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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 121 of 1169

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Page 121
९८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

इन्द्र उवाच

बदरीफलमात्रं वै पुरोडाशं विधत्स्व मे।
ब्रह्मर्षे येन तिष्ठेयं तेजसाऽऽप्यायितः सदा ॥ २५ ॥

इन्द्र बोले—ब्रह्मर्षे ! आप एक बेरके बराबर भी पुरोडाशखण्डकी व्यवस्था मेरे लिये कर दें, जिससे मैं भी सदा तेजसे परिपुष्ट होता रहूँ ॥ २५ ॥

ब्रह्मन् कृशोऽहं विमना हृतराज्यो हृताशनः ।
हतौजा दुर्बलो मूढो रजिपुत्रैः कृतः प्रभो ॥ २६ ॥

ब्रह्मन् ! प्रभो ! रजिके पुत्रोंने मेरा राज्य और भोजन छीनकर मुझे अत्यन्त कृश, खिन्नचित्त, हतोत्साह, दुर्बल एवं मूढ़ बना दिया है ॥ २६ ॥

बृहस्पतिरुवाच

यद्येवं चोदितः शक्र त्वयास्यां पूर्वमेव हि ।
नाभविष्यत्त्वत्प्रियार्थमकर्तव्यं ममानघ ॥ २७ ॥

बृहस्पतिजीने कहा—निष्पाप इन्द्र ! यदि ऐसी बात है तो तुम्हें मुझसे पहले ही यह कहना चाहिये था। तुम्हारा प्रिय करनेके लिये ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो मैं न कर सकूँ ॥ २७ ॥

प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वत्प्रियार्थे न संशयः ।
यथा भागं च राज्यं च नचिरात्प्रतिलप्स्यसे ॥ २८ ॥

देवेन्द्र ! मैं तुम्हारे प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये निःसंदेह ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे तुम अपना राज्य और यज्ञभाग शीघ्र प्राप्त कर लोगे ॥ २८ ॥

तथा तात करिष्यामि मा भूत् ते विक्लवं मनः ।
ततः कर्म चकारास्य तेजसो वर्धनं तदा ॥ २९ ॥

तात ! तुम जैसा चाहते हो वैसा ही करूँगा। तुम्हारा मन व्याकुल न हो। ऐसा कहकर बृहस्पतिजीने उस समय इन्द्रके तेजको बढ़ानेवाले कर्मका अनुष्ठान किया ॥ २९ ॥

तेषां च बुद्धिसम्मोहमकरोद् द्विजसत्तमः ।
नास्तिकादार्थशास्त्रं हि धर्मविद्वेषणं परम् ॥ ३० ॥

द्विजश्रेष्ठ बृहस्पतिने रजिके पुत्रोंकी बुद्धिमें मोह उत्पन्न करनेके लिये ऐसे शास्त्रका निर्माण किया, जो नास्तिकवादसे परिपूर्ण तथा धर्मके प्रति अत्यन्त द्वेष उत्पन्न करनेवाला था ॥ ३० ॥

परमं तर्कशास्त्राणामसतां तन्मनोऽनुगम् ।
न हि धर्मप्रधानानां रोचते तत्कथान्तरे ॥ ३१ ॥

केवल तर्कके आधारपर अपने सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रोंमें वह उत्कृष्ट माना गया है। बृहस्पतिका वह नास्तिक दर्शन दुष्ट पुरुषोंके ही मनको अधिक भाता है। धर्मप्रधान पुरुषोंको बातचीतके प्रसंगमें भी उसकी चर्चा नहीं सुहाती है ॥ ३१ ॥

ते तद् वृहस्पतिकृतं शास्त्रं श्रुत्वाल्पचेतसः ।
पूर्वोक्तधर्मशास्त्राणामभवन् द्वेषिणः सदा ॥ ३२ ॥

बृहस्पतिके उस शास्त्रको सुनकर वे मन्दबुद्धि रजिपुत्र पहलेके धर्मशास्त्रोंसे सदा द्वेष रखने लगे ॥ ३२ ॥

प्रवक्तुर्न्यायरहितं तन्मतं बहु मेनिरे ।
तेनाधर्मेण ते पापाः सर्व एव क्षयं गताः ॥ ३३ ॥

वक्ताका वह न्यायरहित मत उन्हें बहुत उत्तम जान पड़ने लगा। उसी अधर्मसे वे सब पापी नष्ट हो गये ॥ ३३ ॥

त्रैलोक्यराज्यं शक्रस्तु प्राप्य दुष्प्रापमेव च ।
बृहस्पतिप्रसादाद्धि परां निर्वृतिरभ्ययात् ॥ ३४ ॥

इस तरह बृहस्पतिकी कृपासे त्रिलोकीका वह दुर्लभ राज्य पाकर इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३४ ॥

ते यदा तु सुसम्भूढा रागोन्मत्ता विधर्मिणः ।
ब्रह्मद्विषश्च संवृत्ता हतवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
ततो लेभे सुरैश्वर्यमिन्द्रः स्थानं तथोत्तमम् ।
हत्वा रजिसुतान् सर्वान् कामक्रोधपरायणान् ॥ ३६ ॥

वे रजिके पुत्र जब नास्तिकवादका आश्रय ले विवेकशून्य, रागोन्मत्त, धर्मके विपरीत चलनेवाले, ब्रह्मद्रोही, शक्तिहीन और पराक्रमशून्य हो गये, तब काम-क्रोधमें तत्पर रहनेवाले उन समस्त रजिपुत्रोंको मारकर इन्द्रने देवताओंका ऐश्वर्य और उत्तम स्थान प्राप्त कर लिया ॥ ३५-३६ ॥

य इदं च्यावनं स्थानात् प्रतिष्ठां च शतक्रतोः ।
शृणुयाद् धारयेद्वापि न स दौरात्म्यमाप्नुयात् ॥ ३७ ॥

जो इन्द्रके अपने स्थानसे भ्रष्ट होने और पुनः उसपर प्रतिष्ठित होनेके इस प्रसङ्गको सुनता और अपने हृदयमें धारण करता है, उसके मनमें कभी दुर्भावना नहीं आती ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आयोर्वंशकीर्तनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें आयुके वंशका वर्णनविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

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