विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 260 of 1169
Read in context२३८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
ततोऽवघुष्यत तदा घोषे तत् प्राकृतैर्जनैः। शीघ्रं गावः प्रकल्प्यन्तां भाण्डं समभिरोप्यताम्॥ १०॥ वत्सयूथानि काल्यन्तां युज्यन्तां शकटानि च। वृन्दावनमितः स्थानान्निवेशाय च गम्यताम्॥ ११॥ फिर तो प्राकृत जनोंद्वारा ब्रजमें यह घोषणा करा दी गयी कि 'ब्रजवासियो ! शीघ्र ही गौओंको तैयार कर लो। अपने बर्तन-भाँड़ोंको छकड़ोंपर लाद लो। बछड़ोंके समूहोंको अभी हाँक दो। गाड़ियाँ जोतो और यहाँसे वृन्दावनमें रहनेके लिये प्रस्थान करो' ॥ १०-११॥
तच्छ्रुत्वा नन्दगोपस्य वचनं साधु भाषितम्। उदतिष्ठद् व्रजः सर्वः शीघ्रं गमनलालसः॥ १२॥ नन्दगोपका कहा हुआ यह उत्तम वचन सुनकर सारे ब्रजके लोग जानेके लिये उत्सुक हो शीघ्र ही उठ खड़े हुए ॥ १२॥
प्रयाह्युत्तिष्ठ गच्छामः किं शेषे याहि योजय। उत्तिष्ठति व्रजे तस्मिन् गोपकोलाहलो ह्यभूत्॥ १३॥ इस प्रकार जब वह ब्रज वहाँसे उठने लगा, तब गोपोंका कोलाहल इस तरह सुनायी देने लगा—'अरे! चलो, उठो, हम सब लोग चल रहे हैं, क्या सो रहे हो, जाओ, छकड़ा जोतो' ॥ १३॥
उत्तिष्ठमानः शुशुभे शकटीशकटस्तु सः। व्याघ्रघोषमहाघोषो घोषः सागरघोषवान्॥ १४॥ गाड़ियों और छकड़ोंसे युक्त वह ब्रज जब वहाँसे उठकर चला, उस समय ऐसा भयंकर कोलाहल हुआ, मानो वहाँ व्याघ्रोंके दहाड़नेकी भारी आवाज हो रही हो अथवा समुद्रकी गर्जना सुनायी देती हो ॥ १४॥
गोपीनां गर्गरीभिश्च मूर्ध्नि चोत्तम्भितैर्घटैः। निष्पपात व्रजात् पंक्तिस्तारापंक्तिरिवाम्बरात्॥ १५॥ सिरपर माट और घड़े उठाये गोपियोंकी पंक्ति जब ब्रज-से निकली, उस समय ऐसा जान पड़ा, मानो आकाशसे ताराओंकी पाँत उतर आयी हो ॥ १५॥
नीलपीतारुणैस्तासां वस्त्रैरग्रस्तनोच्छ्रितैः। शक्रचापायते पंक्तिर्गोपीनां मार्गगामिनी॥ १६॥ उनके नीले, पीले और लाल वस्त्र स्तनोंके अग्रभागपर ऊँचे दिखायी देते थे। उन वस्त्रोंसे सुशोभित हो मार्गपर चलती हुई गोपियोंकी पंक्ति इन्द्रधनुषके समान शोभा पाती थी॥ १६॥
दामनीदामभारैश्च केचित् कायावलम्बिभिः। गोपा मार्गगता भान्ति सावरोहा इव द्रुमाः॥ १७॥ कुछ गोप मोटी और पतली रस्सियोंके बोझ लिये मार्ग-में चल रहे थे। वे रस्सियाँ उनके अङ्गोंपर लटक रही थीं। उनसे उपलक्षित होनेवाले वे गोप, बरोहोंसे युक्त वटवृक्षके समान प्रतीत होते थे॥ १७॥
स व्रजो व्रजता भाति शकटौघेन भास्वता। पोतैः पवनविक्षिप्तैर्निष्पतद्भिरिवार्णवः॥ १८॥ आगे बढ़ते हुए शोभाशाली शकटोंके समूहसे उस ब्रज-की ऐसी शोभा हो रही थी, मानो पवनकी प्रेरणासे वेगपूर्वक चलते हुए असंख्य जलपोतों (जहाजों) से युक्त महासागर सुशोभित हो रहा हो ॥ १८॥
क्षणेन तद् व्रजस्थानमीरिणं समपद्यत। द्रव्यावयवनिर्धूतं कीर्णं वायसमण्डलैः॥ १९॥ एक ही क्षणमें ब्रजका वह स्थान ऊसरभूमिके समान सूना हो गया। वहाँ जो अन्न आदि द्रव्योंके कण बिखरे हुए थे, उनके कारण उस स्थानपर कौओंकी मण्डली छा गयी थी॥ १९॥
ततः क्रमेण घोषः स प्राप्तो वृन्दावनं वनम्। निवेशं विपुलं चक्रे गवां चैव हिताय च॥ २०॥ तदनन्तर क्रमशः आगे बढ़ता हुआ वह ब्रज वृन्दावन-में जा पहुँचा और गौओंके हितके लिये बहुत दूरतक फैलकर बस गया ॥ २०॥
शकटावर्त्तपर्यन्तं चन्द्राद्धाकारसंस्थितम्। मध्ये योजनविस्तीर्णं तावद्द्विगुणमायतम्॥ २१॥ सीमापर छकड़ोंके बाड़ लगा दिये गये। सारा ब्रज अर्धचन्द्रकी आकृतिमें स्थित हो गया। बीचके भूभागकी चौड़ाई एक योजन और लंबाई दो योजनकी थी॥ २१॥
कण्टकीभिः प्रवृद्धाभिस्तथा कण्टकिद्रुमैः। निखातोच्छ्रितशाखाग्रैरभिगुप्तं समन्ततः॥ २२॥ बढ़ी हुई कण्टकी (नीलकौंटे आदि) तथा शाखाग्रभाग-को ऊँचे रखकर गाड़े गये काँटेदार वृक्षोंके द्वारा वह ब्रज चारों ओरसे सुरक्षित था ॥ २२॥
मन्थैरारोप्यमाणैश्च मन्थबन्धानुकर्षणैः। अद्भिः प्रक्षाल्यमानाभिर्गर्गरीभिरितस्ततः॥ २३॥ कीलैरारोप्यमाणैश्च दामनीपाशपाशितैः। स्तम्भनीभिर्धृताभिश्च शकटैः परिवर्तितैः॥ २४॥ नियोगपाशैरासक्तैर्गर्गरीस्तम्भमूर्धसु। छादनार्थं प्रकीर्णैश्च कटकैस्तृणसंकटैः॥ २५॥ शाखाविटङ्कैर्वृक्षाणां क्रियमाणैरितस्ततः। शोध्यमानैर्गवां स्थानैः स्थाप्यमानैरुलूखलैः॥ २६॥ प्राङ्मुखैः सिच्यमानैश्च संदीप्त्यद्भिश्च पावकैः। सवत्सचर्मास्तरणैः पर्यङ्कैश्चावरोपितैः॥ २७॥ तोयमुत्तारयन्तीभिः प्रेक्षन्तीभिश्च तद् वनम्। शाखाश्चाकर्षमाणाभिर्गोपीभिश्च समन्ततः॥ २८॥