गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ५ ॥ ३१५ अप्रयोगात्, यथोक्तानां दक्षिणानां वा अप्रदानात्, हीनात् वा अतिरिक्तात् वा, भूतेषु उत्पातात्, प्रायश्चित्तव्यतिक्रमात् इति) वह ही निश्चय करके छिद्र [दूषण] होता है— ऋत्विजों और यजमान के अपमान से, अथवा इनकी अनपेक्षा से, अथवा मन्त्र, कल्प [कर्मपद्धति, संस्कारविधि] और ब्राह्मणों [ब्राह्मण ग्रन्थों में कहे विधानों] के प्रयोग न करने से, अथवा यथोक्त दक्षिणाओं के न देने से, अथवा न्यून वा अधिक [देने] से, अथवा प्राणियों पर उत्पात [भूकम्प आदि उपद्रव] से, अथवा प्रायश्चित्त के उल्लंघन से । (इति एतत् वै सर्वं ब्रह्मणि अर्पितम्) यह सब [विघ्नों की रोक] ही ब्रह्मा पर निर्भर है । (विद्वान् ब्रह्मा एव, यत् भृग्वङ्गिरोवित् सम्यक् अधीयानः, चरितब्रह्मचर्यः अन्यूनातिरिक्ताङ्गः, अप्रमत्तः, यज्ञं रक्षति) विद्वान् ब्रह्मा ही, जो भृगु अङ्गिराओं [परिपक्व ज्ञानों चारों वेदों] का जानने वाला, यथाविधि पढ़ा हुआ, ब्रह्मचर्य किये हुये, न्यून वा अधिक अङ्ग न रखने वाला [अङ्ग भङ्ग], न चूकने वाला है, यज्ञ की रक्षा करता है । (तस्य प्रमादात् यदि वा अपि असांनिध्यात्, यथा भिन्ना नौः अगाधे महति उदके संप्लवेत्, मत्स्य-कच्छप- शिशुमार-नक्र-मकर-पुण्डरीक-जषर-जसपिशाचानां भागधेयं भवति, एवमादीनाम् अन्येषां विनष्टोपजीविनां च) उस [ब्रह्मा] की भूल से अथवा समीप न रहने से, जैसे टूटी नाव अथाह बड़े जल में डूब जाती है, और मच्छ, कच्छ, शिशुमार, नाके, मगर, पुण्डरीक, जषर, जस, पिशाचों [मांसाहारियों] का भाग हो जाती है, इसी प्रकार दूसरे अपने आश्रितों के नष्ट करने वालों का [भाग होती है] । (एवं खलु अपि छिन्नभिन्नः अपध्वस्तः उत्पाताद्भुतः बहुलः, अथर्वाभिः असंस्कृतः यज्ञः असुरगन्धर्वयक्षराक्षस- पिशाचानां भागधेयं भवति, एवमादीनाम् अन्येषां विनष्टोपजीविनां च) इसी प्रकार निश्चय करके टूटा फूटा, नष्ट हुआ, उत्पात [भूकम्पादि उपद्रव] से आश्चर्य युक्त किया हुआ, बहुत दोष ग्रहण करने वाला, अथर्वों [चारों वेदों के निश्चल ज्ञानों] से न संस्कार किया हुआ यज्ञ असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाचों [मांसाहारियों] का भाग होता है, और इसी प्रकार के दूसरे अपने आश्रितों के नष्ट करने वालों का [भाग होता है] । (तत् अपि श्लोकाः) उस विषय में ही श्लोक हैं ॥ दरहितः (असान्निध्यात्) नञ् + सन्निधि—प्यञ् । अनैकट्यात् (सम्प्लवेत्) निमज्जेत् (पुण्डरीकः) फर्फरीकादयश्च (उ० ४ । २०) पुडि मर्दने—ईकन् प्रत्ययान्तो निपातितः । जलजन्तुविशेषः (जषरः) ऋच्छेररः (उ० ३ । १३१) जष हिंसायाम्—अरः, हिंस्रजलजन्तुः (जसः) जष हिंसायाम्—घः । झषः । हिंसकमत्स्यभेदः (विनष्टोपजीविनाम्) विनष्टाश्रितानाम् (उत्पाताद्भुतः) उपद्रवविस्मितः (बहुलः) बहु + ला आदाने—कः । बहुदोषग्राहकः (अपतत्) पतति । अधोगच्छति (संवत्सरविरिष्टम्) संवत्सरयज्ञाद् विनष्टं कर्म (दक्षिणतः) दक्ष वृद्धौ—इनन्, स्वार्थे तसिल् । वृद्धिमान् (चातुर्हौत्रविनिर्मितः) चतुर्होतृ--अण् स्वार्थे, अनुशतिकादीनां च (पा० ७ । ३ । २०) उभयपदवृद्धिः । चतुर्होतृभिविरचितः (अनुमन्त्रणैः) अनुकूलविचारैः (विभ्रंशम्) भ्रंशु अधःपतने- घञ् । विनाशम् (वृणीयात्) स्वीकुर्यात् ॥