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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 199 of 1169

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Page 199
१७६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

वज्रैः प्रहरणीयैश्च दीप्यमानैश्च तोमरैः ।
विकोशैश्चासिभिस्तीक्ष्णैः शूलैश्च शितनिर्मलैः ॥ १३ ॥
ते वै संदीप्तमनसः प्रगृहीतोत्तमायुधाः ।
कालनेमिं पुरस्कृत्य तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ १४ ॥

वे सब हर्षसे उत्फुल्ल हृदयवाले दानव हाथोंमें उत्तम आयुध धारण किये, कालनेमिको आगे रखकर उसके सेनापतित्वमें युद्ध करनेके लिये संग्रामके मुहानेपर डट गये। कितने ही दानव अपने चौड़े और पुष्ट कंधोंसे युक्त हाथोंसे ही आयुधोंका काम लेते थे तथा बहुतेरे दैत्य भारी गदा, चक्र, फरसा, पर्वतोंके समान शिलाओंकी बड़ी-बड़ी चट्टान, वज्र आदिके आघातसे टूटकर गिरे हुए शिलाखण्ड, पट्टिश, भिन्दिपाल, परिघ, अन्यान्य उत्तम आयुध, संहार करनेमें समर्थ और सैकड़ोंके प्राण लेनेवाली बड़ी भारी तोपें, कालके समान भयंकर मूसल, क्षेपणीय (गुलेल आदि), मुद्गर, युग (जुआ), खुले हुए यन्त्र, जिसके सिरेको हथौड़ेसे पीटकर तेज किया गया हो ऐसी अर्गला (डंडेला), फैले हुए पाश, प्रास (भाला), जीभ लपलपाते हुए सर्प, तीव्रगतिसे लक्ष्यकी ओर बढ़नेवाले बाण, प्रहार करने योग्य वज्र, दीप्तिमान् तोमर, नंगी तीखी तलवार और तेज किये हुए चमकीले शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये डट गये ॥ ९-१४ ॥

सा दीप्तशस्त्रप्रवरा दैत्यानां शुशुभे चमूः ।
द्यौर्निमीलितनक्षत्रा सघनेवाम्बुदागमे ॥ १५ ॥

जहाँ चमकते हुए श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रहे थे, वह दानवसेना वर्षाकालमें छिपे हुए नक्षत्रवाले मेघ और बिजलीसे युक्त आकाशके समान शोभा पा रही थी ॥ १५ ॥

देवतानामपि चमू रुरुचे शक्रपालिता ।
दीप्ता शीतोष्णतेजोभ्यां चन्द्रभास्करवर्चसा ॥ १६ ॥

इधर चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्भासित तथा उनके शीतल और उष्ण तेजके द्वारा देदीप्यमान हुई वह इन्द्रपालित देवसेना भी अनुपम शोभासे सम्पन्न हो रही थी ॥ १६ ॥

वायुवेगवती सौम्या तारागणपताकिनी ।
तोयदाविद्धवसना ग्रहनक्षत्रहासिनी ॥ १७ ॥
यमेन्द्रधनदैर्गुप्ता वरुणेन च धीमता ।
सप्रदीप्ताग्निपवना नारायणपरायणा ॥ १८ ॥
सा समुद्रौघसदृशी दिव्या देवमहाचमूः ।
रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी ॥ १९ ॥

वायुके समान वेगवती तथा सौम्य भावसे सम्पन्न देवताओंकी वह दिव्य एवं विशाल सेना तारागणोंको पताकारूपमें धारण करती थी, मेघमय वस्त्रोंसे आच्छन्न थी तथा ग्रह और नक्षत्र मानो उसके शुभ्र हास थे। यम, इन्द्र, कुबेर और बुद्धिमान् वरुणके द्वारा उसकी रक्षा की जा रही थी। उसमें प्रकाशमान अग्नि और वायुदेव भी विद्यमान थे। वह भगवान् नारायणके आश्रित थी। देखनेमें उमड़े हुए समुद्रकी अगाध जलराशिके समान जान पड़ती थी। विविध प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न होनेके कारण भयंकर प्रतीत होती थी तथा यक्ष और गन्धर्व उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १७-१९ ॥

तयोश्चम्वोस्तदा तत्र बभूव स समागमः ।
द्यावापृथिव्योः संयोगो यथा स्याद् युगपर्यये ॥ २० ॥

जैसे प्रलयकालमें द्युलोक और पृथ्वी—दोनों एक दूसरेसे टकराते हैं, उसी प्रकार उन दोनों सेनाओमें उस समय वहाँ गहरी भिड़ंत हुई ॥ २० ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम् ।
क्षमापराक्रममयं दर्पस्य विनयस्य च ॥ २१ ॥

देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर हो चला। एक ओर उदारतापूर्ण क्षमा थी तो दूसरी ओर क्रूरतापूर्ण पराक्रम ! यह दर्प और विनयका युद्ध था ॥ २१ ॥

निष्क्रम्युर्बलाभ्यां तु ताभ्यां भीमाः सुरासुराः ।
पूर्वापराभ्यां संरब्धाः सागराभ्यामिवाम्बुदाः ॥ २२ ॥

उन दोनों सेनाओंसे रोषमें भरे हुए भयंकर देवता और असुर निकले (तथा युद्धके लिये आगे बढ़े); ठीक उसी तरह जैसे पूर्व और पश्चिमके समुद्रोंसे क्षुब्ध मेघ प्रकट हुए हों ॥ २२ ॥

ताभ्यां चलाभ्यां संहृष्टाश्चेरुरस्ते देवदानवाः ।
वनाभ्यां पर्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजाः ॥ २३ ॥

उन दोनों सेनाओंसे हर्ष और उत्साहमें भरे हुए देवता और दानव युद्धके लिये निकले, मानो फूलोंसे सुशोभित दो पर्वतीय वनोंसे बहुसंख्यक हाथी निकल आये हों ॥ २३ ॥

समाजघ्नुस्ततो भेरीः शङ्खान् दध्मुश्च नैकशः ।
स शब्दो द्यां भुवं चैव दिशश्च समपूरयत् ॥ २४ ॥

उस समय दोनो दलोंके सैनिक बारंबार नगाड़े पीटने और शङ्ख बजाने लगे। वाद्योंका वह तुमुल नाद पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया ॥ २४ ॥

ज्याघाततलनिर्घोषो धनुषां कूजितानि च ।
दुन्दुभीनां निनदतां दैत्यानां निर्दधुः स्वनान् ॥ २५ ॥

प्रत्यञ्चा खींचनेसे जो शब्द होता था, धनुषोंकी जो टंकार-ध्वनि होती थी तथा बजती हुई दुन्दुभियोंका जो गम्भीर नाद होता था, उन सबने मिलकर दैत्योंके गर्जन-तर्जनकी आवाजको छिपा दिया ॥ २५ ॥