श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
by महर्षि व्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextक्री०ख०-अ०६४ ] * देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय * ४२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंसठवाँ अध्याय देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय ब्रह्माजी कहते हैं— [हे मुने!] कालान्तक दैत्य | मुष्टिकाका कठोर प्रहार किया, जिससे वे भी भूमिपर और प्राकाम्यका परस्पर युद्ध हो रहा था और जब | गिर गये और सैकड़ों खण्डोंमें विभक्त होकर चूर-चूर कालान्तक प्राकाम्यपर विजय पाने ही वाला था, तभी | हो गये॥ १२-१३॥ वशित्वने वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर प्राकाम्यकी सहायता | तब वे सभी अपनी शक्तिसे विजय प्राप्त करके की और अपने हाथकी फुर्तीसे कालान्तकके मस्तकपर | गर्जना करने लगीं। 'विनायक विजयी हुए'—ऐसा वे एक पर्वत-शिखरसे प्रहार किया। उस [प्रहार]-से | सब कहने लगीं। अन्य अल्प बलवाले भी बहुतसे कालान्तक सहसा भूमिपर गिर पड़ा॥ १-२१/२॥ | दैत्य उनके द्वारा विनष्ट कर दिये गये, तब पुनः तब कालान्तकको रक्तसे लथपथ और दो भागोंमें | सभी श्रेष्ठ दैत्यवीर एकत्र होकर सिद्धिसेनाका विनाश विभाजित देखकर दैत्यसेनामें महान् हाहाकार फैल | करने लगे॥ १४-१५॥ गया। तदनन्तर मुसल नामक दैत्यपति और भल्ल नामका | उस समय दोनों सेनाओंमें मारो, मार डालो, बाँध एक अन्य असुर प्राकाम्य [नामक सिद्धि] एवं महिमा | लो, सावधान हो जाओ—इस प्रकारका महान् कोलाहल नामवाली सिद्धि—ये चारों उत्साहपूर्वक युद्धहेतु उद्यत | होने लगा। तदनन्तर शस्त्रोंके आपसमें टकरानेसे अग्नि हो गये। उस समय शस्त्रसे प्रहार करनेवाले अनेक दैत्य | उत्पन्न गयी। योद्धा शस्त्रोंके टूट जानेपर क्रोधित होकर प्राकाम्यसे युद्ध करने लगे॥ ३-५॥ | मल्लयुद्ध करने लगे॥ १६-१७॥ उस युद्धमें असंख्य देवता मरकर टूटे हुए वृक्षकी | पुनः एक-दूसरेका विनाश करनेवाला, अनियन्त्रित भाँति गिर पड़े। रक्तरूपी जलको प्रवाहित करनेवाली | और भयंकर युद्ध होने लगा। तभी सूर्य अस्त हो गये। वहाँ सहस्रों नदियाँ बहने लगीं॥ ६॥ | महान् अन्धकारसे चारों ओर सभी दिशाएँ व्याप्त हो तब ईशिता, वशिता और विभूति [नामक सिद्धियाँ] | गयीं, तब [अग्निगर्भा] दिव्य [प्रकाशमान] औषधियोंको वहाँ आ गयीं और युद्धमें उस प्राकाम्यकी सहायता करने | हाथमें ग्रहणकर वे परस्पर प्रहार करने लगे॥ १८-१९॥ लगीं। उन सिद्धियोंने उन चारों दैत्योंपर चार पर्वत | वह भयंकर युद्ध तीन दिन-रात लगातार चलता गिराये, जिससे वे चूर-चूर हो गये और उन्होंने अत्यन्त | रहा। उस समय दसों दिशाओंमें वीरोंको बहा ले दुर्लभ स्वर्गको प्राप्त किया॥ ७-८॥ | जानेवाली रक्तकी नदियाँ बहने लगीं॥ २०॥ युद्धमें अणिमाने बलपूर्वक कर्दमकी चोटी पकड़कर | वे नदियाँ ढालरूपी कछुओं, खड्गरूपी मछलियों, सहसा उसे पटक दिया, जिससे वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त | हाथीरूपी मगरमच्छों, शवरूपी काष्ठों, शिररूपी कमलों होकर चूर-चूर हो गया। उसके मुखसे रक्तका स्राव होने | और केशरूपी शैवालोंसे सुशोभित हो रही थीं। वे लगा तथा उसने भूमिपर लुढ़कते हुए प्राण त्याग दिये। | कायरोंको भय देनेवाली और वीरोंके महान् हर्षको तदनन्तर महिमा, लघिमा और गरिमाने यक्षमासुर, तालजंघ | विशेषरूपसे बढ़ानेवाली थीं॥ २११/२॥ तथा दीर्घदन्तपर वृक्षसमूहोंसे प्रहार किया॥ ९-१०१/२॥ | तब बलवान् देवताओंके सदा विजयी होनेपर तब घण्टासुर, रक्तकेश और दुर्जय नामवाले | देवान्तक चिन्ता करते हुए अपने मनमें विचार करने लगा महाबलशाली दैत्य लम्बी साँस लेते हुए अपनी सम्पूर्ण | कि मैंने अपने पराक्रमसे समस्त देवसमूहोंपर विजय प्राप्त सेनाओंके साथ आये॥ १११/२॥ | की, फिर इस बालककी जन-सामान्यको मोहित करनेवाली उन [दैत्यों]-के द्वारा अपनी सेनाको मारा जाता | तुच्छ माया मेरे समक्ष क्या है? मैं अभी अष्टसिद्धियों देखकर वशिता आदि सिद्धियोंने उनके मस्तकपर अपनी | और उनकी सम्पूर्ण सेनाका नाश कर डालूँगा और इस