्ञ करूँगा॥ ५७॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो वरुणः प्रीतमानसः।<br>तथेत्युक्त्वा ययौ तूर्णं नृपस्तु सुस्थितोऽभवत्॥ ५८**व्यासजी बोले—**राजाका यह वचन सुनकर वरुणदेव प्रसन्न होकर 'ठीक है'—ऐसा कहकर तुरंत चले गये और राजा भी स्वस्थचित्त हो गये॥ ५८॥
रोहिताख्य इति ख्यातः सुतस्तस्य विवृद्धिमान्।<br>सञ्जातश्चतुरः सर्वविद्यानां च विशारदः॥ ५९इधर राजाका रोहित नामका वह पुत्र बड़ा हो गया; वह बुद्धिमान् और समस्त विद्याओंमें पारंगत हो गया॥ ५९॥
यज्ञस्य कारणं तेन ज्ञातं सर्वं सविस्तरम्।<br>भयभीतस्ततः सोऽपि मत्वा मरणमात्मनः॥ ६०उसे यज्ञका सब कारण विस्तारपूर्वक ज्ञात हो गया। तब वह अपनी मृत्यु जानकर अत्यन्त भयभीत हो गया॥ ६०॥
कृत्वा पलायनं वीरो गतोऽसौ गिरिगह्वरे।<br>अगम्ये नृपतिस्थाने स्थितस्तत्र भयातुरः॥ ६१[एक दिन] वह बालक राजमहलसे भागकर एक अगम्य पर्वतकी गुफामें चला गया और भयग्रस्त होकर वहाँ रहने लगा॥ ६१॥
प्राप्ते कालेऽथ वरुणो यज्ञार्थी नृपतेर्गृहम्।<br>गत्वा तमाह भूपालं कुरु यज्ञं विशांपते॥ ६२समय आनेपर वरुणदेव यज्ञकी अभिलाषासे राजमहलमें पहुँचकर उन राजासे बोले—हे राजन्! यज्ञ कीजिये॥ ६२॥
प्रम्लानवदनो राजा तमाह व्यथितेन्द्रियः।<br>किं करोमि गतः क्वापि सुतो मे सुरसत्तम॥ ६३यह सुनकर उदास मुखवाले राजाने व्यथित होकर उनसे कहा—हे सुरश्रेष्ठ! मैं क्या करूँ? मेरा पुत्र कहीं चला गया है॥ ६३॥
श्रुत्वा तद्वचनं राज्ञः कुपितो यादसांपतिः।<br>शशाप तं नृपं कोपादसत्यवादिनं भृशम्॥ ६४राजाकी यह बात सुनकर जलचरोंके अधिपति वरुणदेवने क्रुद्ध होकर असत्यवादी राजाको शाप दे दिया—कपटविशारद हे राजन्! तुमने प्रतिज्ञा करके मुझे धोखा दिया है, अतः तुम्हारे शरीरमें जलोदर नामक रोग हो जाय॥ ६४-६५॥
जलोदराभिधो व्याधिर्देहे भवतु ते नृप।<br>यतः प्रतारितश्चाहं कृत्वा कपटपण्डित॥ ६५
इति शप्त्वा ययौ धाम स्वकं पाशधरस्तदा।<br>राजा चिन्तातुरस्तस्थौ भवने व्याधिपीडितः॥ ६६ऐसा शाप देकर पाशधारी वरुणदेव अपने लोकको चले गये और रोगसे पीड़ित होकर राजा अपने महलमें चिन्तित रहने लगे॥ ६६॥
यदातिव्याधितो राजा रोगेण शापजेन ह।<br>तदा शुश्राव पुत्रोऽपि पितरं व्याधिपीडितम्॥ ६७जब शापजन्य रोगसे राजा बहुत व्यथित हो गये तब उनके पुत्रने भी पिताके रोग-पीड़ित होनेकी बात सुनी॥ ६७॥
पान्थिकः प्राह पुत्रं हि पिता ते भृशदुःखितः।<br>जलोदरविकारेण शापजेन नृपात्मज॥ ६८किसी पथिकने उससे कहा—हे राजपुत्र! शापके कारण जलोदर रोगसे ग्रस्त तुम्हारे पिता बहुत अधिक दुःखी हैं॥ ६८॥
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७८४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३

| विनष्टं जीवितं तेऽद्य वृथा जातस्य दुर्मते।<br>यत्त्यक्त्वा पितरं दुःस्थं प्राप्तोऽसि गिरिगह्वरम्॥ ६९ | हे दुर्बुद्धि! तुम्हारा जीवन नष्ट हो गया, तुम्हारा जन्म लेना व्यर्थ है; क्योंकि तुम अपने पिताको दुःखी अवस्थामें छोड़कर पर्वतकी गुफामें छिपे हो॥ ६९॥ | | किमनेन शरीरेण प्राप्तं ते जन्मनः फलम्।<br>देहदं दुःखितं कृत्वा स्थितोऽस्यत्र सुताधम॥ ७० | हे कुपुत्र! तुम्हारे इस शरीरसे तुम्हारे जन्म लेनेका क्या लाभ है, जो तुम अपने पिताको दुःखी करके यहाँ रह रहे हो?॥ ७०॥ | | प्राणास्त्याज्याः पितुः कार्ये सत्पुत्रेणेति निश्चयः।<br>त्वदर्थे दुःखितो राजा क्रन्दति व्याधिपीडितः॥ ७१ | राजा हरिश्चन्द्र तुम्हारे लिये दुःखी और व्याधिसे पीड़ित होकर विलाप कर रहे हैं। पिताके लिये सत्पुत्रको प्राणोंतकका त्याग कर देना चाहिये—यह सिद्धान्त है॥ ७१॥ | | व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं पान्थिकाद्धर्मसंयुक्तम्।<br>यदा चक्रे मनो गन्तुं द्रष्टुं तातं व्यथातुरम्॥ ७२<br><br>तदा विप्रवपुर्भूत्वा वासवस्तमुपागमत्।<br>रहः प्राह हितं वाक्यं दयावानिव भारत॥ ७३<br><br>मूर्खोऽसि राजपुत्र त्वं गमनाय मतिं वृथा।<br>करोषि पितरं त्वद्य न जानासि व्यथायुतम्॥ ७४ | व्यासजी बोले—तब पथिककी धर्मसंगत बात सुनकर जैसे ही रोहितने पीडाग्रस्त अपने पिताको देखनेके लिये जानेका विचार किया, वैसे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके इन्द्र वहाँ आ गये। हे भारत! उन्होंने दयालुकी भाँति एकान्तमें हितकी यह बात कही—हे राजकुमार! तुम मूर्ख हो, जो वहाँ जानेका व्यर्थ विचार कर रहे हो। तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पिता तुम्हारे लिये क्यों दुःखी हैं?॥ ७२–७४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हरिश्चन्द्रस्य जलोदरव्याधिपीडावर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥


अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजा हरिश्चन्द्रका शुनःशेपको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करना, विश्वामित्रसे प्राप्त वरुणमन्त्रके जपसे शुनःशेपका मुक्त होना, परस्पर शापसे विश्वामित्र और वसिष्ठका बक तथा आडी होना

| इन्द्र उवाच<br>साहसं कृतवान् राजा पूर्वं यत्कथितो मखः।<br>वरुणाय प्रतिज्ञातः पुत्रं कृत्वा पशुं प्रियम्॥ १ | इन्द्र बोले—पूर्वकालमें राजाने वरुणदेवसे यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने प्रिय पुत्रको यज्ञीय पशु बनाकर यज्ञ करूँगा—यह उन्होंने बड़ा साहस किया था॥ १॥ | | गते त्वयि पिता पुत्रं बद्ध्वा यूपेऽघृणः पुनः।<br>पशुं कृत्वा महाबुद्धे वधिष्यति व्यथातुरः॥ २ | हे महामते! तुम्हारे वहाँ जानेपर रोगसे दुःखी तुम्हारे निर्दयी पिता तुम्हें यज्ञीय पशु बनाकर यूपमें बाँधकर मार डालेंगे॥ २॥ | | इत्थं निषिद्धस्तत्पुत्रः शक्रोणामिततेजसा।<br>स्थितस्तत्रैव मायेशीमायया मोहितो भृशम्॥ ३ | अमित तेजस्वी इन्द्रके द्वारा इस प्रकार रोक दिये जानेपर मायेश्वरीकी मायासे अत्यन्त मोहित होकर वह राजपुत्र वहीं रुक गया॥ ३॥ | | यदा पुनः पुनः श्रुत्वा पितरं रोगपीडितम्।<br>गमनाय मतिं चक्रे तदेन्द्रः प्रत्यषेधयत्॥ ४ | इस प्रकार जब-जब वह पिताको रोगसे पीड़ित सुनकर जानेका विचार करता था, तब-तब इन्द्र उसे रोक देते थे॥ ४॥ |

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| अ० १३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७८५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हरिश्चन्द्रोऽतिदुःखार्तः पप्रच्छ गुरुमन्तिके।<br>स्थितं वसिष्ठमेकान्ते सर्वज्ञं हिततत्परम्॥ ५एक दिन राजा हरिश्चन्द्रने अत्यन्त दुःखी होकर एकान्तमें बैठे हुए सर्वज्ञ और कल्याणकारी गुरु वसिष्ठके पास जाकर पूछा—॥ ५॥
राजोवाच<br>भगवन् किं करोम्यद्य कातरोऽस्मि व्यथाकुलः।<br>त्राहि मां दुःखमनसं महाव्याधिभयातुरम्॥ ६**राजा बोले—**हे भगवन्! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त भयभीत और कष्टसे पीड़ित हूँ। इस महाव्याधिसे पीड़ित मुझ दुःखितचित्तकी रक्षा कीजिये॥ ६॥
वसिष्ठ उवाच<br>शृणु राजन्नुपायोऽस्ति रोगनाशं प्रति स्तुतः।<br>त्रयोदशविधाः पुत्राः कथिता धर्मसंग्रहे॥ ७**वसिष्ठजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, रोगनाशका एक प्रशस्त उपाय है। धर्मशास्त्रमें तेरह प्रकारके पुत्र कहे गये हैं॥ ७॥
