विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 205 of 1169
Read in context१८२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
यदा तस्य सुपर्णस्य पतिता मूर्ध्नि सा गदा । तदाऽऽगमत् पद्भ्यां भूमिं पक्षी व्यथितविग्रहः ॥ ३४ ॥
जिस समय गरुड़के मस्तकपर वह गदा गिरी, उस समय वह पंजोंके बलसे पृथ्वीपर आकर टिक गये। उनका सारा शरीर व्यथित हो गया था ॥ ३४ ॥
सुपर्णं व्यथितं दृष्ट्वा क्षतं च वपुरात्मनः । क्रोधात् संरक्तनयनो वैकुण्ठश्चक्रमाददे ॥ ३५ ॥
गरुड़को गदाके आघातसे पीड़ित और अपने शरीरको भी क्षत-विक्षत देखकर भगवान् विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने चक्र हाथमें ले लिया ॥ ३५ ॥
व्यवधर्त च वेगेन सुपर्णेन समं प्रभुः । भुजाश्चास्य व्यवर्धन्त व्याप्नुवन्तो दिशो दश ॥ ३६ ॥
तदनन्तर भगवान् नारायणका वेग गरुड़के समान ही बढ़ने लगा। उनकी चारों भुजाएँ दसों दिशाओंको व्याप्त करती हुई बढ़ने लगीं ॥ ३६ ॥
स दिशः प्रदिशश्चैव खं च गां चैव पूरयन् । ववृधे स पुनर्लोकान् क्रान्तुकाम इवौजसा ॥ ३७ ॥
वे दिशाओं, अवान्तर दिशाओं, आकाश और पृथ्वीको परिपूर्ण करते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, मानो पुनः बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त करना चाहते हों ॥ ३७ ॥
तं जायय सुरेन्द्राणां वर्धमानं नभस्तले । ऋषयः सह गन्धर्वैस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३८ ॥
देवेश्वरोंकी विजयके लिये आकाशमें बढ़ते हुए उन भगवान् मधुसूदनकी गन्धर्वोंसहित ऋषि स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥
स द्यां किरीटेन लिखन् साभ्रमम्बरमम्बरैः । पद्भ्यामाक्रम्य वसुधां दिशः प्रच्छाद्य बाहुभिः ॥ ३९ ॥
वे अपने मस्तकके किरीटसे स्वर्गलोककी भूमिपर रेखा-सी खींचते, फहराते हुए वस्त्रोंद्वारा बादलोंसहित आकाशको ढकते और चारों बांहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए अपने दोनों पैरोंसे पृथ्वीको दबाकर खड़े हो गये ॥ ३९ ॥
सूर्यस्य रश्मितुल्याभं सहस्रारमरिक्षयम् । दीप्ताग्निसदृशं घोरं दर्शनीयं सुदर्शनम् ॥ ४० ॥ सुवर्णनेमिपर्यन्तं वज्रनाभं भयावहम् । मेदोमज्जास्थिरुधिरैर्दिग्धं दानवसम्भवैः ॥ ४१ ॥ अद्वितीयं प्रहारेषु क्षुरपर्यन्तमण्डलम् । स्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम् ॥ ४२ ॥ स्वयं स्वयम्भुवा सृष्टं भयदं सर्वविद्विषाम् । महर्षिरोषैराविष्टं नित्यमाहवदर्पितम् ॥ ४३ ॥ क्षेपणाद् यस्य मुह्यन्ति लोकाःसस्थाणुजङ्गमाः । क्रव्यादानि च भूतानि तृप्तिं यान्ति महाहवे ॥ ४४ ॥ तमप्रतिमकर्माणं समानं सूर्यवर्चसा । चक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीप्तो गदाधरः ॥ ४५ ॥
जिसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्भासित होती है, जिसमें एक सहस्र अरे लगे हुए हैं, जो शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ है, जिसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बताया गया है, जो भयंकर होनेपर भी दर्शनीय है, इसीलिये जिसे सुदर्शन कहते हैं, जिसके किनारेपर सुवर्णमयी नेमि (हाल) लगी हुई है, जिसकी नाभि वज्रके समान सुदृढ़ है, जो शत्रुओंको भय देनेवाला है, दानवोंके मेद, मज्जा, अस्थि तथा रुधिरसे जिसकी पुष्टि हुई है, जो प्रहारके साधनोंमें अद्वितीय (अनुपम) है, उसके प्रान्तभागमें मण्डलाकार छुरे लगे हुए हैं, जो फूल-मालाकी लड़ियोंके समान विस्तृत है, इच्छानुसार चलने और मनमाना रूप धारण करनेमें समर्थ है, समस्त शत्रुओंको भय देनेवाले जिस दिव्य अस्त्रकी साक्षात् ब्रह्माजीने सृष्टि की है, अत्याचारी असुरोंके प्रति महर्षियोंके मनमें जो रोष होते हैं, उनसे जो सदा आविष्ट रहता है, युद्धके अवसरोंपर जो दर्पसे भरा होता है, जिसके प्रहारसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक मोहमें पड़ जाते हैं और महासमरमें जिसके प्रभावसे मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनुपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको हाथमें उठाकर भगवान् गदाधर समराङ्गणमें क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे ॥ ४०--४५ ॥
सम्मुष्णन् दानवं तेजः समरे स्वेन तेजसा । चिच्छेद बाहूं चक्रेण श्रीधरः कालनेमिनः ॥ ४६ ॥
लक्ष्मीको वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले श्रीहरिने समरभूमि-में अपने तेजसे दानवोंके तेजका अपहरण करके उस चक्रसे कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला ॥ ४६ ॥
तच्च वक्त्रशतं घोरं साग्निकूर्णाट्टहासिनम् । तस्य दैत्यस्य चक्रेण प्रममाथ बलाद्धरिः ॥ ४७ ॥
साथ ही जिनके अट्टहास करनेपर अग्निचूर्ण प्रकट होते थे, उस दैत्यके उन सौ भयंकर मुखोंको भी भगवान् विष्णुने उस चक्रके द्वारा बलपूर्वक मथ डाला ॥ ४७ ॥
स छिन्नबाहुर्विशिरा न प्राकम्पत दानवः । कबन्धोऽवस्थितः संख्ये विशाख इव पादपः ॥ ४८ ॥
भुजाओं और मस्तकोंके कट जानेपर भी वह दानव कम्पित नहीं हुआ। उसका धड़ युद्धस्थलमें शाखारहित वृक्ष-के समान खड़ा रहा ॥ ४८ ॥
तं वितत्य महापक्षी वायोः कृत्वा समं जवम् । उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम् ॥ ४९ ॥
तब महापक्षी गरुड़ने अपने पंख फैलाकर वायुके समान