BharatKosha
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

Page 219 of 634

Read in context
Page 219

काण्ड ]
नीतिसार
२०९


हो जाते हैं, किंतु सूखे हुए वृक्ष और मूर्ख मनुष्य टूट सकते हैं पर झुक नहीं सकते; अर्थात् वे विनयावनत नहीं हो सकते।<sup></sup>

जिस प्रकार बिना याचना किये ही दुःख जीवनमें आते हैं और स्वतः चले भी जाते हैं [उसी प्रकार सुखकी भी यही स्थिति है], कामना करनेवाला मनुष्य तो मार्जार (बिल्ली)-की तरह दुःखोंको ही प्राप्त करता है। सज्जन पुरुषके आगे-पीछे सम्पदाएँ सर्वदा घूमती रहती हैं, दुर्जनके लिये इससे विपरीत स्थिति होती है। अतः जैसा अच्छा लगे वैसा करें। सज्जनता और दुर्जनताका आचरण करना मनुष्यपर निर्भर है।

छः कानोंतक पहुँची हुई गुप्त मन्त्रणा नष्ट हो जाती है। अतः मन्त्रणाको चार कानोंतक ही सीमित रखना चाहिये। दो कानोंतक स्थित मन्त्रणाको तो ब्रह्मा भी जाननेमें समर्थ नहीं हैं।<sup></sup>

उस गायसे क्या लाभ है, जो न दूध देनेवाली है और न गर्भिणी है? उस पुत्रके उत्पन्न होनेसे भी क्या लाभ है, जो न तो विद्वान् है और न धार्मिक? विद्यासम्पन्न एवं बुद्धिमान् तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ एकमात्र सुपुत्रसे भी मनुष्यका कुल वैसे ही सुशोभित हो जाता है, जैसे एक ही चन्द्रमासे आकाश-मण्डल चमकने लगता है। जिस प्रकार एक ही सुपुष्पित और सुगन्धित वृक्षसे सम्पूर्ण वन सुवासित हो जाता है, उसी प्रकार एक ही सुपुत्रसे सम्पूर्ण कुल पवित्र हो जाता है। मनुष्यके लिये गुणवान् एक ही पुत्र अच्छा है, गुणहीन सौ पुत्रोंसे क्या लाभ? चन्द्रमा अकेले ही अन्धकारको नष्ट कर देता है, किंतु हजारों ज्योतिष्पुञ्ज उस अन्धकारको दूर करनेमें असफल रहते हैं।<sup></sup>

मनुष्यको पाँच वर्षतक पुत्रका प्यारसे पालन करना चाहिये, दस वर्षतक उसे अनुशासित रखना चाहिये तथा सोलह वर्षकी अवस्था प्राप्त होनेपर उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिये।<sup></sup>

कुछ व्याघ्र हरिणके समान मुखवाले होते हैं, कुछ हरिण व्याघ्रमुखवाले होते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपके परिज्ञानमें पद-पदपर अविश्वास बना ही रहता है। इसलिये बाह्य आकृतिसे प्राणीकी अन्तःप्रवृत्तिको नहीं जानना चाहिये।<sup></sup>

क्षमाशील व्यक्तियोंमें एक ही दोष है, दूसरा दोष नहीं है। दोष यह है कि जो क्षमाशील होते हैं, मनुष्य उनको अशक्त (असमर्थ) मानता है—

एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
(११४।६२)

प्राणीको यह शास्त्रमत स्वीकार कर लेना चाहिये कि संसारके समस्त भोग क्षणभंगुर ही हैं, इसीलिये अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले स्निग्ध-सुन्दर सुखोपभोगोंके प्रति विद्वान् पुरुषके विचार स्थिर एवं तटस्थ रहते हैं। उनके मनमें उन विषय-वासनाओंके लिये आकर्षण नहीं होता।

हे शौनक! बड़ा भाई पिताके समान है। पिताकी मृत्युके पश्चात् वह सभी छोटे भाइयोंका


१-नात्यन्तं मृदुना भाव्यं नात्यन्तं क्रूरकर्मणा। मृदुनैव मृदुं हन्ति दारुणेनैव दारुणम्॥
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं नात्यन्तं मृदुना तथा। सरलास्तत्र छिद्यन्ते कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥
नमन्ति फलिनो वृक्षा नमन्ति गुणिनो जनाः। शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च भिद्यन्ते न नमन्ति च॥ (११४।४९–५१)
२-षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रश्चतुःकर्णश्च धार्यते। द्विकर्णस्य तु मन्त्रस्य ब्रह्माप्यन्तं न बुध्यते॥ (११४।५४)
३-एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन धीमता। कुलं पुरुषसिंहेन चन्द्रेण गगनं यथा॥
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वनं सुवासितं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥
एको हि गुणवान् पुत्रो निर्गुणेन शतेन किम्। चन्द्रो हन्ति तमांस्येको न च ज्योतिः सहस्रकम्॥ (११४।५६–५८)
४-लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥ (११४।५९)
५-केचिन्मृगमुखा व्याघ्राः केचिद्व्याघ्रमुखा मृगाः। तत्स्वरूपपरिज्ञाने ह्यविश्वासः पदे पदे॥ (११४।६१)

गरुड़ पुराण · Page 219 of 634 · BharatKosha