तस्मात्क्रीतं सुतं कृत्वा यजस्व मखमुत्तमम्।<br>द्रव्यं दत्त्वा यथेष्टमानयस्व द्विजोत्तमम्॥ ८इसलिये किसी ब्राह्मणके उत्तम बालकको उसका मनोभिलषित धन देकर क्रय करके उसे ले आइये और उत्तम यज्ञको सम्पन्न कीजिये॥ ८॥
एवं कृते मखे भूप रोगनाशो भविष्यति।<br>वरुणोऽपि प्रसन्नात्मा भविष्यति यथासुखम्॥ ९हे राजन्! इस प्रकार यज्ञ करनेसे आपका रोग नष्ट हो जायगा और वरुणदेव भी हर्षित होकर प्रसन्नचित्त हो जायँगे॥ ९॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा प्रोवाच मन्त्रिणम्।<br>अन्वेषय महाबुद्धे विषयेष्वतियत्नतः॥ १०**व्यासजी बोले—**उनकी ऐसी बात सुनकर राजाने मन्त्रीसे कहा—हे महामते! सभी स्थानोंमें प्रयत्नपूर्वक पता लगाइये॥ १०॥
कदाचित्कोऽपि लोभार्थी ददाति स्वसुतं पिता।<br>समानय धनं दत्त्वा यावत्प्रार्थयतेऽप्यसौ॥ ११यदि कोई लोभी पिता अपने पुत्रको देता है तो वह जितना धन माँगे, उतना देकर उसे ले आइये॥ ११॥
सर्वथैव समानेयो यज्ञार्थे द्विजबालकः।<br>न कार्या कृपणा बुद्धिस्त्वया मत्कार्यहेतवे॥ १२सब प्रकारसे प्रयास करके यज्ञके लिये ब्राह्मणबालक लाना ही चाहिये। मेरे कार्यमें तुम्हें किसी भी प्रकारका बुद्धिशैथिल्य नहीं करना चाहिये॥ १२॥
प्रार्थनीयस्त्वया पुत्रः कस्यचिद् द्विजवादिनः।<br>द्रव्येण देहि यज्ञार्थं कर्तव्योऽसौ पशुः किल॥ १३तुम्हें प्रत्येक ब्राह्मणसे प्रार्थना करनी चाहिये कि धन लेकर राजाको पुत्र दे दीजिये, उसे यज्ञके लिये यज्ञीय पशु बनाना है॥ १३॥
इति सञ्चोदितस्तेन सचिवः कार्यहेतवे।<br>अन्वेषयामास पुरे ग्रामे ग्रामे गृहे गृहे॥ १४उन राजासे यह आदेश प्राप्तकर मन्त्रीने यज्ञकार्यके लिये राज्यके प्रत्येक गाँव तथा घरमें पता लगाया॥ १४॥
एवमन्वेषतस्तस्य विषये कश्चिदातुरः।<br>निर्धनस्त्रिसुतश्चासीदजीगर्तैति नामतः॥ १५इस प्रकार राज्यमें पता लगाते हुए उसे अजीगर्त नामक एक दुःखी और निर्धन ब्राह्मण मिला, जिसके तीन पुत्र थे॥ १५॥
तस्य पुत्रं शुनःशेपं मध्यमं मन्त्रिसत्तमः।<br>आनयामास दत्त्वार्थं प्रार्थितं यद्धनं तदा॥ १६उस ब्राह्मणने जितना धन माँगा, उतना देकर वह मन्त्रिश्रेष्ठ उसके मझले पुत्र शुनःशेपको ले आया॥ १६॥
समानीय शुनःशेपं सचिवः कार्यतत्परः।<br>राज्ञे निवेदयामास पशुयोग्यं द्विजात्मजम्॥ १७कार्यकुशल मन्त्रीने पशुयोग्य ब्राह्मणपुत्र शुनःशेपको लाकर राजाको समर्पित कर दिया॥ १७॥
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| ७८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राजातिमुदितस्तेन विप्रानानीय सर्वतः।<br>कारयामास सम्भारान्यज्ञार्थं वेदवित्तमान्॥ १८इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाने वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलाकर यज्ञके लिये सामग्री एकत्र करवायी॥ १८॥
प्रारब्धे तु मखे तत्र विश्वामित्रो महामुनिः।<br>बद्धं दृष्ट्वा शुनःशेपं निषिषेध नृपं तदा॥ १९यज्ञके प्रारम्भ होनेपर महामुनि विश्वामित्रने वहाँ शुनः-शेपको बँधा देखकर राजाको मना करते हुए कहा—॥ १९॥
राजन्मा साहसं कार्षीर्मुञ्चैनं द्विजबालकम्।<br>प्रार्थयाम्यहमायुष्मन् सुखं तेऽद्य भविष्यति॥ २०हे राजन्! ऐसा साहस न कीजिये, इस ब्राह्मणबालकको छोड़ दीजिये। हे आयुष्मन्! मैं प्रार्थना करता हूँ, इससे आपको सुखकी प्राप्ति होगी॥ २०॥
