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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन

DevanagariHindipublished213 pages

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७४ ] धम्मपद [ १२।६ अनुवाद—(पुरुष) अपने ही अपना मालिक है, दूसरा कौन मालिक हो सकता है, अपनेको भली प्रकार दमन कर लेने पर ( वह एक ) दुर्लभ मालिकको पाता है । जेतवन महाकाल ( उपासक ) १६१-अत्तना'व कतं पापं अत्तजं अत्तसम्भवं । अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं 'व'स्ममयं मणिं ॥५॥ ( आत्मनैव कृतं पापं आत्मजं आत्मसम्भवम् । अभिमथ्नाति दुर्मेधसं वज्रमिवाश्ममयं मणिम् ॥५॥ ) अनुवाद—अपनेसे जात, अपनेसे उत्पन्न, अपनेसे किया पापं, ( करने- वाले ) दुर्बुद्धिको पाषाणमय वज्रमणीकी ( चोटकी ) भाँति मन्थन (=पीडित ) करता है । जेतवन देवदत्त १६२-यस्सच्चन्तदुस्सीव्यं मालुवा सालमिवोततं । करोति सो तयत्तानं यथा 'नं इच्छती दिसो ॥६॥ ( यस्याऽत्यन्तदौःशील्यं मालुवा शालमिवाततम् । करोति स तथात्मानं यथैनमिच्छंति द्विपः ॥६॥ ) अनुवाद—मालुवालता १ से वेष्टित शाल ( वृक्ष ) की भाँति जिसका दुरा- चार फैला हुआ है; वह अपनेको वैसा ही कर लेता है, जैसा कि उसके शत्रु चाहते हैं । १ मालुवा एक लता है, जो जिस वृक्षपर चढ़ती है, वर्षा पानीके मारसे उसे तोड़ डालती है ।

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