श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६३ ] * अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध * ४२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिरसठवाँ अध्याय अणिमादि सिद्धियोंकी सेनाका देवान्तककी सेनासे युद्ध दूतोंने कहा—हे राजन्! कालको भी भयभीत | विनायकने सिद्धिसे कहा कि [इस सेनापर विजय पाना] कर देनेवाले तथा नभःस्पर्शी मस्तकवाले अनेक प्रकारके | अकेलेके लिये साध्य नहीं है, अतः इस दैत्यपर विजय असंख्य भयंकर दैत्योंसे घिरे हुए महाभयंकर दैत्य | पानेके लिये तुम मेरी आज्ञासे अनेक प्रकारकी अपनी देवान्तकने आपकी नगरीको घेर लिया है। उसे देखकर | सेनाका निर्माण करो ॥ १११/२ ॥ हम लोग घबराकर आपके पास चले आये हैं। अब | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] तब सिद्धिने आपको जो करना हो, वह करें ॥ १-२ ॥ | परमात्मा विनायकके चरणकमलोंमें नमस्कार करके ब्रह्माजी कहते हैं—[हे मुने!] दूतके मुखसे | देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया और ऐसी [नरान्तकके आक्रमणका] सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनकर राजा | गर्जना की, जिसकी अनुगूँज सम्पूर्ण प्राणियों और काँपने लगे। वे अत्यन्त म्लान होकर शिशुओंके मध्य | दैत्योंके लिये भयदायिनी थी ॥ १२-१३ ॥ खेल रहे बालक विनायकके पास गये और उनसे सारा | उसके उस गर्जनकी महान् ध्वनि और उसके वृत्तान्त कहा— ॥ ३१/२ ॥ | प्रत्येक शब्दकी अनेक प्रतिध्वनियोंसे पर्वत और वृक्ष- राजा बोले—लीलापूर्वक मनुष्य शरीर धारण | समूहोंसहित [पृथ्वीको धारण करनेवाले] शेषनाग तथा करनेवाले हे परमात्मन्! आपको नमस्कार है। अनेक | द्युलोक भी चलायमान हो गये ॥ १४ ॥ प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हे जड़-चेतनात्मक जगत्के | तदनन्तर सिद्धिने अष्ट सिद्धियोंका स्मरण किया, गुरु! आपको नमस्कार है। बालस्वरूप धारण किये हुए | वे सब भी वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आ गयीं। सबसे पहले आपके द्वारा हम सबकी अनेक बार रक्षा हुई है; हे प्रभो! | अणिमा [नामक सिद्धि] आयी, तदनन्तर गरिमा और इस समय भी आप हमारी इस देवान्तकसे रक्षा | उसके बाद महिमा एवं लघिमा [सिद्धियाँ] भी वहाँ कीजिये ॥ ४-५१/२ ॥ | आयीं। तत्पश्चात् प्राप्ति, प्राकाम्य और वशित्व सिद्धियाँ ब्रह्माजी कहते हैं—काशिराजद्वारा इस प्रकार | भी वहाँ आयीं। उसके बाद ईशित्व [नामक सिद्धि] प्रार्थना किये जानेपर बालक [विनायक]-ने विशाल | वहाँ आयी, तदनन्तर हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके स्वरूप बनाकर हाथमें धनुष लेकर सिद्धि-बुद्धिसहित | अनेक यूथों (समूहों)-से युक्त उनकी [विशाल] सेना सिंहपर आरूढ़ होकर गर्जना की, जिससे पर्वतोंकी | वहाँ प्रकट हो गयी ॥ १५-१७ ॥ गुफाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ६-७ ॥ | जिस प्रकार वर्षाकालमें नदियाँ सभी ओरसे [बहती अपने तेजसे सूर्यको तिरोभूत करते हुए तथा मुखसे | हुई] समुद्रमें जाती हैं, उसी प्रकार युद्धकी लालसावाली अग्निकणोंका वमन करते हुए उन्होंने अपने हाथोंमें | वह सेना दसों दिशाओंसे वहाँ आ रही थी ॥ १८ ॥ बाण, खड्ग, परशु और धनुषको धारण किया ॥ ८ ॥ | वह सेना अगणित [रण-] वाद्योंकी ध्वनि और तदनन्तर वे [बालकरूपधारी भगवान्] विनायक | वीरोंकी गर्जनासे अत्यन्त गुंजायमान हो रही थी। आकाशमार्गसे नगरके बाहर आये और उन्होंने अपने | भूमण्डलको ग्रास बना लेनेके लिये उत्सुक कालसदृश सिंहनादसे दैत्योंके मनको परिकम्पित कर दिया ॥ ९ ॥ | उन वीरोंको युद्धके लिये आया देखकर देवान्तकने अपने वहाँ उन्होंने दुर्धर्ष [दैत्य] देवान्तकको तथा उस | मनमें विचार किया कि मैं तो यह सोच करके आया था दुष्टकी सेनाको देखा। उस समय वहाँपर टिड्डियोंकी | कि क्षणमात्रमें इस बालकको पकड़ ले जाऊँगा, परंतु भाँति असंख्य दैत्य भ्रमण कर रहे थे ॥ १० ॥ | अचानक यह इस प्रकारकी सेना कहाँसे निकल आयी! उस अनेक प्रकारकी सेनाको देखकर विघ्नराज | मैं इसकी अद्भुत सामर्थ्य देख रहा हूँ। [अवश्य ही] इस