BharatKosha
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 216 of 1169

Read in context
Page 216

[ हरिवंशपर्व ] एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः १९३


नावकी-सी हो रही है, जिसके डूबनेका समय अत्यन्त निकट हो ॥ १८ ॥

युगान्तसदृशै रूपैः शैलोच्छलितबन्धना ।
जलोत्पीडाकुला स्वेदं धारयन्ती मुहुर्मुहुः ॥ १९ ॥
'उन राजाओंके रूप प्रलयकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनसे पीड़ित होनेके कारण इस पृथ्वीके पर्वतरूपी बन्धन ढीले पड़ने लगे हैं अर्थात् इस नौकारूपिणी पृथ्वीमें जो कीलें ठुकी हुई थीं, वे अब उखड़ने लगी हैं; अतः वह रसातलकी जलराशिमे डूबनेकी आशङ्कासे व्याकुल हो उठी है और इसके शरीरमें बारंबार पसीना आ रहा है ॥ १९ ॥

क्षत्रियाणां वपुर्भिंश्च तेजसा च बलेन च ।
नृणां च राष्ट्रैर्विस्तीर्णैः श्राम्यतीव वसुन्धरा ॥ २० ॥
'क्षत्रियोंके शरीर, तेज और बलसे तथा मनुष्योंके दूर-तक फैले हुए राज्योंसे यह पृथ्वी थकती-सी जा रही है ॥ २० ॥

पुरे पुरे नरपतिः कोटिसंख्यैर्बलैर्वृतः ।
राष्ट्रे राष्ट्रे च बहवो ग्रामाः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥
'नगर-नगरमें वहाँका नरेश एक-एक करोड़ सैनिकोसे सम्पन्न है तथा प्रत्येक राज्यमे कई लाख ग्राम हैं ॥ २१ ॥

भूमिपानां सहस्रैश्च तेषां च बलिनां बलैः ।
ग्रामायुताढ्यै राष्ट्रैश्च भूमिर्निर्विवराकृता ॥ २२ ॥
'सहस्रों भूपालों, उन बलवान् भूपालोकी सेनाओं तथा दस-दस हजार गाँवोंसे युक्त उनके राष्ट्रोंसे यह भूमि इतनी भर गयी है कि कहीं थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं है ॥ २२ ॥

सेयं निरामयं कृत्वा निश्चेष्टा कालमग्रतः ।
प्राप्ता ममालयं विष्णो भवांश्चास्याः परा गतिः ॥ २३ ॥
'विष्णुदेव ! यह पृथ्वी निश्चेष्ट होकर निरामय कालको आगे करके मेरे निवासस्थानमें आयी थी। अब आप इसकी परम गति हैं ॥ २३ ॥

कर्मभूमिरिमंनुष्याणां भूमिरेशा व्यथां गता ।
यथा न सीदेत् तत् कार्यं जगत्येषा हि शाश्वती ॥ २४ ॥
'जगत्की आधारभूता यह सदा रहनेवाली भूमि, जो मनुष्योंकी कर्मभूमि है, बड़ा कष्ट पा रही है। यह अधिक भारके कारण दबकर बिखर न जाय, ऐसा कोई उपाय करना चाहिये ॥ २४ ॥

अस्या हि पीडने दोषो महान् स्यान्मधुसूदन ।
क्रियालोपश्च लोकानां पीडितं च जगद् भवेत् ॥ २५ ॥
'मधुसूदन ! इसके पीड़ित होनेपर महान् दोष प्राप्त हो सकता है। सब लोगोंकी सारी क्रियाएँ लुप्त हो जायँगी और सारा जगत् पीड़ित होने लगेगा ॥ २५ ॥

श्राम्यते व्यक्तमेवेयं पार्थिवौघप्रपीडिता ।
सहजां या क्षमां त्यक्त्वा चलत्वमचला गता ॥ २६ ॥
'निश्चय ही यह राजाओके भारी सैन्यसमुदायसे पीड़ित होकर थकती चली जा रही है। यह बात इसीसे स्पष्ट है कि यह अचला भूमि अपनी स्वाभाविक क्षमाको त्यागकर विचलित हो उठी है ॥ २६ ॥

तदस्याः श्रुतवन्तः स्म तच्चापि भवता श्रुतम् ।
भारावतरणार्थं हि मन्त्रयाम सह त्वया ॥ २७ ॥
'हमने इसीसे इसकी सारी बातें सुनी है और आपने भी उन्हें सुन लिया, अतः हम इसका भार दूर करनेके लिये आपके साथ मन्त्रणा (विचार) करना चाहते हैं ॥ २७ ॥

सत्यपथे हि स्थिताः सर्वे राजानो राष्ट्रवर्धनाः ।
नराणां च त्रयो वर्णा ब्राह्मणाननुयायिनः ॥ २८ ॥
'भूतलके समस्त राजा सन्मार्गमें स्थित हो अपने राष्ट्रों-की वृद्धि कर रहे हैं। मनुष्योंके क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणोंके अनुगामी हैं ॥ २८ ॥

सर्वे सत्यपरं वाक्यं वर्णा धर्मपरास्तथा ।
सर्वे वेदपरा विप्राः सर्वे विप्रपरा नराः ॥ २९ ॥
'मनुष्योंकी सारी बातें सत्यके ही आश्रित हैं। सभी वर्ण अपने-अपने धर्ममें तत्पर हैं। समस्त ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय-मे लगे हुए हैं तथा सभी मनुष्य ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहते है ॥ २९ ॥

एवं जगति वर्तन्ते मनुष्या धर्मकारणात् ।
यथा धर्मक्षयो न स्यात् तथा मन्त्रः प्रवर्त्यताम् ॥ ३० ॥
'इस प्रकार संसारके सभी मानव धर्मपूर्वक बर्ताव करते हैं। अतः ऐसी कोई मन्त्रणा की जाय, जिससे पृथ्वीका भार तो कम हो जाय, परंतु धर्मको हानि न पहुँचे ॥ ३० ॥

सतां गतिरियं नान्या धर्मश्चास्याः सुसाधनम् ।
राज्ञां चैव वधः कार्यों धरण्या भारनिर्णये ॥ ३१ ॥
'यही सत्पुरुषोंकी गति है, दूसरी नहीं और धर्म ही इसका उत्तम साधन है। इस पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये राजाओका वध आवश्यक कार्य है ॥ ३१ ॥

तदागच्छ महाभाग सह वै मन्त्रकारणात् ।
व्रजामो मेरुशिखरं पुरस्कृत्य वसुंधराम् ॥ ३२ ॥
'अतः महाभाग ! आइये, हम सब लोग इस विषयपर एक साथ विचार करनेके लिये पृथ्वीको आगे करके मेरु पर्वतके शिखरपर चलें' ॥ ३२ ॥

एतावदुक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा लोकपितामहः ।


म० ह० ७