भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 785
७७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कदाचिद्दैवयोगात् प्राणिनां व्यत्ययो भवेत्।<br>कलौ ये साधवः केचिद् द्वापरे सम्भवन्ति ते ॥ २८<br>तथा त्रेतायुगे केचित्केचित्सत्ययुगे तथा।<br>दुष्टाः सत्ययुगे ये तु ते भवन्ति कलावपि ॥ २९<br>कृतकर्मप्रभावेण प्राप्नुवन्त्यसुखानि च।<br>पुनश्च तादृशं कर्म कुर्वन्ति युगभावतः ॥ ३०दैवयोगसे कभी-कभी इन प्राणियोंके जन्म लेनेमें व्यतिक्रम भी हो जाता है। कलियुगमें कुछ जो साधुजन हैं, वे द्वापरके मनुष्य हैं। उसी प्रकार द्वापरके मनुष्य कभी-कभी त्रेतामें और त्रेताके मनुष्य सत्ययुगमें जन्म लेते हैं। जो सत्ययुगमें दुराचारी मनुष्य होते हैं, वे कलियुगके हैं। वे अपने किये हुए कर्मके प्रभावसे दुःख पाते हैं और पुनः युगप्रभावसे वे वैसा ही कर्म करते हैं॥ २७-३०॥
जनमेजय उवाच<br>युगधर्मान्महाभाग ब्रूहि सर्वानशेषतः।<br>यस्मिन्वै यादृशो धर्मो ज्ञातुमिच्छामि तं तथा ॥ ३१जनमेजय बोले— हे महाभाग! आप समस्त युगधर्मोंका पूर्णरूपसे वर्णन करें; जिस युगमें जैसा धर्म होता है, उसे मैं जानना चाहता हूँ॥ ३१॥
व्यास उवाच<br>निबोध नृपशार्दूल दृष्टान्तं ते ब्रवीम्यहम्।<br>साधूनामपि चेतांसि युगभावाद् भ्रमन्ति हि ॥ ३२व्यासजी बोले— हे नृपशार्दूल! ध्यानपूर्वक सुनिये, इस सम्बन्धमें मैं एक दृष्टान्त कहता हूँ। साधुजनोंके मन भी युगधर्मसे प्रभावित होते हैं॥ ३२॥
पितुर्यथा ते राजेन्द्र बुद्धिर्विप्रावहेलने।<br>कृता वै कलिना राजन् धर्मज्ञस्य महात्मनः ॥ ३३<br>अन्यथा क्षत्रियो राजा ययातिकुलसम्भवः।<br>तापसस्य गले सर्पं मृतं कस्मादयोजयत् ॥ ३४हे राजेन्द्र! आपके महात्मा और धर्मज्ञ पिताकी भी बुद्धि कलियुगने विप्रका अपमान करनेकी ओर प्रेरित कर दी थी; अन्यथा ययातिके कुलमें पैदा हुए क्षत्रिय राजा परीक्षित् एक तपस्वीके गलेमें मरा हुआ सर्प क्यों डालते?॥ ३३-३४॥
सर्वं युगबलं राजन्वेदितव्यं विजानता।<br>प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्म विशेषतः ॥ ३५हे राजन्! विद्वान्को इसे युगका ही प्रभाव समझना चाहिये। इसलिये विशेषरूपसे धर्माचरण ही प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये॥ ३५॥
नूनं सत्ययुगे राजन् ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>पराशक्त्यर्चनरता देवीदर्शनलालसाः ॥ ३६<br>गायत्रीप्रणवासक्ता गायत्रीध्यानकारिणः।<br>गायत्रीजपसंसक्ता मायाबीजैकजापिनः ॥ ३७<br>ग्रामे ग्रामे पराम्बायाः प्रासादकरणोत्सुकाः।<br>स्वकर्मनिरताः सर्वे सत्यशौचदयान्विताः ॥ ३८<br>त्रय्युक्तकर्मनिरतास्तत्त्वज्ञानविशारदाः।<br>अभवन्क्षत्रियास्तत्र प्रजाभरणतत्पराः ॥ ३९<br>वैश्यास्तु कृषिवणिज्यगोसेवानिरतास्तथा।<br>शूद्राः सेवापरास्तत्र पुण्ये सत्ययुगे नृप ॥ ४०हे राजन्! सत्ययुगमें सभी ब्राह्मण वेदके ज्ञाता, पराशक्तिकी पूजामें तत्पर रहनेवाले, देवीदर्शनकी लालसासे युक्त, गायत्री और प्रणवमन्त्रमें अनुरक्त, गायत्रीका ध्यान करनेवाले, गायत्रीजपपरायण, एकमात्र मायाबीजमन्त्रका जप करनेवाले, प्रत्येक गाँवमें भगवती पराम्बाका मन्दिर बनानेके लिये उत्सुक रहनेवाले, अपने-अपने कर्मोंमें निरत रहनेवाले, सत्य-पवित्रता-दयासे समन्वित, वेदत्रयी कर्ममें संलग्न रहनेवाले और तत्त्वज्ञानमें पूर्ण निष्णात होते थे। क्षत्रिय प्रजाओंके भरण-पोषणमें संलग्न रहते थे। हे राजन्! उस पुण्यमय सत्ययुगमें वैश्यलोग कृषि, व्यापार और गो-पालन करते थे तथा शूद्र सेवापरायण रहते थे॥ ३६-४०॥
पराम्बापूजनासक्ताः सर्वे वर्णाः परे युगे।<br>तथा त्रेतायुगे किञ्चिन्न्यूना धर्मस्य संस्थितिः ॥ ४१उस सत्ययुगमें सभी वर्णोंके लोग भगवती पराम्बाके पूजनमें आसक्त रहते थे। उसके बाद त्रेतायुगमें धर्मकी स्थिति कुछ कम हो गयी। सत्ययुगमें