भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 656 में से

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पृष्ठ 426

४२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बालकने मायासे यह सब किया है ॥ १९-२१ ॥ 'अब मैं या तो स्वयं मर जाऊँगा या इसे मार डालूँगा; क्योंकि जीवनका त्याग तो किया जा सकता है, परंतु यशका नहीं।' दैत्येन्द्रके इस प्रकार कहनेपर उसके सेनापतियोंने कहा- 'हम लोग सेनाके अग्रभागमें रहकर युद्ध करेंगे, आप सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करें, विजय हमारी ही होगी।' तब उनके वचनरूपी अमृतका पानकर हर्षित हुए देवान्तकने कहा- 'हे महावीरो! आप लोगोंने उचित बात कही है। [अब] आप लोग युद्धके लिये प्रस्थान करें, मैं भी आता हूँ। मेरा आशीर्वाद है कि आप सब पुण्य कर्म करनेवालोंकी विजय होगी' ॥ २२-२४ ॥ [तदनन्तर] देवान्तकसे आशीष ग्रहणकर और उसे नमस्कारकर कर्दम नामक दैत्य रथकी आकृतिवाले व्यूहका भेदन करनेके लिये गया। गरिमा [नामक सिद्धि]-के प्रधान वीरोंद्वारा निर्मित, वीरोंको मोहित करनेवाले अत्यन्त दुर्भेद्य चक्रव्यूहका भेदन करनेके लिये दीर्घदन्त [नामक दैत्य] गया ॥ २५-२६ ॥ प्रथिमाद्वारा रक्षित व्यूहका भेदन करनेके लिये तालजंघ [नामक दैत्य] प्रसन्नतापूर्वक गया। महिमाद्वारा निर्मित व्यूहके भेदनके लिये यक्ष्मा नामका दैत्य गया। प्राप्तिद्वारा विरचित व्यूहके भेदनहेतु महान् [दैत्य] घण्टासुर गया और बलशाली रक्तकेश प्राकाम्यरचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २७-२८ ॥ वशितारचित श्रेष्ठ व्यूहका भेदन करनेके लिये कालान्तक गया और दुर्जय नामक बलवान् दैत्य ईशिताद्वारा रचित व्यूहका भेदन करने गया ॥ २९ ॥ इन सबकी सामर्थ्यका वाणीसे वर्णन करना सम्भव नहीं है। वे आठों महाबलवान् दैत्य आठों सिद्धियोंद्वारा निर्मित [सैन्य] व्यूहोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ३० ॥ [उस समय] दोनों ओरके सैनिक दूसरे पक्षको अत्यन्त दुर्जय मानते हुए परस्पर एक-दूसरेको मार रहे थे। वे इस प्रकार बाणवर्षा कर रहे थे, जैसे बादल मूसलाधार वर्षा करते हैं ॥ ३१ ॥ वीरगण अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे शत्रुओंके सिर काट रहे थे। उस समय वहाँ मारे गये हाथियों, घोड़ों और वीरोंकी कटी हुई जंघाओं, घुटनों, हाथोंके कारण पृथ्वी [चलनेमें] अत्यन्त दुर्गम हो गयी थी। कुछ वीर ढालको आगे करके शत्रुओंके पैर तोड़ दे रहे थे ॥ ३२-३३ ॥ कुछ वीर उछलकर पर्वतकी भाँति शत्रुओंपर गिरकर उन्हें चूर्ण कर डालते थे। धूलसे इतना अन्धकार छा गया था कि अपने ही पक्षके सैनिक परस्पर अपनोंको नहीं जान पा रहे थे। तभी अचानक देवताओंद्वारा मारे गये बहुत-से दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े और वैसे ही दैत्योंके द्वारा मारे गये देवगण भयानक चीत्कार करते हुए गिर पड़े ॥ ३४-३५ ॥ वहाँ (उस रणभूमिमें) शिरविहीन धड़ युद्ध कर रहे थे, जिसे देखकर अप्सराएँ प्रसन्न हो रहीं थीं। शस्त्रप्रहारसे रक्तस्राव होनेके कारण वीर योद्धा पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३६ ॥ शुक्राचार्य मरे हुए दैत्योंको अपनी [संजीवनी] विद्यासे पुनः जीवित कर दे रहे थे, इससे आठों व्यूहोंके बलवान् देवसैनिक चिन्तित हो उठे। तदनन्तर शुक्राचार्यकी इस चेष्टाको उन सबने ईशितासे कहा। तब उसके क्रोधावेशित होनेपर उसके मुखसे एक कृत्या निकलकर उसके सामने आ खड़ी हुई। ईशिताने उसे आँखके संकेतसे आज्ञा दी, तब वह कृत्या भार्गव शुक्राचार्यको अपने गुह्यांगमें रखकर अन्तर्धान हो गयी और उन्हें ले जाकर बर्बरदेशमें छोड़ दिया। इसीलिये मनीषी लोग उन्हें बर्बरदेशीय कहते हैं ॥ ३७-३९१/२ ॥ तदनन्तर (शुक्राचार्यके रणक्षेत्रसे दूर चले जानेपर) देवता प्रसन्न हो गये और बलान्वित होकर (उत्साहपूर्वक) युद्ध करने लगे। तब उनके द्वारा मारे जाते हुए दितिपूत्र (दैत्यगण) भागने लगे। उनमेंसे कुछ दैत्य उनकी शरणमें चले गये और कुछ अणिमादि सिद्धियोंद्वारा प्रादुर्भूत देवताओं एवं गन्धर्वोंसे 'रक्षा करो, रक्षा करो'- ऐसा कहने लगे ॥ ४०-४११/२ ॥ उस युद्धमें कभी दैत्यगण विजयी होते थे और कभी देवताओंकी विजय होती थी। एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे वे युद्धमें संलग्न थे। तदनन्तर अस्त्र- शस्त्रोंके युद्धसे उपरत होकर उनमें भयंकर मल्लयुद्ध होने लगा ॥ ४२-४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'शुक्रत्याग' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