क्रन्दत्ययं शुनःशेपः करुणा मां दुनोत्यपि।<br>दयावान्भव राजेन्द्र कुरु मे वचनं नृप॥ २१यह शुनःशेप क्रन्दन कर रहा है, अतः करुणा मुझे बहुत व्यथित कर रही है। हे राजेन्द्र! मेरी बात मानिये; हे नृप! दयावान् बनिये॥ २१॥
परदेहस्य रक्षायै स्वदेहं ये दयापराः।<br>ददति क्षत्रियाः पूर्वं स्वर्गकामाः शुचिव्रताः॥ २२<br><br>त्वं स्वदेहस्य रक्षार्थं हंसि द्विजसुतं बलात्।<br>पापं मा कुरु राजेन्द्र दयावान्भव बालके॥ २३पूर्वकालमें स्वर्गके इच्छुक, पवित्रव्रती तथा दयापरायण जो क्षत्रियगण थे, वे दूसरोंके शरीरकी रक्षाके लिये अपने प्राण दे देते थे और आप अपने शरीरकी रक्षाके लिये बलपूर्वक ब्राह्मणपुत्रका वध कर रहे हैं। हे राजेन्द्र! पाप मत कीजिये और इस बालकपर दयावान् होइए॥ २२-२३॥
सर्वेषां सदृशी प्रीतिर्देहे वेत्सि स्वयं नृप।<br>मुञ्चैनं बालकं तस्मात्प्रमाणं यदि मे वचः॥ २४हे राजन्! अपने देहके प्रति सभीको एक-जैसी प्रीति होती है—यह बात आप स्वयं जानते हैं। यदि आप मेरी बातको प्रमाण मानते हैं तो इस बालकको छोड़ दीजिये॥ २४॥
व्यास उवाच<br>अनादृत्य च तद्वाक्यं राजा दुःखातुरो भृशम्।<br>न मुमोच मुनिस्तस्मै चुकोपातीव तापसः॥ २५व्यासजी बोले— दुःखसे अत्यन्त पीड़ित राजाने मुनिकी बातका अनादर करके उस बालकको नहीं छोड़ा; इससे वे तपस्वी मुनि उनके ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध हो गये॥ २५॥
उपदेशं ददौ तस्मै शुनःशेपाय कौशिकः।<br>मन्त्रं पाशधरस्याथ दयावान्वेदवित्तमः॥ २६<br><br>शुनःशेपोऽपि तं मन्त्रमसकृद्वधकर्शितः।<br>प्लुतस्वरेण चुक्रोश संस्मरन्वरुणं भृशम्॥ २७वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उन दयालु विश्वामित्रने शुनःशेपको पाशधारी वरुणदेवके मन्त्रका उपदेश दिया। अपने वधके भयसे व्याकुल शुनःशेप भी वरुणदेवका स्मरण करते हुए उच्च स्वरसे बार-बार मन्त्रका जप करने लगा॥ २६-२७॥
स्तुवन्तं मुनिपुत्रं तं ज्ञात्वा वै यादसां पतिः।<br>तत्रागत्य शुनःशेपं मुमोच करुणार्णवः॥ २८<br><br>रोगहीनं नृपं कृत्वा वरुणः स्वगृहं ययौ।<br>विश्वामित्रस्तु तं पुत्रं कृतवान्मोचितं मृतेः॥ २९जलचरोंके अधिपति करुणासिन्धु वरुणदेवने वहाँ आकर स्तुति करते हुए उस ब्राह्मणपुत्र शुनः-शेपको छुड़ा दिया और राजाको रोगमुक्त करके वे वरुणदेव अपने लोकको चले गये। विश्वामित्रने उस बालकको मृत्युसे मुक्ति प्रदान कर दी॥ २८-२९॥
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अ० १३ ]षष्ठ स्कन्ध७८७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न कृतं वचनं राज्ञा कौशिकस्य महात्मनः।<br>रोषं दधार मनसा राजोपरि स गाधिजः॥ ३०राजाने महात्मा विश्वामित्रकी बात नहीं मानी, अतः वे गाधिपुत्र विश्वामित्र मन-ही-मन राजाके ऊपर बहुत क्रुद्ध हुए॥ ३०॥
एकस्मिन्समये राजा हयारूढो वनं गतः।<br>सूकरं हन्तुकामस्तु मध्याह्ने कौशिकीतटे॥ ३१एक समय राजा घोड़ेपर सवार होकर वनमें गये। वे सूअरको मारनेकी इच्छासे ठीक दोपहरके समय कौशिकी नदीके तटपर पहुँचे॥ ३१॥
वृद्धब्राह्मणवेषेण विश्वामित्रेण वञ्चितः।<br>सर्वस्वं प्रार्थितं तस्य गृहीतं राज्यमद्भुतम्॥ ३२वहाँ विश्वामित्रने वृद्ध ब्राह्मणका वेश धारण करके छलपूर्वक उनका सर्वस्व माँग लिया और उनके महान् राज्यपर अपना अधिकार कर लिया॥ ३२॥
पीडितोऽसौ हरिश्चन्द्रो यजमानो यतो भृशम्।<br>वसिष्ठः कौशिकं प्राह वने प्राप्तं यदृच्छया॥ ३३<br>क्षत्रियाधम दुर्बुद्धे वृथा ब्राह्मणवेषभृत्।<br>बकधर्म वृथा किं त्वं गर्वं वहसि दाम्भिक॥ ३४जिससे [वसिष्ठके] यजमान राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त कष्ट पाने लगे। एक बार संयोगवश वनमें आये हुए विश्वामित्रसे वसिष्ठने कहा— हे क्षत्रियाधम! हे दुर्बुद्धे! तुमने व्यर्थ ही ब्राह्मणका वेश बना रखा है, बगुलेके समान वृत्तिवाले हे दाम्भिक! तुम व्यर्थमें गर्व क्यों करते हो?॥ ३३-३४॥
