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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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३१८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ६ ॥ हैं, दो अश्वी दो अध्वर्यु [के समान] हैं, इसलिये दो अध्वर्यु घर्म [ यज्ञ वा पात्र विशेष ] को यथावत् धारण करते हैं । (तं सम्भृत्य ऊचतुः, ब्रह्मन् घर्मेण प्रचरिष्यामः, होतः घर्मम् अभिष्टुहि, उद्गातः सामानि गाय इति ) उस [यज्ञ] को यथावत् धारण करके वे दोनों [अध्वर्यु] बोले—हे ब्रह्मन् ! [ ब्रह्मा ] घर्म से हम कार्य करेंगे, हे होता घर्म की तू स्तुति कर, [इतने को ऐ० ब्रा० १ । १८ से मिलाओ], हे उद्गाता ! तू साममन्त्रों को गा । (घर्मं प्रचरत इति अनुजानाति) घर्म को तुम सब काम में लाओ—यह वह [ब्रह्मा] आज्ञा देता है । (ब्रह्मप्रसूताः हि प्रचरन्ति, इदं ब्रह्म ह्य प्रसवानाम् ईशे, सवितृप्रसूततायै घर्मं तपामि, जज्ञानं ब्रह्म, इयं पित्र्या राष्ट्री अग्रे एतु इति) क्योंकि ब्रह्मा से प्रेरित [ऋत्विग् लोग] कार्य करते हैं—यह ब्रह्म [परमात्मा] ही उत्पन्न पदार्थों का ईश्वर है, सविता [सर्वप्रेरक परमात्मा] से प्रेरणा के लिये घर्म [यज्ञपात्र] को तपाता हूँ, [इन दो प्रतीकों को अथर्व० ५ । २४ । १ से मिलाओ], विद्यमान ब्रह्म, और यह पिता [जगत् पिता परमेश्वर] से आयी हुई राजराजेश्वरी [वेदवाणी] हमारे आगे आवे [यह दोनों प्रतीक अथर्व० ४ । १ । १ तथा २ के हैं]। (ताप्यमानं घर्मं रूपसमृद्धाभिः शंसैऋवत् अर्धर्चशः आहावप्रतिगरवर्जं उपासीत ) तपाते हुये घर्म को रूप [प्रयोजनीय आशय] से सम्पन्न, स्तुति वाली आधी-आधी ऋचाओं से झगड़ा और प्रत्युत्तर छोड़ कर वह [यजमान] सेवे । (एतत् वै यज्ञस्य समृद्धं, यत् रूपसमृद्धम्, यत् क्रियमाणं कर्म ऋग् यजुः वा अभिवदति) यह ही यज्ञ की सम्पन्नता [सिद्धि] है जो रूप [प्रयोजनीय आशय] की सम्प- न्नता है—[अर्थात्] जिस किये जाते हुये कर्म को ऋचा वा मन्त्र बताता है । (स्वस्ति तस्य यज्ञस्य पारम् अश्नुते यः एवं वेद) कल्याण के साथ उस यज्ञ का पार वह पाता है, जो ऐसा जानता है ॥ (वेदमियुनं वै एतत् यत् धर्मः, तस्मात् अन्तर्धाय प्रचरन्ति, अन्तर्हिताः वै मिथुनं चरन्ति इति) यह वेदोक्त मिथुन व्यापार ही है जो यह घर्म है, इसलिये गुप्त हो कर ही इसको वे सेवते हैं, गुप्त होकर ही मिथुन व्यापार लोग करते हैं । १ । (तत् एतत् एव मिथुनम् इति आचक्षते ) वह ही यहं मिथुन व्यापार है—ऐसा लोग कहते हैं । २ । (तस्य यः घर्मः तत् शिश्नं, यौ शफौ तौ आण्डयौ, ये उपयमनी ते श्रोणिकपाले, यत् पयः तत् रेतः, तत् अग्नौ देवयोन्यां ब्रह्ममयं रेतः प्रजनाय धत्ते ) ऐ० ब्रा० १ । १८ ( सम्भरतः )—ऐ० ब्रा० १ । १८ ( प्रचरिष्यामः) अनुष्ठास्यामः (अनुजानाति) आज्ञापयति (ब्रह्मप्रसूताः) ब्रह्मणा चतुर्वेदविदा प्रेरिताः (प्रसवा- नाम् ) उत्पन्नपदार्थानाम् ( ईशे ) तलोपः । ईष्टे । ईश्वरोऽस्ति (घर्मम् ) पात्र- विशेषं यज्ञं वा ( जज्ञानम् ) जनी प्रादुर्भावे-शानचि शपः श्लौ सति रूपम् १ । जायमानम् । दृश्यमानम् । ( पित्र्या ) पितुर्यञ्च ( पा० ४ । ३ । ७६ ) पितृ–यत् टाप् । पितृसकाशादागता । पैतृका ( राष्ट्री ) राजू दीप्तौ ऐश्वर्य्ये च- ष्ट्रन्, ङीष् । राष्ट्री, ईश्वरनाम—निघ० २ । २२ । राज्ञी । ईश्वरी । सर्वनियन्त्री (एतु ) गच्छतु (अग्रे ) अभिमुखम् ( उपासीत ) . उप + १. शप् को श्लु बाहुलक नियम से हुआ है ॥ सम्पा० ॥