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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 238 of 1169

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Page 238

[ विष्णुपर्व १ ] द्वितीयोऽध्यायः २१५

करनेवाले मनुष्यों, पक्षियों और पशुसमूहोंका महान् संहार करूँगा ॥ २५ ॥

आज्ञाप्यतां हयः केशी प्रलम्बो धेनुकस्तथा ।
अरिष्टो वृषभश्चैव पूतना कालियस्तथा ॥ २६ ॥
अटध्वं पृथिवीं कृत्स्नां यथेष्टं कामरूपिणः ।
प्रहरध्वं च सर्वेषु येऽस्माकं पक्षदूषकाः ॥ २७ ॥

'अश्वरूपधारी केशी, प्रलम्ब, धेनुक, वृषभरूपधारी अरिष्ट, पूतना और कालियनागको आज्ञा दे दो कि तुम सब लोग इच्छानुसार रूप धारण करके सारी पृथ्वीपर अपनी मौजसे घूमो और जो हमारे पक्ष की निन्दा करनेवाले हों, उन सबपर प्रहार करो ॥ २६-२७ ॥

गर्भस्थानामपि गतिर्विज्ञेया चैव देहिनाम् ।
नारदेन हि गर्भेभ्यो भयं नः समुदाहृतम् ॥ २८ ॥

'जो प्राणी गर्भमें निवास करते हों, उनका भी पता लगा लेना चाहिये; क्योंकि नारदजीने मेरे लिये गर्भोंसे ही भय बताया है ॥ २८ ॥

भवन्तो हि यथाकामं मोदन्तां विगतज्वराः ।
मां च वो नाथमाश्रित्य नास्ति देवकृतं भयम् ॥ २९ ॥

'तुमलोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार आनन्द भोगो। मैं तुम्हारा स्वामी और संरक्षक हूँ। मेरा आश्रय लेकर तुम्हें देवताओंकी ओरसे कोई भय नहीं है ॥ २९ ॥

स तु केलिकिलो विप्रो भेदशीलश्च नारदः ।
सुश्लिष्टानपि लोकेऽस्मिन् भेदयँल्लभते रतिम् ॥ ३० ॥

'नारद बाबा तो युद्ध करानेका ही खेल खेलते हैं। लोगोंमें फूट डाल देना उनका स्वभाव है। इस संसारमें जो लोग बड़े स्नेहसे भलीभाँति मिल-जुलकर रहते हैं, उनमें भी फूट डालनेमें इन्हें आनन्द आता है ॥ ३० ॥

कण्डूयमानः सततं लोकानटति चञ्चलः ।
घटमानो नरेन्द्राणां तन्त्रैर्वैराणि चैव हि ॥ ३१ ॥

'ये बड़े चञ्चल हैं और लोगोंमें सदा संघर्ष पैदा करते हुए घूमते रहते हैं। विभिन्न उपायोंद्वारा राजाओंमें वैर बढ़ा देनेके लिये ये सर्वदा सचेष्ट रहते हैं' ॥ ३१ ॥

एवं स विलपन्नेव वाङ्मात्रेणैव केवलम् ।
विवेश कंसो भवनं दह्यमानेन चेतसा ॥ ३२ ॥

इस प्रकार केवल वाणीमात्रसे प्रलाप करता हुआ कंस अपने भवनमें चला गया। उस समय उसका चित्त चिन्ताकी आगमें जल रहा था ॥ ३२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि नारदागमने कंसवाक्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें नारदजीका आगमन तथा कंसका वाक्यविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

कंसद्वारा देवकीके गर्भके विनाशका प्रयत्न, भगवान् विष्णुका पाताललोकमें स्थित 'षड्गर्भ' नामक दैत्योंके जीवोंका आकर्षण करके उन्हें निद्रा देवीके हाथमें देना और देवकीके गर्भमें क्रमशः स्थापित करनेका आदेश देकर अन्य कर्तव्य बताना तथा कार्यसाधनके अनन्तर बढ़नेवाली उस देवीकी महिमाका उल्लेख

वैशम्पायन उवाच
सोऽज्ञापयत संरब्धः सचिवानात्मनो हि तान् ।
यत्ता भवत सर्वे वै देवक्या गर्भकृन्तने ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! क्रोधमें भरे हुए कंसने अपने हितैषी मन्त्रियोंको आज्ञा दी कि तुम सब लोग देवकीके गर्भका उच्छेद करनेके लिये उद्यत हो जाओ ॥ १ ॥

प्रथमादेव हन्तव्या गर्भास्ते सप्त एव हि ।
मूलादेव तु हन्तव्यः सोऽनर्थो यत्र संशयः ॥ २ ॥

पहले गर्भसे ही आरम्भ करके वे सातों गर्भ नष्ट कर देने चाहिये। जहाँ संशय हो, उस अनर्थका मूलसे ही उच्छेद कर देना आवश्यक है ॥ २ ॥

देवकी च गृहे गुप्ता प्रच्छन्नैरभिरक्षिता ।
स्वैरं चरतु विश्रब्धा गर्भकाले तु रक्ष्यत्ताम् ॥ ३ ॥

देवकी अपने भवनमें गुप्त रक्षकोंद्वारा सुरक्षित रहकर अपनी इच्छाके अनुसार निर्भय विचरे; परंतु जब वह गर्भवती हो जाय, उस समय उसे विशेष नियन्त्रणमें रखना चाहिये ॥ ३ ॥

मासान् वै पुष्पमासादीन् गणयन्तु मम स्त्रियः ।
परिणामे तु गर्भस्य शेषं ज्ञास्यामहे वयम् ॥ ४ ॥

मेरी स्त्रियाँ रजस्वलावस्थासे ही आरम्भ करके उसके गर्भ-धारणके मासोंकी गणना करती रहें। जब गर्भके परिपक्व होकर प्रकट होनेका समय आ जाय, तबके जो शेष कृत्य है, उसे हमलोग स्वयं ही समझ लेंगे ॥ ४ ॥

वसुदेवस्तु संरक्ष्यः स्त्रीसनाथासु भूमिषु ।
अप्रमत्तैर्मम हितै रात्रावहनि चैव हि ।