श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context४२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बालक विनायकको पकड़कर अपने भवन चला जाऊँगा ॥ २२-२४१/२ ॥ ऐसा कहकर हाथमें खड्ग लिये वह अपनी गर्जनासे दिशाओंको गुंजायमान करता हुआ तथा सम्पूर्ण शत्रुसेनाको खड्ग-प्रहारसे मारता हुआ वहाँ आया। [उस समय] देवता उसके भयसे मूर्च्छित होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंने भगवान् विनायकका स्मरण करते हुए प्राण त्याग दिये। कुछ रक्तप्रवाहिनी नदियोंमें बह गये और कुछ देवता स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २७ ॥ कुछ देवताओंने उस दैत्यको देखते ही अपने प्राण त्याग दिये। तब तितर-बितर हुई वह देवसेना दसों दिशाओंमें भाग गयी। उस दैत्यने भी हाथमें खड्ग लेकर [भागती हुई] देवसेनापर पीछेसे प्रहारकर उसे मार डाला। यह देखकर गरिमाने वृक्षोंसहित एक पर्वतको उस दैत्यके शरीरपर फेंका, [परंतु] उसने उसे अपनी तलवारसे सैकड़ों टुकड़ोंमें काट डाला ॥ २८-२९१/२ ॥ तब आठों सिद्धियोंने क्षुभित होकर उसपर बहुत-से पर्वतोंसे प्रहार किया, [परंतु] उसने अपने खड्ग-प्रहारसे कुशलतापूर्वक उन्हें शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् महिमा [नामक सिद्धि] उछलकर उसके कन्धेपर सवार हो गयी और उस दैत्यके हाथसे शीघ्र ही खड्गको छीनकर अन्तर्धान हो गयी। तदनन्तर उसने बलपूर्वक उस दैत्यके मस्तकपर उसी खड्गसे प्रहार किया, परंतु यह आश्चर्यकी बात थी कि उस प्रहारसे मस्तक तो अप्रभावित रहा, जबकि खड्ग सैकड़ों टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ! ॥ ३०-३२१/२ ॥ तब खड्गके भग्न हो जानेपर वह दैत्य (देवान्तक) बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसने एक-एक सिद्धिको बत्तीस-बत्तीस बाणोंसे मारकर व्याकुल कर दिया। तदनन्तर वे भूमिपर गिर पड़ीं। आठों सिद्धियोंके [रणभूमिमें] गिर जानेपर देवता [देवान्तकसे] युद्ध करने लगे। उधर वे सिद्धियाँ भी एक मुहूर्तमें सावधान हो गयीं और भगवान् विनायकके पास गयीं ॥ ३३-३५ ॥ तब उस [युद्ध-सम्बन्धी] सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर बुद्धिने [भगवान्] विनायकसे कहा- 'उसका विचार कैसे उचित हो सकता है, जिसके पास बुद्धि ही न हो। आपकी सिद्धियाँ पराजित हो चुकी हैं, इसलिये आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं उस दैत्यसे युद्ध करनेके लिये जाऊँगी और उसका पराक्रम देखूँगी' ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'सिद्धिसेनाकी पराजयका वर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥ पैंसठवाँ अध्याय विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना, बुद्धिद्वारा एक भयंकर शक्तिका प्राकट्य और उस शक्तिद्वारा देवान्तककी सेनाका संहार ब्रह्माजी कहते हैं- बुद्धिद्वारा कहे गये वचनको सुनकर भगवान् विनायक हर्षित होकर उससे बोले- भगवान् [विनायक ] बोले- [हे बुद्धि!] तुम जाओ, उस दैत्यसे युद्ध करो और उसे मारकर यशकी प्राप्ति करो ॥ १ ॥ ऐसा कहकर विनायकने उसे सुन्दर वस्त्र प्रदान किये। तब उसने उन देवाधिदेवको सिर झुकाकर उस दैत्य देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥ उस समय उसके द्वारा की गयी सिंहगर्जनासे तीनों लोक कम्पित हो उठे। उसके मुखसे एक श्रेष्ठ शक्ति निकली; जो जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली और संसारका भक्षण करनेके लिये उद्यत थी। वह अपने दोनों विशाल नेत्रोंसे ज्वालासमूहोंका उत्सर्जन कर रही थी ॥ ३-४॥ वह (शक्ति) दैत्यसेनाका दहन करती जा रही थी, जिससे [भयभीत] वह (दैत्यसेना) पलायन कर गयी। उस (शक्ति)-के दर्शनमात्रसे कुछ दैत्य प्राणहीन होकर गिर गये और अन्य दैत्य यह विचार करने लगे कि आज हमें कहाँ जाना चाहिये, कहाँ हम सुखसे रह सकेंगे?