भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

पिता ही है; क्योंकि वह सभीका पालन-पोषण करता है। वह समस्त छोटोंके प्रति एक-समान भाव रखता है। वह समान उपभोग करनेवाले परिजनोंके विषयमें वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा अपने पुत्रोंके प्रति उसका व्यवहार होता है। अतः छोटे भाइयोंको बड़े भाईके प्रति पिताके समान आदर-भाव रखना चाहिये।<sup></sup>

कम शक्तिशाली वस्तुओंका समुदाय (संगठन) भी अत्यधिक शक्तिसम्पन्न हो जाता है, जैसे तृणको बटकर बनायी गयी रस्सीसे हाथी भी बाँध लिया जाता है।

जो दूसरेका धन चुराकर दान देता है, वह नरकमें जाता है। जिसका धन है उसीको उस दानका फल प्राप्त होता है। देव-द्रव्य (देवताओंके पूजन आदिमें समर्पित किये जाने योग्य द्रव्यों)-के विनाश करनेसे, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे एवं ब्राह्मणका तिरस्कार करनेसे मनुष्योंके वंश नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्महन्ता, मद्यपी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पापियोंके पापका शमन<sup></sup> हो सकता है, किंतु सज्जनोंके द्वारा किये गये उपकारके प्रति कृतघ्नता करनेवाले कृतघ्न व्यक्तिका निस्तार सम्भव नहीं है।

मनुष्यको भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रुके भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि भली प्रकारसे न बुझायी गयी अग्नि भी संसारको भस्म कर सकती है।

जो नयी अवस्थामें अर्थात् युवावस्थामें शान्त रहता है, वही शान्त-स्वभाव है, ऐसा मेरा विचार है; क्योंकि धातुक्षय आदि सब प्रकारकी शक्तियोंके समाप्त हो जानेपर किसमें शान्ति नहीं आ जाती? अर्थात् उस अवस्थामें तो सभी शान्त हो जाते हैं—

नवे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मे मतिः।
धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते॥
(११४।७३)

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! सार्वजनिक मार्गके समान सभी सम्पदाएँ सर्वमान्य हैं। अतएव 'यह सम्पदा मेरी है', ऐसा मानकर मनुष्यको प्रसन्न नहीं होना चाहिये।
(अध्याय ११४)


नीतिसार

सूतजीने कहा—मनुष्यको गुणहीन पत्नी, दुष्ट मित्र, दुराचारी राजा, कुपुत्र, गुणहीन कन्या और कुत्सित देशका परित्याग दूरसे ही कर देना चाहिये।

कलियुगमें धर्म समाजसे निकल जाता है, तपमें स्थिरता नहीं रहती, सत्य प्राणियोंके हृदयसे दूर हो जाता है, पृथिवी वन्ध्या होकर फलहीन हो जाती है, मनुष्य कपट-व्यवहार करने लगते हैं, ब्राह्मणोंमें लालच आ जाता है, पुरुषजन स्त्रीके वशीभूत हो जाते हैं, स्त्रियाँ चंचल हो उठती हैं और नीच प्रवृत्तिके लोग ऊँचे पदोंपर आरूढ़ हो जाते हैं। अतः इस कलिकालमें जीवित रहना निश्चित ही बहुत कष्टसाध्य है। जो प्राणी मर गये हैं, वे ही धन्य हैं। वे लोग धन्य हैं जो राज्यानुशासनसे टूट रहे देश, विनष्ट होते हुए कुल, परासक्त पत्नी तथा दुराचरणमें आसक्त पुत्रको नहीं देखते हैं।

कुपुत्रके होनेपर मनुष्यको सुख-शान्ति नहीं मिलती है। दुराचारिणी पत्नीमें प्रेम कहाँ है? दुर्जन मित्र विश्वासके योग्य नहीं होता है और राज्यके


१-ज्येष्ठः पितृसमो भ्राता मृते पितरि शौनक। सर्वेषां स पिता हि स्यात् सर्वेषामनुपालकः॥
कनिष्ठेषु च सर्वेषु समत्वेनानुवर्तते। समोपभोगजीवेषु यथैवं तनयेषु च॥ (११४।६४-६५)
२-इन पापोंके शमनके लिये शास्त्रोंमें प्रायश्चित्तका विधान है, परंतु कृतघ्नके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।