विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
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Read in contextहरिवंशपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः १२५
अर्जुनसे सुभद्रामें रथी अभिमन्यु उत्पन्न हुए और अक्रूर-से काशिराजकुमारीमें सत्यकेतु उत्पन्न हुए ॥ ८ ॥
वसुदेवस्य भार्यासु महाभागासु सप्तसु ।
ये पुत्रा जज्ञिरे शूरा नामतस्तान् निबोध मे ॥ ९ ॥
वसुदेवजीकी सात महाभाग्यवती पत्नियोंमें जो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम मैं आपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ ९ ॥
भोजश्च विजयश्चैव शान्तिदेवासुतावुभौ ।
वृकदेवः सुनामायां गदश्चास्तां सुतावुभौ ॥ १० ॥
भोज और विजय—ये दो शान्तिदेवाके पुत्र थे तथा वृकदेव और गद—ये दो सुनाम्नीके पुत्र थे ॥ १० ॥
उपासङ्गरं लेभे तनयं देवरक्षिता ।
अगावहं महात्मानं वृकदेवी व्यजायत ॥ ११ ॥
देवरक्षिताके पुत्र उपासङ्कवर हुए और वृकदेवीके पुत्र महात्मा अगावह हुए ॥ ११ ॥
कन्या त्रिगर्तराजस्य भर्ता वै शैशिरायणः ।
जिज्ञासां पौरुषे चक्रे न चस्कन्देऽथ पौरुषम् ॥ १२ ॥
वृकदेवी त्रिगर्तराजकी कन्या थीं । त्रिगर्तराजका भर्ता (पुरोहित) गर्गगोत्री शैशिरायण था । उसके सालेने, जो यादवोंका पुरोहित था, यह जानना चाहा कि इसमें पुंस्त्व है अथवा नहीं, परंतु (व्रतधारी होनेसे) उसका वीर्य स्खलित नहीं हुआ (इसपर उसके सालेने हास्यवश उसको मिथ्या ही नपुंसक घोषित कर दिया) ॥ १२ ॥
कृष्णायाससमप्रख्यो वर्षे द्वादशमे तथा ।
मिथ्याभिशस्तो गार्ग्यस्तु मन्युनाभिसमीरितः ॥ १३ ॥
बारह वर्षका नियम पूर्ण होनेपर मिथ्या ही नपुंसकताका दोष लगाये जानेके कारण गर्गगोत्री शैशिरायण क्रोधमें भर गये, इससे उनके शरीरका वर्ण लोहेके समान काला दीखने लगा ॥ १३ ॥
गोपकन्यामुपादाय मैथुनायोपचक्रमे ।
गोपाली त्वप्सरास्तस्य गोपस्त्रीवेषधारिणी ॥ १४ ॥
उन्होंने एक गोपकन्याके साथ सहवास किया । वह स्त्री गोप-स्त्रीका वेश धारण करनेवाली गोपाली नामकी अप्सरा थी ॥
धारयामास गार्ग्यस्य गर्भं दुर्धरमच्युतम् ।
मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिनः ॥ १५ ॥
स कालयवनो नाम जज्ञे राजा महाबलः ।
वृषपूर्यार्धकायास्तमवहन् वाजिनो रणे ॥ १६ ॥
उसने गार्ग्य शैशिरायणके अच्युत और दुर्धर वीर्यको धारण कर लिया । उस मनुष्यका वेश धारण करनेवाली गार्ग्यकी भार्यासे शिवजीकी आज्ञासे कालयवन नामक प्रसिद्ध महाबली राजा उत्पन्न हुआ था, बैलोंके समान आधे शरीरवाले घोड़े युद्धमें उसके वाहन बनते थे ॥ १५-१६ ॥
अपुत्रस्य स राज्ञस्तु ववृधेऽन्तःपुरे शिशुः ।
यवनस्य महाराज स कालयवनोऽभवत् ॥ १७ ॥
महाराज ! एक यवन राजा संतानहीन था, उसके अन्तःपुरमें वह बालक पलने लगा । इस प्रकार वह कालयवनके नामसे प्रसिद्ध * हुआ ॥ १७ ॥
स युद्धकामी नृपतिः पर्यपृच्छद् द्विजोत्तमान् ।
वृष्ण्यन्धककुलं तस्य नारदोऽकथयद् विभुः ॥ १८ ॥
वह राजा युद्ध करनेकी इच्छासे प्रेरित हो ब्राह्मणोंसे (अपने समान योद्धाओंको) पूछने लगा । सब जगह पहुँचनेवाले नारदजीने उसे वृष्णि और अन्धककुलके वीरोंको उसके समान योद्धा बताया ॥ १८ ॥
अक्षौहिण्या तु सैन्यस्य मथुरामभ्ययात् तदा ।
दूतं सम्प्रेषयामास वृष्ण्यन्धकनिवेशनम् ॥ १९ ॥
तब वह एक अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरापुरीपर चढ़ आया । उसने वृष्णि और अन्धकोंके भवनमें दूतको भेजा ॥
ततो वृष्ण्यन्धकाः कृष्णं पुरस्कृत्य महामतिम् ।
समेता मन्त्रयामासुर्यवनस्य भयात् तदा ॥ २० ॥
तब कालयवनके डरसे वृष्णि और अन्धकोंने महामति श्रीकृष्णके सभापतित्वमें इकट्ठे होकर मन्त्रणा की ॥ २० ॥
कृत्वा च निश्चयं सर्वे पलायनपरायणाः ।
विहाय मथुरां रम्यां मानयन्तः पिनाकिनम् ॥ २१ ॥
कुशस्थलीं द्वारवतीं निवेशयितुमीप्सवः ।
तब वे सब निश्चय करके शिवजीकी मनौती मानते हुए कुशस्थली द्वारकाको बसानेकी इच्छासे रमणीय मथुरापुरीको त्यागकर भाग खड़े हुए ॥ २१½ ॥
* इससे सिद्ध होता है कि गोपाली अप्सरा शकुन्तलाकी भाँति ... कर छोड़ गयी थी ।