विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
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Read in context११४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
नरेश्वर ! अब मैं दिवोदासकी संततिका वर्णन करूँगा। दिवोदासके पुत्र ब्रह्मर्षि मित्रयु हुए। मित्रयुसे मैत्रायणका जन्म हुआ। मैत्रायणसे सोम हुए। सोमके वंशज मैत्रेय कहे गये हैं। ये भार्गव-पक्षका आश्रय लेकर क्षत्रोपेत भार्गव कहलाये ॥ ३६-३७ ॥
आसीत् पञ्चजनः पुत्रः सृञ्जयस्य महात्मनः ।
सुतः पञ्चजनस्यापि सोमदत्तो महीपतिः ॥ ३८ ॥
महात्मा सृञ्जयके पञ्चजन नामक पुत्र हुआ और पञ्चजनके पुत्र पृथ्वीपति सोमदत्त हुए ॥ ३८ ॥
सोमदत्तस्य दायादः सहदेवो महायशाः ।
सहदेवसुतश्चापि सोमको नाम पार्थिवः ॥ ३९ ॥
सोमदत्तके पुत्र महायशस्वी सहदेव थे और सहदेवके पुत्र राजा सोमक हुए ॥ ३९ ॥
अजमीढात् पुनर्जातः क्षीणवंशे तु सोमकः ।
सोमकस्य सुतो जन्तुर्यस्य पुत्रशतं बभौ ॥ ४० ॥
अजमीढवंशी सहदेवसे सोमकका जन्म उस अवस्थामें हुआ जब कि उनकी वंश-परम्परा क्षीण हो चली थी। सोमकके पुत्रका नाम जन्तु था। जिसके स्थानपर सोमकके सौ पुत्र हो गये* ॥ ४० ॥
तेषां यवीयान् पृषतो द्रुपदस्य पिता प्रभुः ।
धृष्टद्युम्नस्तु द्रुपदाद् धृष्टकेतुश्च तत्सुतः ॥ ४१ ॥
अजमीढाः स्मृता ह्येते महात्मानस्तु सोमकाः ।
पुत्राणामजमीढस्य सोमकत्वं महात्मनः ॥ ४२ ॥
उनमें सबसे छोटे थे पृषत, जो राजा द्रुपदके प्रभावशाली पिता थे। द्रुपदसे धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्नसे धृष्टकेतुका जन्म हुआ। ये महामनस्वी क्षत्रिय अजमीढ और सोमक कहे गये हैं। महामना अजमीढके संतानोंकी ही सोमक संज्ञा हुई ॥ ४१-४२ ॥
महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रगृद्धिनी ।
तृतीया तव पूर्वेषां जननी पृथिवीपते ॥ ४३ ॥
राजा अजमीढकी जो धूमिनी नामवाली तीसरी रानी थीं, उनके मनमें पुत्रकी बड़ी लालसा थी। पृथ्वीनाथ ! वे ही तुम्हारे पूर्वजोंकी जननी हुईं ॥ ४३ ॥
सा तु पुत्रार्थिनी देवी व्रतचर्यासमन्विता ।
ततो वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुष्करम् ॥ ४४ ॥
हुत्वाग्निं विधिवत् सा तु पवित्रमितभोजना ।
अग्निहोत्रकुशेष्वेव सुष्वाप जनमेजय ॥ ४५ ॥
जनमेजय ! पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली धूमिनी देवी व्रतका पालन करने लगीं। वे दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करती हुई विधिवूर्वक अग्निमें आहुति देतीं, पवित्रतापूर्वक परिमित भोजन करतीं और अग्निहोत्रके कुर्शोंपर ही सोतीं ॥ ४४-४५ ॥
धूमिन्या स तया देव्यात्वजमीढः समेयिवान् ।
ऋक्षं संजनयामास धूम्रवर्णं सुदर्शनम् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर राजा अजमीढने देवी धूमिनीके साथ समागम किया। इससे उन्होंने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया। ऋक्ष धूम्रके समान वर्णवाले एवं सुन्दर दर्शनीय पुरुष थे ॥
ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् तथा ।
यः प्रयागादतिक्रम्य कुरुक्षेत्रं चकार ह ॥ ४७ ॥
ऋक्षसे संवरण और संवरणसे कुरु उत्पन्न हुए, जिन्होंने प्रयागसे जाकर कुरुक्षेत्रकी स्थापना की ॥ ४७ ॥
तद्वै तप्त महाभागो वर्षाणि सुवहून्यथ ।
तप्यमाने तदा शक्रो यत्रास्य वरदो बभौ ॥ ४८ ॥
महाभाग कुरुने उस क्षेत्रमें बहुत वर्षोंतक तप किया। उनके तप करते समय वरदायक भगवान् इन्द्रने वहाँ जाकर उन्हें वर प्रदान किया ॥ ४८ ॥
पुण्यं च रमणीयं च पुण्यकृद्भिर्निषेवितम् ।
तस्यान्ववायः सुमहांस्तस्य नाम्ना स्थ कौरवाः ॥ ४९ ॥
वह पवित्र एवं रमणीय क्षेत्र पुण्यात्माओंद्वारा सेवित है। कुरुका वंश बहुत बड़ा है। तुमलोग कुरुके ही नामसे कौरव कहलाते हो ॥ ४९ ॥
कुरोश्च पुत्राश्चत्वारः सुधन्वा सुधनुस्तथा ।
परीक्षिच्च महाबाहुः प्रवरश्चारिमेजयः ॥ ५० ॥
कुरुके चार पुत्र हुए—सुधन्वा, सुधनु, महाबाहु परीक्षित और श्रेष्ठ वीर अरिमेजय ॥ ५० ॥
सुधन्वनस्तु दायादः सुहोत्रो मतिमांस्ततः ।
च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थकोविदः ॥ ५१ ॥
सुधन्वाके पुत्र सुहोत्र हुए। सुहोत्रके मतिमान् तथा मतिमान्के पुत्र राजा च्यवन हुए, जो धर्म और अर्थके ज्ञाता थे॥
च्यवनात् कृतयज्ञस्तु इष्ट्वा यज्ञैः स धर्मवित् ।
विश्रुतं जनयामास पुत्रमिन्द्रसमं नृपः ॥ ५२ ॥
च्यवनसे कृतयज्ञ हुए। उन धर्मज्ञ नरेशने यज्ञ करके इन्द्रके समान सुविख्यात पराक्रमी पुत्रको जन्म दिया ॥ ५२ ॥
चैद्योपरिचरं वीरं वसुं नामान्तरिक्षगम् ।
चैद्योपरिचराज्ञाज्ञे गिरिका सप्त मानवान् ॥ ५३ ॥
उसका नाम था उपरिचर वसु। वे वसु चेदि देशके निवासी थे और आकाशमार्गसे चलते थे। चेदिदेशीय उप-
* सोमकने जन्तुको यज्ञ-पशु बनाकर एक यज्ञ किया, जिससे उनकी सौ स्त्रियोंके गर्भसे एक-एक करके सौ पुत्र उत्पन्न हुए। (देखिये महाभारत, वनपर्व, १२७-१२८ अध्याय )