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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १६ ५४७ को बोलती है, तब विद्वानों की पवित्रता से ही वाणी को शुद्ध करता है । ( सा वै अनुष्टुप् भवति ) वह ही अनुष्टुप् छन्द है । ( वाक् वै अनुष्टुप्, तत् स्वेन एव छन्दसा वाचं पुनीते ) वाणी ही अनुष्टुप् है [ निघ० १ । ११ ], तब वह अपने ही छन्द से वाणी को शुद्ध करता है । ( ताम् अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उस [ दाधिक्री ] को आधी आधी ऋचा से प्रतिष्ठा के लिये ही वह बोलता है ॥ ( अथ पावमानीः शंसति ) फिर पावमानी ऋचायें वह बोलता है । ( पवित्रं वै पावमान्यः, इयं वाक् आहनस्यां वाचम् अवादीत्, तत् पावमानीभिः एव वाचं पुनीते ) पवित्र आचरण ही पावमानी ऋचायें [ शुद्ध व्यवहार क्रियायें ] हैं, यह वाणी आहनस्या वाणी को बोलती है । तब पावमानी ऋचाओं से ही वाणीको वह शुद्ध करता है । ( ताः सर्वाः अनुष्टुभः भवन्ति, वाक् वै अनुष्टुप् तत् स्वेन एव छन्दसा वाचं पुनीते ) वे सब अनुष्टुप् छन्द हैं, वाणी ही अनुष्टुप् है, तब वह अपने ही छन्द से वाणी को शुद्ध करता है । ( ताः अर्धर्चशः प्रतिष्ठित्यै एव शंसति ) उनको आधी आधी ऋचा करके प्रतिष्ठा के लिये ही वह बोलता है ॥ ( अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठत् इति, एतं तृचम् ऐन्द्राबार्हस्पत्यं सूक्तं शंसति ) अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठत् इति......अथ० २० । १३७ । ७-६, इस तृच इन्द्र और बृहस्पति देवता वाले सूक्त को वह बोलता है । ( अथ ह एतत् उत्सृष्टं, तत् यत् एतं तृचम् ऐन्द्राबार्हस्पत्यम् अन्त्यं तृचम् ऐन्द्राजागतं शंसति इदं सवनधारणं, गुल्महः इति वदन्तः, तत् उ तथा न कुर्यात् ) फिर यह सूक्त छोड़ा हुआ है, इसलिये जो वह इस इन्द्र और बृहस्पति देवता वाले तृच को और पिछले इन्द्र देवता वाले जगती [ वा त्रिष्टुप् ] छन्द के तृच को वह बोलता है, यह [तीनों] सवनों का धारण करना है, गुल्महः [ शत्रु सेना का नाश करने वाला इन्द्र है ] यह वह बोलते हैं, इसलिये ही वह वैसा न करे [ इन तृचों को न बोले ] । ( त्रिष्टुब्धायतना वै एषां होत्रकाणाम् इयं वाक्, यत् ऐन्द्राबार्हस्पत्या तृतीयसवने ) त्रिष्टुप् छन्द वाली ही इन सहायक होताओं की यह वाणी है, इन्द्र और बृहस्पति देवता वाली तीसरे सवन में है। ( तत् यत् एतम् ऐन्द्रा- बार्हस्पत्यं तृचम् अन्त्यम् ऐन्द्राजागतं तृचं शंसति, तत् एनं स्वे एव आयतने प्रीणाति ) सो जो इस इन्द्र और बृहस्पति वाले तृच और पिछले इन्द्र देवता वाले जगती [ वा त्रिष्टुप् ] छन्द के तृच को बोलता है उससे इस [ इन्द्र ] को ही अपने स्थान पर वह प्रसन्न करता है । ( स्वयोः देवतयोः कामं नित्यम् एव परिदध्यात्, कामं तृचस्य हारेण ( अनुष्टुप् ) स्तोभति अर्चतिकर्मा-निघ० ३ । १४ । अनु + ष्टुभ् स्तम्भे स्तुतौ च--क्विप् । निरन्तरस्तुतिशीला । वाक्-निघ० १ । ११ । ( द्रप्सः ) वृतृवदिवचि० ( उ० ३ । ६२ ) दृप हर्षमोहनयोः, गर्वे च-सप्रत्ययः । गर्ववान् ( अंशुमतीम् ) मृगव्यादयश्च ( उ० १ । ३७ ) अंश विभाजने-कुः । विभागवतीं सीमायुक्तां नदीम् ( अव अतिष्ठत् ) अवस्थितवान् ( उत्सृष्टम् ) त्यक्तम् ( गुल्महः )