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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

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Page 194

हरिवंशपर्व ] षट्चत्वारिंशोऽध्यायः १७१

इन्द्रने कहा--सोम ! आप जाइये और पाशधारी वरुणकी सहायता कीजिये। ऐसा करनेसे असुरोंका संहार और देवताओंकी विजय होगी॥ २॥

त्वमप्रतिमवीर्य्यश्च ज्योतिषां चेश्वरेश्वरः।
तन्मयं सर्वलोकानां रसं रसविदो विदुः॥ ३॥
आपका पराक्रम अनुपम है। आप ग्रह-नक्षत्रोंके अधिपतियोंके भी अधिपति हैं। रस (के तत्त्व) को जाननेवाले विद्वानोंका यह अनुभव है कि सब प्राणियोंमें जो रस है, वह आपका ही है॥ ३॥

क्षयवृद्धी तवाव्यक्ते सागरस्येव मण्डले।
परिवर्त्तस्यहोरात्रं कालं जगति योजयन्॥ ४॥
समुद्रके समान आपके मण्डलकी क्षय-वृद्धि सदा अव्यक्त रहती है। आप संसारमे कालको प्रवर्तित करते हुए दिन और रात्रिका परिवर्तन करते रहते हैं॥ ४॥

लोकच्छायामयं लक्ष्म तवाङ्के शशसंज्ञितम्।
न विदुः सोमदेवाऽपि ये च नक्षत्रयोगिनः॥ ५॥
सोम ! आपके अङ्क (मण्डलके मध्य) में पृथ्वीलोककी छाया (प्रतिबिम्ब) ही शश नामक चिह्न है। नक्षत्रोंका विचार करनेवाले विद्वान् और चन्द्रोपासक भी आपको (वास्तविक रूपमें) नहीं जान सकते॥ ५॥

त्वमादित्यपथादूर्ध्वं ज्योतिषां चोपरि स्थितः।
तमश्चोत्सार्य वपुषा भासयस्यखिलं जगत्॥ ६॥
आप आदित्यपथसे भी ऊर्ध्वदेशमें और सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डलोंके भी ऊपर स्थित रहते हैं। आप अपने (तेजोमय) शरीरके द्वारा अन्धकारको दूर कर समस्त संसारको प्रकाशित करते हैं॥ ६॥

श्वेतभानुर्हिमतनुर्ज्योतिषामधिपः शशी।
शब्दकृत् कालयोगात्मा ईज्यो यज्ञरसोऽव्ययः॥ ७॥
आपकी किरणें श्वेतवर्णकी हैं। आपका शरीर हिममय है। आप नक्षत्रोंके स्वामी, शशके चिह्नसे युक्त, संवत्सररूप (काल) के रचयिता, कालयोगस्वरूप, पूजनीय, (वर्षा आदिके रूपमें) यज्ञके रस और अव्यय (प्रवाहरूपसे नित्य) हैं॥ ७॥

ओषधीशः क्रियायोनिरम्भोयोनिरनुष्णभाक्।
शीतांशुर्मृताधारश्चपलः श्वेतवाहनः॥ ८॥
आप (अन्नादि) ओषधियोंके स्वामी, क्रियाओं और जलके उत्पत्तिस्थान तथा स्वभावसे ही शीतलता धारण करनेवाले हैं। आपकी किरणें शीतल हैं। आप अमृतके आधार हैं, चपल हैं। आपका वाहन श्वेतवर्णका है॥ ८॥

त्वं कान्तिः कान्तवपुषां त्वं सोमः सोमवृत्तिनाम्।
सौम्यस्त्वं सर्वभूतानां तिमिरघ्नस्त्वमृक्षराट्॥ ९॥
आप ही कान्तिमान् शरीरवाले नर-नारियों और देवताओंकी कान्ति हैं और सोमसे जीविका चलानेवाले देवसमूहके लिये आप ही सोम हैं। आप सभी प्राणियोंके लिये सौम्य हैं, अन्धकारका नाश करनेवाले हैं तथा नक्षत्रोंके राजा हैं॥

तद् गच्छ त्वं सहानेन वरुणेन वरूथिना।
शमयस्वासुरीं मायां यया दह्याम संगरे॥ १०॥
अतः आप सेना लेकर (युद्धके लिये) तैयार खड़े हुए इन वरुणदेवके साथ जाइये और समराङ्गणमें जिससे हम जल रहे हैं, उस आसुरी मायाको शान्त कीजिये॥ १०॥

सोम उवाच
यन्मां वदसि युद्धार्थे देवराज जगत्पते।
एष वर्षामि शिशिरं दैत्यमायापकर्षणम्॥ ११॥
सोमने कहा--देवराज ! जगत्पते ! आप युद्धके लिये मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, उसके अनुसार मैं अभी दैत्योंकी मायाको नष्ट करनेके लिये हिमकी वर्षा करता हूँ॥ ११॥

एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।
विमायान् विमदांश्चैव दानवांस्त्वं महामृधे॥ १२॥
देखिये, इस महासमरमे ये दानव किस प्रकार मेरे बरसाये हुए ओलोसे दग्ध होते हैं। हिमसे आवेष्टित होनेपर कैसे इनकी माया नष्ट होती है और किस तरह इनका सारा मद उतर जाता है॥ १२॥

वैशम्पायन उवाच
ततो हिमकरोत्सृष्टाः सवाष्पा हिमवृष्टयः।
वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन् ! तदनन्तर चन्द्रमाकी छोड़ी हुई सुन्दर बाष्पसहित ओलोंकी वर्षाने मेघोंकी भाँति उन भयंकर दैत्योंको जकड़ना आरम्भ कर दिया॥ १३॥

तौ पाशशुक्लांशुधरौ वरुणेन्दू महारणे।
जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशाघातैश्च दानवान्॥ १४॥
उस महायुद्धमें पाशधारी वरुण और श्वेत किरणोंवाले चन्द्रमा पाशसे मारकर और ओले गिराकर दानवोंका संहार करने लगे॥ १४॥

द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।
मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५॥
पाश और हिमका प्रहार करनेवाले वे दोनों जलके स्वामी वरुण और सोम जलकी वर्षा करते हुए क्षोभमे भरे हुए दो समुद्रोंके समान संग्राममें विचरने लगे॥ १५॥

ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद् दानवमदृश्यत।
जगत् संवर्तकाम्भोदैः प्रवृष्टैरिव संवृतम्॥ १६॥