धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
by महापण्डित राहुल सांकृत्यायन
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Read in contextधम्मपदं [ १४।१८ (दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते। यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥) अनुवाद—उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें सुखकी वृद्धि होती है। जेतवन बहुतसे भिक्षु १६४—सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना । सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो ॥ १६॥ (सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना। सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥) अनुवाद—सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है, एकतायुक्त हो तप करना । चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य १६५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके । पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥१७॥ (पूजार्हान् पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् । प्रपंचसमतिक्रान्तान् तीर्णशोकपरिद्ववान् ॥ १७ ॥) १६६-ते तादिसे पूजयतो निब्बुते अकुतोभये । न सक्का पुञ्ञं संख्यातुं इमेत्तमपि केनचि ॥१८॥