गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० १६ उत्तमाया ) अपने ही दोनों देवताओं के [ तृच से ] चाहे नित्य ही पूरा करे, चाहे तृच की सबसे पिछली ऋचा से [ पूरा करे ] ॥ ( तद् आहुः, षष्ठे अहनि संशंसेत्, न संशंसेत् ) फिर लोग कहते हैं— छठे दिन में [ शिल्पसूक्तों को ] मिलाकर बोले, [ अथवा ] न मिलाकर बोले । ( कथम् अन्येषु अहःसु संशंसति कथम् अत्र न संशंसति इति ) कैसे दूसरे दिनों में वह मिला- कर बोलता है और कैसे यहाँ [ छठे दिन में ] वह नहीं मिलाकर बोलता । ( अथो खलु आहुः न एवं संशंसेत् ) [ उत्तर ] तब वे कहते हैं—वह मिलाकर न बोले । ( स्वर्गः वै लोकः षष्ठम् अहः, असमाः ये [ = असमः यः ] वै स्वर्गः लोकः, कश्चित् वै स्वर्गे लोके शमयति इति ) स्वर्ग ही लोक छठा दिन है, वह असम [ सबके लिये असमान अर्थात् न मिलने योग्य ] है जो स्वर्ग लोक है, कोई ही [ पुण्यात्मा ] स्वर्ग लोक में शान्ति पाता है । ( तस्मात् न संशंसति ) इसलिये वह मिलाकर नहीं बोलता । ( यत् एव न सशंसति, तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम् ) जो वह मिलाकर नहीं बोलता, वह स्वर्ग लोक का रूप है । ( यत् उ एव एनाः संशंसति, यत् नाभानेदिष्ठः बाल- खिल्यः वृषाकपिः एवयामरुत्, एतानि वै अत्र उक्थानि भवन्ति, तस्मात् न संशं- सति ) जो ही वह इन [ ऋचाओं ] को मिलाकर बोलता है, जो नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामंरुत् [ कण्डिका ८ ] हैं, यह ही यहाँ [ छठे दिन वाले यज्ञ में ] उक्थ [ प्रधान स्तोत्र ] हो जाते हैं, इसलिये [ इनको ] मिलाकर न बोले । ( ऐन्द्रः वृषाकपिः ऐतशः प्रलापः सर्वाणि छन्दांसि उपाप्तः यत् ऐन्द्राबार्हस्पत्या तृतीय- सवने ) इन्द्र देवता वाला वृषाकपि और ऐतश प्रलाप [ सूक्त ] सब छन्दों को प्राप्त हैं, जो इन्द्र और बृहस्पति देवता वाली [ स्तुति ] तीसरे सवन में है ( तत् यत् एतं तृचम् ऐन्द्राबार्हस्पत्यं सूक्तं शंसति, ऐन्द्राबार्हस्पत्या परिधानीया, विशो अदेवीर्भया- चरन्तीः इति ) सो जो इस तृच इन्द्र और बृहस्पति देवता वाले सूक्त को वह बोलता है, वह इन्द्र बृहस्पति वाली परिधानीया [ समाप्ति सूचक "ऋचा ] है--विशो अदेवीर्भया- चरन्तीः......अथ० २० । १३७ । ६ पाद ३, ४ यह बोली जाती है । ( अपरजनाः ह वै अदेवीः विशः ) [ इस ऋचा में ] बैरी लोग ही कुव्यवहार वाली प्रजायें हैं । ( अस्य हि अपरजनं भयं न भवति, शान्ताः कॢप्ताः प्रजाः सहन्ते, यत्र एवंविदं शंसति यत्र एवंविदं शंसति इति ब्राह्मणम् ) उस [ पुरुष ] को बैरी से उत्पन्न भय नहीं होता है,
गुड वेष्टने रक्षणे च-मक्+हन हिंसागत्योः डः । शत्रुसेनानाशकः ( परिद- ध्यात् ) समापयेत् ( संशंसेत् ) ऐकाहिकानि सूक्तानि सम्भूय शंसेत् ( शमयति ) शान्तिं तृप्तिं प्राप्नोति ( उक्थानि ) प्रधानस्तोत्राणि ( परिधानीया ) समाप्ति- क्रिया ( विशः ) प्रजाः ( अदेवीः ) कुव्यवहारवतीः ( अभि ) सर्वतः ( आचरन्तीः) विचरन्तीः ( अपरजनम् ) शत्रुजनितम् ( कॢप्ताः ) समर्थाः ( एवंविदम् ) विद ज्ञाने--क्विप् सम्पदादिः । एवं ज्ञानम् ॥