देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 784, कुल 889 में से
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| अ० ११ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७७५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| युगधर्मस्तु राजेन्द्र न याति व्यत्ययं पुनः।<br>कालः कर्तास्ति धर्मस्य ह्यधर्मस्य च वै पुनः॥ १४ | हे राजेन्द्र! युगधर्मका प्रभाव विपरीत नहीं होता है; काल ही धर्म और अधर्मका कर्ता है॥ १४॥ |
| राजोवाच<br>ये तु सत्ययुगे जीवा भवन्ति धर्मतत्पराः।<br>कुत्र तेऽद्य महाभाग तिष्ठन्ति पुण्यभागिनः॥ १५<br>त्रेतायुगे द्वापरे वा ये दानव्रतकारकाः।<br>वर्तन्ते मुनयः श्रेष्ठाः कुत्र ब्रूहि पितामह॥ १६<br>कलावद्य दुराचारा येऽत्र सन्ति गतत्रपाः।<br>आद्ये युगे क्व यास्यन्ति पापिष्ठा देवनिन्दकाः॥ १७<br>एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते।<br>सर्वथा श्रोतुकामोऽस्मि यदेतद्धर्मनिर्णयम्॥ १८ | राजा बोले—हे महाभाग! सत्ययुगमें जो धर्मपरायण प्राणी हुए हैं, वे पुण्यशाली लोग इस समय कहाँ स्थित हैं? हे पितामह! त्रेतायुग या द्वापरमें जो दान तथा व्रत करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हुए हैं, वे अब कहाँ विद्यमान हैं; मुझे बतायें। इस कलियुगमें जो दुराचारी, निर्लज्ज, देवनिन्दक और पापी लोग विद्यमान हैं, वे सत्ययुगमें कहाँ जायेंगे? हे महामते! यह सब विस्तारपूर्वक कहिये; मैं इस धर्मनिर्णयके विषयमें सब कुछ सुनना चाहता हूँ॥ १५—१८॥ |
| व्यास उवाच<br>ये वै कृतयुगे राजन् सम्भवन्तीह मानवाः।<br>कृत्वा ते पुण्यकर्माणि देवलोकान्व्रजन्ति वै॥ १९ | व्यासजी बोले—हे राजन्! जो मनुष्य सत्ययुगमें उत्पन्न होते हैं, वे अपने पुण्यकार्योंके कारण देवलोकको चले जाते हैं॥ १९॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>स्वधर्मनिरता यान्ति लोकान्कर्मजितान्किल॥ २० | हे नृपश्रेष्ठ! अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने कर्मोंसे अर्जित लोकोंमें चले जाते हैं॥ २०॥ |
| सत्यं दया तथा दानं स्वदारगमनं तथा।<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु समता सर्वजन्तुषु॥ २१<br>एतत्साधारणं धर्मं कृत्वा सत्ययुगे पुनः।<br>स्वर्गं यान्तीतरे वर्णा धर्मतो रजकादयः॥ २२<br>तथा त्रेतायुगे राजन् द्वापरेऽथ युगे तथा।<br>कलावस्मिन्युगे पापा नरकं यान्ति मानवाः॥ २३<br>तावत्तिष्ठन्ति ते तत्र यावत्स्याद्युगपर्ययः।<br>पुनश्च मानुषे लोके भवन्ति भुवि मानवाः॥ २४ | सत्य, दया, दान, एकपत्नीव्रत, सभी प्राणियोंमें अद्रोहभाव तथा सभी जीवोंमें समभाव रखना—यह सत्ययुगका साधारण धर्म है। सत्ययुगमें इसका धर्मपूर्वक पालन करके रजक आदि इतर वर्णके लोग भी स्वर्ग चले जाते हैं। हे राजन्! त्रेता और द्वापरयुगमें यही स्थिति रहती है, किंतु इस कलियुगमें पापी मनुष्य नरक जाते हैं और वे वहाँ तबतक रहते हैं जबतक युगका परिवर्तन नहीं होता, उसके बाद मनुष्यके रूपमें पुनः पृथ्वीपर जन्म लेते हैं॥ २१—२४॥ |
| यदा सत्ययुगस्यादिः कलेरन्तश्च पार्थिव।<br>तदा स्वर्गात्पुण्यकृतो जायन्ते किल मानवाः॥ २५ | हे राजन्! जब कलियुगका अन्त और सत्ययुगका आरम्भ होता है, तब पुण्यशाली लोग स्वर्गसे पुनः मनुष्यके रूपमें जन्म लेते हैं॥ २५॥ |
| यदा कलियुगस्यादिर्द्वापरस्य क्षयस्तथा।<br>नरकात्पापिनः सर्वे भवन्ति भुवि मानवाः॥ २६ | जब द्वापरका अन्त और कलियुगका प्रारम्भ होता है, तब नरकके सभी पापी पृथ्वीपर मनुष्यके रूपमें उत्पन्न होते हैं॥ २६॥ |
| एवं कालसमाचारो नान्यथाभूत्कदाचन।<br>तस्मात्कलिरसत्कर्ता तस्मिंस्तु तादृशी प्रजा॥ २७ | इस प्रकार युगके अनुरूप ही आचार होता है, उसके विपरीत कभी नहीं। कलियुग असत्-प्रधान होता है, इसलिये उसमें प्रजा भी वैसी ही होती है। |