कस्मात्त्वया नृपश्रेष्ठो यजमानो ममाप्यसौ।<br>अपराधं विना जाल्म गमितो दुःखमद्भुतम्॥ ३५हे जाल्म! तुमने मेरे यजमान नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्रको बिना अपराधके महान् कष्टमें क्यों डाल दिया?॥ ३५॥
बकध्यानपरो यस्मात्तस्मात्त्वं वै बको भव।<br>इति शप्तो वसिष्ठेन कौशिकः प्राह तं पुनः॥ ३६तुम बगुलेके समान ध्यानपरायण हो। अतः तुम 'बक' (बगुला) हो जाओ। वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार शापप्राप्त विश्वामित्रने उनसे कहा—
त्वमप्याडिर्भवायुष्मन् बकोऽहं यावदेव हि।हे आयुष्मन्! जबतक मैं बक रहूँगा, तबतक तुम भी आडी पक्षी बनकर रहोगे॥ ३६ ½॥
व्यास उवाच<br>एवं परस्परं दत्त्वा शापं तौ क्रोधपीडितौ॥ ३७<br>अण्डजौ तरसा जातौ सरस्याडीबकौ मुनी।<br>एकस्मिन्पादपे नीडं कृत्वासौ बकरूपभाक्॥ ३८<br>विश्वामित्रः स्थितस्तत्र दिव्ये सरसि मानसे।<br>अन्यस्मिन्पादपे कृत्वा वसिष्ठो नीडमुत्तमम्॥ ३९<br>आडीरूपधरस्तस्थावन्योन्यं द्वेषतत्परौ।<br>दिने दिने तौ संग्रामं चक्रतुः क्रोधसंयुतौ॥ ४०<br>दुःखदं सर्वलोकानां क्रन्दमानावुभौ भृशम्।<br>चञ्चुपक्षप्रहारैस्तु नखाघातैः परस्परम्॥ ४१<br>जघ्नतू रुधिरक्लिन्नौ पुष्पिताविव किंशुकौ।<br>एवं बहूनि वर्षाणि पक्षिरूपधरौ मुनी॥ ४२<br>स्थितौ तत्र महाराज शापपाशेन यन्त्रितौ।व्यासजी बोले— इस प्रकार क्रोधसे व्याकुल उन दोनोंने एक-दूसरेको शाप दे दिया और एक सरोवरके समीप वे दोनों मुनि 'आडी' और 'बक' के रूपमें अण्डोंसे उत्पन्न हुए। दिव्य मानसरोवरके तटपर एक वृक्षपर घोंसला बनाकर बकरूपधारी विश्वामित्र और एक दूसरे वृक्षपर उत्तम घोंसला बनाकर आडीरूपधारी वसिष्ठ परस्पर द्वेषपरायण होकर रहने लगे। वे दोनों कोपाविष्ट होकर प्रतिदिन घोर क्रन्दन करते हुए सभी लोगोंके लिये दुःखदायी युद्ध करते थे। वे दोनों चोंच और पंखोंके प्रहार तथा नखोंके आघातसे परस्पर चोट पहुँचाते थे। रक्तसे लथपथ वे दोनों खिले हुए किंशुकके फूल-जैसे प्रतीत होते थे। हे महाराज! इस प्रकार पक्षीरूपधारी दोनों मुनि शापरूपी पाशमें जकड़े हुए वहाँ बहुत वर्षोंतक पड़े रहे॥ ३७-४२ ½॥
राजोवाच<br>कथं मुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ शापाद्वसिष्ठकौशिकौ॥ ४३<br>तन्ममाचक्ष्व विप्रर्षे परं कौतूहलं हि मे।राजा बोले— हे विप्रर्षे! वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ और विश्वामित्र शापसे किस प्रकार मुक्त हुए, यह मुझे बताइये, मुझे बड़ा कौतूहल है॥ ४३ ½॥
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७८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
युध्यमानावुभौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ ४४<br>तत्राजगामानिमिषैर्वृतः सर्वैर्दयापरैः।<br>तावाश्वास्य जगत्कर्ता युद्धतो विनिवार्य च॥ ४५लोकपितामह ब्रह्माजी उन दोनोंको युद्ध करते देखकर समस्त दयापरायण देवताओंके साथ वहाँ आये। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने उन दोनोंको समझाकर युद्धसे विरत करके परस्पर दिये गये शापसे भी मुक्त कर दिया॥ ४४-४५ १/२॥
