विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
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Read in context| १५६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतयुगं पुनः ।
प्रपत्स्यते यथान्यायं स्वभावादेव नान्यथा ॥ १६९ ॥
कलियुगके समाप्त हो जानेपर फिर स्वभावसे ही सत्ययुगकी यथोचितरूपसे प्रवृत्ति होगी, दूसरे किसी प्रकारसे नहीं ॥
एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुणैर्युताः ।
प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ १७० ॥
राजन् ! ये तथा और भी भगवान्के बहुत-से दिव्य अवतार हुए हैं, जो देवोचित गुणोंसे सम्पन्न थे। ब्रह्मवादी मुनियोंने पुराणोंमे उनका गान किया है ॥ १७० ॥
यत्र देवाश्च मुह्यन्ति प्रादुर्भावानुकीर्तने ।
पुराणं वर्तते यत्र वेदश्रुतिसमाहितम् ॥ १७१ ॥
भगवान्के इन अवतारोंका वर्णन करनेमें देवता भी चकरा जाते हैं—इस विषयमे पुराण ही प्रमाण है, जिसका वैदिक श्रुतियोंद्वारा समर्थन होता है ॥ १७१ ॥
एतदुद्देशमात्रेण प्रादुर्भावानुकीर्तनम् ।
कीर्तितं कीर्तनीयस्य सर्वलोकगुरोः प्रभोः ॥ १७२ ॥
सम्पूर्ण जगत्के गुरु तथा कीर्तन करनेयोग्य सर्वशक्तिमान् भगवान्के अवतारोंका यह वर्णन संक्षेपसे ही किया गया है ॥ १७२ ॥
प्रीयन्ते पितरस्तस्य प्रादुर्भावानुकीर्तनात् ।
विष्णोरतुलवीर्यस्य यः शृणोति कृताञ्जलिः ॥ १७३ ॥
अनुपम-शक्तिशाली भगवान् विष्णुके अवतारोंकी वारंवार चर्चा करनेसे पितरोंको प्रसन्नता होती है। जो हाथ जोड़कर आदरपूर्वक इस अवतार-कथाको सुनता है, उसके पितरोंको भी अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है ॥ १७३ ॥
एतास्तु योगेश्वरयोगमायाः
श्रुत्वा नरो मुच्यति सर्वपापैः ।
ऋद्धिं समृद्धिं विपुलांश्च भोगान्
प्राप्नोति सर्वं भगवत्प्रसादात् ॥ १७४ ॥
जो मनुष्य योगेश्वर भगवान् श्रीहरिकी योगमाया द्वारा प्रकट हुए अवतारोंकी इन लीला-कथाओंको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा भगवान्की कृपासे शीघ्र ही उसे ऋद्धि, समृद्धि एवं प्रचुर भोग—सबकी प्राप्ति हो जाती है ॥ १७४ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रादुर्भावानुसंग्रहो नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें अवतारोंका संग्रहनामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
भगवान् विष्णुके ईश्वरत्वका वर्णन एवं अद्भुततारकामय संग्रामकी कथा
वैशम्पायन उवाच
विश्वत्वं शृणु मे विष्णोर्हरित्वं च कृते युगे ।
वैकुण्ठत्वं च देवेषु कृष्णत्वं मानुषेषु च ॥ १ ॥
ईश्वरत्वं च तस्येदं गहनां कर्मणां गतिम् ।
सम्प्रत्यतीतां भव्यां च शृणु राजन् यथातथम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब तुम मुझसे सत्ययुगमे विष्णुके विश्वत्वको (उनके अभयदायक आश्वासक रूपको), हरित्वको (पापहारी रूपको), देवताओंमे भगवान्के वैकुण्ठत्वको (सर्वसमर्थताको) और पुरुषोंमें उनके श्रीकृष्णत्वको (सच्चिदानन्दताको) तथा उनके ईश्वरत्वको (दण्ड देने और कृपा करनेकी सामर्थ्यको) और उनके भूत, भविष्य एवं वर्तमान कर्मों (लीलाओं) की गहन गति (दुर्बोध स्वरूप) को यथार्थरूपसे सुनो ॥ १-२ ॥
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो यत्रैव भगवान् प्रभुः ।
नारायणो ह्यनन्तात्मा प्रभवोऽव्यय एव च ॥ ३ ॥
वे सर्वशक्तिमान् प्रभु अव्यक्त होनेपर भी (अवतार-विग्रह धारण करते समय) अपनी मूर्तिको प्रकट किये रहते हैं, वे नारायण, अनन्तस्वरूप, सबके उत्पत्तिस्थान और अव्यय (अविनाशी) हैं ॥ ३ ॥
एष नारायणो भूत्वा हरिरासीत् कृते युगे ।
ब्रह्मा शक्रश्च सोमश्च धर्मः शुक्रो वृहस्पतिः ॥ ४ ॥
कृतयुगमे ये नारायणरूप होकर हरि—मोक्षदायक बने और ये ही ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, धर्म, शुक्र और वृहस्पति-के रूपमे प्रकट हुए ॥ ४ ॥
अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दनः ।
एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रादवरजोऽभवत् ॥ ५ ॥
इसके अनन्तर ये यादवनन्दन (श्रीकृष्णरूपसे अवतार लेनेवाले भगवान्) ही विष्णुके नामसे अदितिके पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। उस जन्ममे ये इन्द्रके छोटे भाई बने थे ॥ ५ ॥
प्रसादजं ह्यस्य विभोरदित्याः पुत्रजन्म तत् ।
वधार्थं सुरशत्रूणां दैत्यदानवरक्षसाम् ॥ ६ ॥
देवताओंके शत्रु दैत्य, दानव और राक्षसोंका संहार करनेके लिये भगवान् विष्णु अदितिके यहाँ पुत्र बनकर उत्पन्न हुए। यह उन विभुका प्रसाद (वरदान) रूप जन्म था ॥ ६ ॥