धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in context१४ ] धम्मपदं [ २।१० ( प्रमादमप्रमादेन यदा नुदति पण्डितः । प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोकः शोकिनीं प्रजाम् । पर्वतस्थ इव भूमिस्थान् धीरो बालान् अवेक्षते ॥८॥ अनुवाद—पंडित जब अप्रमादसे प्रमादको हटाता है, तो निःशोक हो शोकाकुल प्रजाको, प्रज्ञारूपी प्रासादपर चढ़कर— जैसे पर्वतपर खड़ा ( पुरुष ) भूमिपर स्थित ( वस्तु ) को देखता है—( वैसे ही ) धीर ( पुरुष ) अज्ञानियोंको ( देखता है ) । जेतवन दो मित्र भिक्षु २६—अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो । अबलस्सं 'व सीघस्सो हित्वा याति सुमेधसो ॥६॥ ( अप्रमत्तः प्रमत्तेषु सुप्तेषु बहुजागरः । अबलाश्वमिव शीघ्राश्वो हित्वा याति सुमेधाः ॥९॥ अनुवाद—प्रमादियोंके बीचमें अप्रमादी, सोतोंके बीचमें बहुत जागनेवाला, अच्छी बुद्धिवाला ( पुरुष )—जैसे निर्बल घोड़ेको ( पीछे ) छोड़ शीघ्रगामी घोड़ा ( आगे ) चला जाता है— ( वैसे ही जाता है ) । वैशाली ( कूटागार ) महाली ३०-अप्पमादेन मघवा देवानं सेट्ठतं गतो । अप्पमादं पसंसन्ति पमादो गरहितो सदा ॥१०॥ ( अप्रमादेन मघवा देवानां श्रेष्ठतां गतः । अप्रमादं प्रशंसन्ति प्रमादो गर्हितः सदा ॥१०॥ )