शापं संमोचयामास तयोः क्षिप्तं परस्परम्।<br>ततो जग्मुः सुराः सर्वे स्वानि धिष्ण्यानि पद्मभूः॥ ४६<br>सत्यलोकं जगामाशु हंसारूढः प्रतापवान्।<br>विश्वामित्रोऽप्यगात्तूर्णं वसिष्ठः स्वाश्रमं गतः॥ ४७<br>मिथः स्नेहं ततः कृत्वा प्रजापत्युपदेशतः।<br>मैत्रावरुणिनाप्येवं कृतं युद्धमकारणम्॥ ४८इसके बाद सभी देवगण अपने-अपने लोकोंको चले गये, कमलयोनि प्रतापी ब्रह्माजी शीघ्र हंसपर आरूढ़ होकर सत्यलोकको चले गये और प्रजापतिके उपदेशसे परस्पर स्नेह करके विश्वामित्र तथा वसिष्ठजी भी अपने-अपने आश्रमोंको शीघ्र चले गये। हे राजन्! इस प्रकार मैत्रावरुणि वसिष्ठने भी अकारण ही विश्वामित्रके साथ परस्पर दुःखप्रद युद्ध किया था॥ ४६-४८ १/२॥
कौशिकेन समं भूप दुःखदं च परस्परम्।<br>को नाम मानवो लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ४९<br>अहङ्कारजयं कृत्वा सर्वदा सुखभाग्भवेत्।<br>तस्माद्राजंश्चित्तशुद्धिर्महतामपि दुर्लभा॥ ५०<br>यत्नेन साधनीया सा तद्विहीनं निरर्थकम्।<br>तीर्थं दानं तपः सत्यं यत्किञ्चिद्धर्मसाधनम्॥ ५१इस संसारमें मनुष्य, देवता या दैत्य—कौन ऐसा है, जो अहंकारपर विजय प्राप्तकर सदा सुखी रह सके। अतः हे राजन्! चित्तकी शुद्धि महापुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिये; उसके बिना तीर्थयात्रा, दान, तपस्या, सत्य आदि जो कुछ भी धर्मसाधन है; वह सब निरर्थक है॥ ४९-५१॥
( श्रद्धात्र त्रिविधा प्रोक्ता सात्त्विकी राजसी तथा।<br>तामसी सर्वदेहेषु देहिनां धर्मकर्मसु॥<br>सात्त्विकी दुर्लभा लोके यथोक्तफलदा सदा।<br>तदर्धफलदा प्रोक्ता राजसी विधिसंयुता॥<br>तामसी त्वफला राजन्न तु कीर्तिकरी पुनः।<br>कामक्रोधाभिभूतानां जनानां नृपसत्तम॥ )(सबके देहोंमें तथा प्राणियोंके धर्मकर्मोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी श्रद्धा कही गयी है। इनमें यथोक्त फल देनेवाली सात्त्विकी श्रद्धा जगत्में सदा दुर्लभ होती है। विधिविधानसे युक्त राजसी श्रद्धा उसका आधा फल देनेवाली कही गयी है। हे राजन्! काम-क्रोधके वशीभूत पुरुषोंकी श्रद्धा तामसी होती है। हे नृपश्रेष्ठ! वह फलविहीन होती है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं होती।)
वासनारहितं कृत्वा तच्चित्तं श्रवणादिना।<br>तीर्थादिषु वसेन्नित्यं देवीपूजनतत्परः॥ ५२<br>देवीनामानि वचसा गृह्णंस्तस्या गुणान्स्तुवन्।<br>ध्यायंस्तस्याः पदाम्भोजं कलिदोषभयार्दितः॥ ५३कलियुगके दोषोंसे भयभीत व्यक्तिको कथा-श्रवण आदिके द्वारा चित्तको वासनारहित करके देवीकी पूजामें तत्पर रहते हुए, वाणीसे देवीके नामोंको ग्रहण करते हुए, उनके गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा उनके चरण-कमलका ध्यान करते हुए तीर्थ आदिमें नित्य वास करना चाहिये॥ ५२-५३॥
एवं तु कुर्वतस्तस्य न कदाचित्कलेर्भयम्।<br>अनायासेन संसारान्मुच्यते पातकी जनः॥ ५४ऐसा करनेसे उसे कभी कलियुगका भय नहीं होगा, इससे पापी प्राणी भी अनायास ही संसारसे मुक्त हो जाता है॥ ५४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे आडीबकयुद्धवर्णनसहितं देवीमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

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अ० १४ ]षष्ठ स्कन्ध७८९

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

