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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 127 of 1169

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Page 127
१०४श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

अलर्कः काशिराजस्तु ब्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः ।
अलर्कं प्रति राजर्षि श्लोको गीतः पुरातनैः ॥ ७४ ॥
काशिराज अलर्क बड़े ब्राह्मणभक्त और सत्यप्रतिज्ञ थे। राजर्षि अलर्कके विषयमें प्राचीन पुरुषोंने निम्नाङ्कित श्लोकका गान किया है ॥ ७४ ॥

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च ।
युवा रूपेण सम्पन्न आसीत् काशिकुलोद्वहः ॥ ७५ ॥
'काशिवंशावतंस अलर्क छाछठ हजार छह सौ वर्षोंतक युवावस्था तथा सुन्दर रूप-वैभवसे सम्पन्न रहे' ॥ ७५ ॥

लोपामुद्राप्रसादेन परमायुरवाप सः।
तस्यासीत् सुमहद्राज्यं रूपयौवनशालिनः ॥ ७६ ॥
उन्होंने लोपामुद्राकी कृपासे उत्तम आयु प्राप्त की थी। रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले अलर्कका राज्य बहुत विशाल था ॥ ७६ ॥

शापस्यान्ते महाबाहुर्हत्वा क्षेमकराक्षसम् ।
रम्यां निवेशयामास पुरीं वाराणसीं पुनः ॥ ७७ ॥
महाबाहु अलर्कने निकुम्भके शापका अन्त होनेपर क्षेमक नामक राक्षसको मारकर पुनः रमणीय वाराणसीपुरी बसायी थी ॥ ७७ ॥

संनतेरपि दायादः सुनीथो नाम धार्मिकः ।
सुनीथस्य तु दायादः क्षेम्यो नाम महायशाः ॥ ७८ ॥
संनतिके पुत्र धर्मात्मा सुनीथ हुए और सुनीथका महायशस्वी पुत्र क्षेम्य नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ७८ ॥

क्षेम्यस्य केतुमान् पुत्रः सुकेतुस्तस्य चात्मजः ।
सुकेतोस्तनयश्चापि धर्मकेतुरिति स्मृतः ॥ ७९ ॥
क्षेम्यके पुत्र केतुमान्, केतुमान्‌के पुत्र सुकेतु और सुकेतु-के भी पुत्र धर्मकेतु हुए ॥ ७९ ॥

धर्मकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुर्महारथः ।
सत्यकेतुसुतश्चापि विभुर्नाम प्रजेश्वरः ॥ ८० ॥
धर्मकेतुके पुत्र महारथी सत्यकेतु हुए और सत्यकेतुके पुत्र प्रजापालक विभु हुए ॥ ८० ॥

आनर्तस्तु विभोः पुत्रः सुकुमारस्तु तत्सुतः ।
सुकुमारस्य पुत्रस्तु धृष्टकेतुः सुधार्मिकः ।
धृष्टकेतोस्तु दायादो वेणुहोत्रः प्रजेश्वरः ॥ ८१ ॥
विभुके पुत्रका नाम आनर्त था। आनर्तका पुत्र सुकुमार हुआ। सुकुमारके पुत्र परम धर्मात्मा धृष्टकेतु हुए और धृष्टकेतुके पुत्र राजा वेणुहोत्र थे ॥ ८१ ॥

वेणुहोत्रसुतश्चापि भर्गो नाम प्रजेश्वरः ।
वत्सस्य वत्सभूमिंस्तु भृगुभूमिस्तु भार्गवात् ॥ ८२ ॥
वेणुहोत्रका पुत्र राजा भर्गके नामसे विख्यात हुआ । प्रतर्दनके जो वत्स और भार्ग नामक दो पुत्र बतलाये गये हैं, उनमेंसे वत्सके वत्सभूमि तथा भार्गके भृगुभूमि नामक पुत्र हुए॥

एते त्वङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशेऽथ भार्गवे ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तयोः पुत्राः सहस्रशः ।
इत्येते काशयः प्रोक्ता नहुषस्य निबोध मे ॥ ८३ ॥
ये अङ्गिरागोत्री गालवके वंशज हैं, जो भार्गववंशमें उत्पन्न हुए । इनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णोंके लोग हैं। वत्सभूमि और भृगुभूमिके सहस्रों पुत्र कहे गये हैं। इस प्रकार ये राजा काशिके कुलमें उत्पन्न हुए क्षत्रिय बताये गये हैं। अब तुम मुझसे नहुषकी सन्तानोंका वर्णन सुनो ॥८३॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥


त्रिंशोऽध्यायः

नहुष एवं ययातिके वंशका वर्णन तथा ययातिका चरित्र

वैशम्पायन उवाच
उत्पन्नाः पितृकन्यायां विरजायां महौजसः ।
नहुषस्य तु दायादाः षडिन्द्रोपमतेजसः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! नहुषके उनकी पत्नी पितृकन्या विरजाके गर्भसे छः महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे ॥ १ ॥

यतिर्ययातिः संयातिरायातिः पाञ्चिको भवः ।
सुयातिः षष्ठस्तेषां वै ययातिः पार्थिवोऽभवत् ।
यतिर्ज्येष्ठस्तु तेषां वै ययातिस्तु ततः परम् ॥ २ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति, पाँचवाँ भव और छठाँ सुयाति । इनमेंसे ययाति ही राजा हुए । इन छः भाइयोंमें सबसे बड़े थे यति और उनके बाद ययाति उत्पन्न हुए थे ॥ २ ॥

ककुत्स्थकन्यां गां नाम लेभे परमधार्मिकः ।
यतिस्तु मोक्षमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३ ॥
परम धर्मात्मा यतिने ककुत्स्थकी कन्या गौको पत्नीरूपमें प्राप्त किया था। वे मोक्षधर्मका आश्रय ले ब्रह्मस्वरूप मुनि हो गये ॥ ३ ॥