धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context१८।८ ] मलवग्गो [ १०९ जेतवन तिस्स (थेर) २४०-अयसा ऽव मलं समुट्ठितं तदुट्ठाय तमेव खादति । एवं अतिधोनचारिनं सानि कम्मानि नयन्ति दुग्गतिं ॥६॥ ( अयस इव मलं समुत्थितं त(स्मा)द् उत्थाय तदेव खादति । एवं अतिधावन्तचारिणं स्वानि कर्माणि नयन्ति दुर्गतिम् ॥६॥) अनुवाद-लोहेसे उत्पन्न मल (= मुर्चा) जैसे जिसीसे उत्पन्न होता है, उसे ही खा डालता है; इसी प्रकार अति चंचल (पुरुष)के अपने ही कर्म उसे दुर्गतिको ले जाते हैं । जेतवन ( ळाल ) उदायी ( थेर ) २४१-असज्झायमला मन्ता अनुट्ठानमला घरा । मलं वण्णस्स कोसज्जं पमादो रक्खतो मलं ॥७॥ ( अस्वाध्यायमला मंत्रा अनुत्थानमला गृहाः । मलं वर्णस्य कौसीद्यं, प्रमादो रक्षतो मलम् ॥७॥ ) अनुवाद-स्वाध्याय (= स्वरपूर्वक पाठकी आवृत्ति) न करना (वेद-)मंत्रोंका मल (= मुर्चा) है, (लीप पोत मरम्मत कर) न उठाना घरोंका मुर्चा है। शरीरका मुर्चा आलस्य है, असावधानी रक्षकका मुर्चा है । राजगृह ( वेणुवन ) कोई कुलपुत्र २४२-मलिथिया दुच्चरितं मच्छेरं ददतो मलं । मला वे पापका धम्मा अस्मिं लोके परम्हि च ॥८॥