राजा निमि और वसिष्ठका एक-दूसरेको शाप देना, वसिष्ठका मित्रावरुणके पुत्रके रूपमें जन्म लेना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>मैत्रावरुणिरित्युक्तं नाम तस्य मुनेः कथम्।<br>वसिष्ठस्य महाभाग ब्रह्मणस्तनुजस्य ह॥ १<br>किमसो कर्मतो नाम प्राप्तवान् गुणतस्तथा।<br>ब्रूहि मे वदतां श्रेष्ठ कारणं तस्य नामजम्॥ २जनमेजय बोले—हे महाभाग! ब्रह्माके पुत्र मुनि वसिष्ठका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम कैसे पड़ा? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! किस कर्म अथवा गुणके कारण उन्होंने यह नाम प्राप्त किया। उनके नाम पड़नेका कारण मुझे बताइये॥ १-२॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपतिश्रेष्ठ वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः।<br>निमिशापात्तनुं त्यक्त्वा पुनर्जातो महाद्युतिः॥ ३<br>मित्रावरुणयोर्यस्मात्तस्मात्तन्नाम विश्रुतम्।<br>मैत्रावरुणिरित्यस्मिँल्लोके सर्वत्र पार्थिव॥ ४व्यासजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! सुनिये, वसिष्ठजी ब्रह्माके पुत्र हैं, उन महातेजस्वीने निमिके शापसे वह शरीर त्यागकर पुनः जन्म लिया॥ ३॥<br>हे राजन्! उनका जन्म मित्र और वरुणके यहाँ हुआ था, इसीलिये इस संसारमें सर्वत्र उनका 'मैत्रावरुणि'—यह नाम विख्यात हुआ॥ ४॥
राजोवाच<br>कस्माच्छप्तः स धर्मात्मा राज्ञा ब्रह्मात्मजो मुनिः।<br>चित्रमेतन्मुनिं लग्नो राज्ञः शापोऽतिदारुणः॥ ५<br>अनागसं मुनिं राजा किमसो शप्तवान्मुने।<br>कारणं वद धर्मज्ञ तस्य शापस्य मूलतः॥ ६राजा बोले—राजा निमिने ब्रह्माजीके पुत्र धर्मात्मा वसिष्ठको शाप क्यों दिया? राजाका वह दारुण शाप मुनिको लग गया—यह तो आश्चर्य है!॥ ५॥<br>हे मुने! निरपराध मुनिको राजाने क्यों शाप दे दिया; हे धर्मज्ञ! उस शापका कारण यथार्थरूपमें बताइये?॥ ६॥
व्यास उवाच<br>कारणं तु मया प्रोक्तं तव पूर्वं विनिश्चितम्।<br>संसारोऽयं त्रिभिर्व्याप्तो राजन्मायागुणैः किल॥ ७<br>धर्मं करोतु भूपालश्चरन्तु तापसास्तपः।<br>सर्वेषां तु गुणैर्विद्धं प्रोज्ज्वलं तद्भवेदिह॥ ८<br>कामक्रोधाभिभूताश्च राजानो मुनयस्तथा।<br>लोभाहङ्कारसंयुक्ताश्चरन्ति दुश्चरं तपः॥ ९<br>यजन्ति क्षत्रिया राजन् रजोगुणसमावृताः।<br>ब्राह्मणास्तु तथा राजन् न कोऽपि सत्त्वसंयुतः॥ १०<br>ऋषिणासौ निमिः शप्तस्तेन शप्तो मुनिः पुनः।<br>दुःखाह्दुःखतरं प्राप्तावुभावपि विधेर्बलात्॥ ११<br>द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मनसः शुद्धिरुज्ज्वला।<br>दुर्लभा प्राणिनां भूप संसारे त्रिगुणात्मके॥ १२व्यासजी बोले—इसका सम्यक् रूपसे निर्णीत कारण तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। हे राजन्! यह संसार मायाके तीनों गुणोंसे व्याप्त है॥ ७॥<br>राजा धर्म करें और तपस्वी तप करें—यह स्वाभाविक कर्म है, परंतु सभी प्राणियोंका मन गुणोंसे आबद्ध रहनेके कारण विशुद्ध नहीं रह पाता॥ ८॥<br>राजालोग काम और क्रोधसे अभिभूत रहते हैं और उसी प्रकार तपस्वीगण भी लोभ और अहंकारयुक्त होकर कठोर तपस्या करते हैं॥ ९॥<br>हे राजन्! क्षत्रियगण रजोगुणसे युक्त होकर यज्ञ करते थे, वैसे ही ब्राह्मण भी थे। हे राजन्! कोई भी सत्त्वगुणसे युक्त नहीं था॥ १०॥<br>ऋषिने राजाको शाप दिया और तब राजाने भी मुनिको शाप दे दिया। इस प्रकार दैववशात् दोनोंको बहुत दुःख प्राप्त हुआ॥ ११॥<br>हे राजन्! इस त्रिगुणात्मक जगत्में प्राणियोंके लिये द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और उज्ज्वल मनःशुद्धि दुर्लभ है॥ १२॥
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| ७९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पराशक्तिप्रभावोऽयं नोल्लङ्घ्यः केनचित्क्वचित्।<br>यस्यानुग्रहमिच्छेत्सा मोचयत्येव तं क्षणात्॥ १३यह पराशक्तिका ही प्रभाव है और कोई कभी इसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। जिसपर वे भगवती कृपा करना चाहती हैं, उसे तत्काल मुक्त कर देती हैं॥ १३॥
