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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १६ ॥ २८६ संवत्सरं प्रयुङ्क्ते) सो जो फाल्गुनी पूर्णमासी पर चातुर्मास्यों से यज्ञ करता है, आरम्भ से ही वह संवत्सर का प्रयोग करता है। (अथो एते वै भैषज्ययज्ञाः, यत् चातुर्मास्यानि) फिर यह ही ओषधियज्ञ हैं, जो चातुर्मास्य यज्ञ हैं। (तस्मात् ऋतुसन्धिषु प्रयुज्यन्ते, ऋतुसन्धिषु वै व्याधिः जायते) इसलिये ऋतुओं के मेल पर उनका प्रयोग होता है, ऋतुओं के मेल पर ही रोग होता है। (तानि एतानि अष्टौ हवींषि भवन्ति, अष्टौ वै चतसृणां पौर्णमासीनां हवींषि भवन्ति, चतसृणां वै पौर्णमासीनां वैश्वदेवं समासः) सो यह आठ हवि होते हैं, आठ ही चारों पूर्णमासी के हवि होते हैं, चारों ही पूर्णमासी का वैश्वदेव हवि संग्रह है। (अथ यत् अग्निं मन्थन्ति, प्रजापतिः वै वैश्वदेवं प्रजात्यै एव) फिर जो अग्नि को मथते हैं, प्रजापति [नाम वाला सूर्य वा संवत्सर का यज्ञ] ही वैश्वदेव [सब देवताओं का हवि] सन्तान उत्पत्ति के लिये ही है। (अथ एनं दैवं गर्भं प्रजनयति) फिर [यजमान] के लिये दिव्य गर्भ वह [प्रजापति] उत्पन्न करता है। (अथ यत् सप्तदश सामिधेन्यः, सप्तदशः वै प्रजापतिः, प्रजापतेः आप्त्यै) फिर जो सत्रह सामिधेनी [अग्नि प्रज्वलन मन्त्र] हैं, सत्रह अवयव वाला [बारह महीने और पांच ऋतुयें जिसमें हैं, हेमन्त शिशिर का मेल है—ऐतरेय ब्राह्मण १ । १ ।] ही प्रजापति [संवत्सर] है, प्रजापति के तृप्ति के लिए यह है। (अथ यत् सद्गन्तौ आज्यभागौ असिसन्ति इति वै सद्गन्तौ भवतः) फिर जो श्रेष्ठ पदार्थ वाले दो आज्य भाग हवि को डालते हैं; वे ही दोनों श्रेष्ठ पदार्थ होते हैं। (अथ यत् विराजौ संयाज्ये, अन्नं श्रीः वै विराट्, अन्नाद्यस्य श्रियः अवरुद्ध्यै) फिर जो दो विराट् छन्द संयाज्य [ऋचायें] हैं, अन्न और श्री [लक्ष्मी वा शोभा] ही विराट् है, भोजन योग्य अन्न और श्री की रक्षा के लिए यह है। (अथ यत् नव प्रयाजाः नव अनुयाजाः अष्टौ हवींषि नवमं वाजिनं, तत् न अक्षरीयां विराजम् आप्नोति) फिर जो नौ प्रयाज, नौ अनुयाज, आठ हवि और नवाँ वाजिन हवि है, उससे अब अविनाशिनी विराट् [अन्न और लक्ष्मी] वह पाता है। (अथो दशनीं विराजम् आहुः इति प्रयाजानुयाजा हवींषि आघारौ आज्यभागौ इति) (व्याधिः) रोगः (वैश्वदेवम्) विश्वेषां देवानां हविः (समासः) सम्+असु क्षेपणे—घञ् । समाहारः । संग्रहः (मन्थन्ति) मन्थ विलोडने । विलोडयन्ति । (प्रजात्यै) सन्तानोत्पादनाय (दैवम्) दिव्यम् । मनोहरम् (सामिधेन्यः) समिधामाधाने णेण्यण् (वा० पा० ४।३।१२०) समिध्—णेण्यण्, ङीष् । अग्नि- समिन्धनमन्त्राः । धाय्याः (सप्तदशः) सप्तदशावयवयुक्तः (प्रजापतिः) संवत्सरः (आप्त्यै) पर्याप्त्यै । तृप्तये (सद्गन्तौ) श्रेष्ठपदार्थयुक्तौ (असिसन्ति) आर्षप्रयोगः । असु क्षेपणे-स्वार्थे सन् । असिसिषन्ति । अस्यन्ति (अवरुद्ध्यै) अव+रुधिर् आवरणे—क्तिन्, रक्षायै । (वाजिनम्) महेरिटण् (उ० २।५६) वज गतौ— इनण् । हविर्विशेषः (न) सम्प्रति—निरु० ७।३१। (अक्षरीयाम्) अक्षर-छः । नाशशून्याम् (विराजम्) विविधैश्वर्य्यम् (दशनीम्) लेखकप्रमादः । दशमीम् । दशाक्षराम् ॥ १९