गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
by श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी)
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Read in contextवृष्टि हेतु यज्ञ, पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ, तथा दिव्य भौतिक लोकों (स्वर्गलोक) के गमन हेतु ज्योतिष्टोम-यज्ञ हैं। इस कारण यह कहना सम्भव नहीं है कि वेदों में एकमात्र भगवान् विष्णु ही प्रतिपाद्य विषय हैं। ४. सिद्धान्त (यथार्थ निष्कर्ष): व्यासदेव निम्नलिखित सूत्र में इन आक्षेपों का उत्तर देते हैं: सूत्र ४ तत्तु समन्वयात् ॥ तत् — यह तथ्य; तु — किन्तु; समन्वयात् — समस्त वैदिक शास्त्रों के समन्वय (एकवाक्यता) से। किन्तु यह तथ्य (कि भगवान् विष्णु ही वेदों के एकमात्र प्रतिपाद्य विषय हैं) समस्त शास्त्रों द्वारा पुष्ट (प्रमाणित) होता है। श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत तात्पर्य: इस सूत्र में 'तु' (किन्तु) शब्द का प्रयोग पूर्वोक्त विपक्षी तर्क के खण्डन हेतु किया गया है। यह कहना सर्वथा उचित है कि समस्त वेदों में एकमात्र भगवान् विष्णु ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं। क्यों? उत्तर है: 'समन्वयात्' (क्योंकि शास्त्र स्वयं हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाते हैं)। 'अन्वय' शब्द का अर्थ है "वास्तविक अर्थ का अवबोध", तथा 'समन्वय' शब्द का अर्थ है "गहन विचार-विमर्श के पश्चात् सम्यक् अवबोध"। जब हम व्याख्या के उपर्युक्त नियमों (उपक्रम एवं उपसंहार आदि षड्विध लिङ्गों) को वेदों के मन्त्रों पर घटाते हैं, तो हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समस्त वेदों में भगवान् विष्णु ही एकमात्र प्रतिपाद्य विषय हैं। यदि ऐसा न होता, तो गोपालतापनी उपनिषद् यह क्यों कहती कि भगवान् विष्णु ही समस्त वेदों द्वारा महिमान्वित हैं? इसकी पुष्टि स्वयं कमलनयन परम पुरुषोत्तम भगवान् ने भी की है, जो कहते हैं: वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् । "समस्त वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य (वेद्य) हूँ। वस्तुतः मैं ही वेदान्त का कर्ता और वेदों का यथार्थ ज्ञाता हूँ।" — भगवद्गीता १५.१५