महान्तोऽपि न मुच्यन्ते हरिब्रह्महरादयः।<br>पामरा अपि मुच्यन्ते यथा सत्यव्रतादयः॥ १४ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि महान् देवता भी मुक्त नहीं हो पाते, किंतु सत्यव्रत आदि जैसे अधम भी मुक्त हो जाते हैं॥ १४॥
तस्यास्तु हृदयं कोऽपि न वेत्ति भुवनत्रये।<br>तथापि भक्तवश्येयं भवत्येव सुनिश्चितम्॥ १५यद्यपि तीनों लोकोंमें भगवतीके रहस्यको कोई नहीं जानता है, फिर भी वे भक्तके वशमें हो जाती हैं—ऐसा निश्चित है॥ १५॥
तस्मात्तद्भक्तिरास्थेया दोषनिर्मूलनाय च।<br>रागदम्भादियुक्ता चेत्सा भक्तिर्नाशिनी भवेत्॥ १६अतः दोषोंके निर्मूलनके लिये उनकी भक्ति करनी चाहिये। यदि वह भक्ति राग, दम्भ आदिसे युक्त हो तो वह नाश करनेवाली होती है॥ १६॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो निमिर्नाम नराधिपः।<br>रूपवान् गुणसम्पन्नो धर्मज्ञो लोकरञ्जकः॥ १७<br><br>सत्यवादी दानपरो याजको ज्ञानवाञ्छुचिः।<br>द्वादशस्तनयो धीमान्प्रजापालनतत्परः॥ १८इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न निमि नामके एक राजा थे। वे रूपवान्, गुणवान्, धर्मज्ञ, प्रजावत्सल सत्यवादी, दानशील, यज्ञ-कर्ता, ज्ञानी और पुण्यात्मा थे। वे बुद्धिमान् और प्रजापालक राजा निमि इक्ष्वाकुके बारहवें पुत्र थे॥ १७-१८॥
पुरं निवेशयामास गौतमाश्रमसन्निधौ।<br>जयन्तपुरसंज्ञं तु ब्राह्मणानां हिताय सः॥ १९उन्होंने ब्राह्मणोंके हितके लिये गौतममुनिके आश्रमके समीप जयन्तपुर नामका एक नगर बसाया॥ १९॥
बुद्धिस्तस्य समुत्पन्ना यजेयमिति राजसी।<br>यज्ञेन बहुकालेन दक्षिणासंयुतेन च॥ २०उनके मनमें एक बार यह राजसी बुद्धि उत्पन्न हुई कि बहुत समयतक चलनेवाले और विपुल दक्षिणावाले यज्ञके द्वारा आराधना करूँ॥ २०॥
इक्ष्वाकुं पितरं पृष्ट्वा यज्ञकार्याय पार्थिवः।<br>कारयामास सम्भारं यथोद्दिष्टं महात्मभिः॥ २१तब राजाने यज्ञकार्यके लिये अपने पिता इक्ष्वाकुसे आज्ञा लेकर महात्माओंके कथनानुसार समस्त यज्ञीय सामग्री एकत्र करायी॥ २१॥
भृगुमङ्गिरसं चैव वामदेवं च गौतमम्।<br>वसिष्ठं च पुलस्त्यं च ऋचीकं पुलहं क्रतुम्॥ २२<br><br>मुनीनामन्त्रयामास सर्वज्ञांर्वेदपारगान्।<br>यज्ञविद्याप्रवीणांश्च तापसान्वेदवित्तमान्॥ २३इसके बाद राजाने भृगु, अंगिरा, वामदेव, गौतम, वसिष्ठ, पुलस्त्य, ऋचीक, पुलह और क्रतु—इन सर्वज्ञ, वेदमें पारंगत, यज्ञविद्याओंमें कुशल एवं वेदज्ञ मुनियों और तपस्वियोंको आमन्त्रित किया॥ २२-२३॥
राजा सम्भृतसम्भारः सम्पूज्य गुरुमात्मनः।<br>वसिष्ठं प्राह धर्मज्ञो विनयेन समन्वितः॥ २४समस्त सामग्री एकत्र कर धर्मज्ञ राजाने अपने गुरु वसिष्ठकी पूजा करके विनयसे युक्त होकर उनसे कहा—॥ २४॥
यजेयं मुनिशार्दूल याजयस्व कृपानिधे।<br>गुरुस्त्वं सर्ववेत्तासि कार्यं मे कुरु साम्प्रतम्॥ २५हे मुनिश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ। अतः यज्ञ करानेकी कृपा करें। हे कृपानिधे! आप सर्वज्ञ हैं और मेरे गुरु हैं; इस समय आप मेरा कार्य सम्पन्न कीजिये॥ २५॥
यज्ञोपकरणं सर्वं समानीतं सुसंस्कृतम्।<br>पञ्चवर्षसहस्रं तु दीक्षां कर्तुं मतिश्च मे॥ २६मैंने समस्त यज्ञीय सामग्री मँँगवा ली है और उसका संस्कार भी करा लिया है। मेरा विचार है कि मैं पाँच हजार वर्षके लिये यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर लूँ॥ २६॥