विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
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Read in contextविष्णुपर्व ] एकादशोऽध्यायः [ २४३
काकपक्षधरः श्रीमाञ्छ्यामः पङ्कजलेक्षणः।
श्रीवत्सेनोरसा युक्तः शशाङ्क इव लक्ष्मणा ॥ २ ॥
उन्होंने मस्तकके पिछले भागमें काकपक्ष (बड़े-बड़े केश) धारण कर रखे थे। उनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल थे। वे श्यामसुन्दर छविसे युक्त एवं श्रीसम्पन्न थे तथा वक्षःस्थलमें श्रीवत्सचिह्न धारण करके शशचिह्नसे संयुक्त चन्द्रमाके समान शोभा पाते थे ॥ २ ॥
साङ्गदेनाग्रहस्तेन पङ्कजोद्भिन्नवर्चसा।
सुकुमाराभिताम्रेण क्रान्तविक्रान्तगामिना ॥ ३ ॥
बाजुबन्दसे विभूषित हुए उनके हाथोंका अग्रभाग विकसित कमलके समान कान्तिमान् था; उनके पैर सुकुमार, लाल और क्रान्त-विक्रान्त गतिसे चलनेवाले थे, जिनसे उनकी अनुपम शोभा होती थी ॥ ३ ॥
पीते प्रीतिकरे नृणां पद्मकिञ्जल्कसप्रभे।
सूक्ष्मे वसानो वसने ससंध्य इव तोयदः ॥ ४ ॥
वे कमल-केसरके समान पीले रंगके दो महीन वस्त्र पहने हुए थे, जो मनुष्योंके आनन्दको बढ़ानेवाले थे। उन वस्त्रोंको धारण करनेवाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण संध्याकालकी स्वर्णिम आभासे युक्त मेघके समान सुशोभित होते थे ॥ ४ ॥
वत्सव्यापारयुक्ताभ्यां व्यग्राभ्यां गण्डरज्जुभिः।
भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पूजिताभ्यां दिवौकसैः ॥ ५ ॥
उनकी दोनों भुजाएँ सुन्दर, गोल तथा देवताओंद्वारा पूजित थीं। वे बछड़ोंके व्यापारमें संलग्न थीं और उनके गलेमें घुँघरू बाँधनेकी रस्सियोंसे उलझी हुई थीं, ऐसी भुजाओंसे श्रीकृष्णकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ५ ॥
सदृशं पुण्डरीकस्य गन्धेन कमलस्य च।
रराज चास्य तद् बाल्ये रुचिरौष्ठपुटं मुखम् ॥ ६ ॥
बाल्य (पौगण्ड) अवस्थामें सुन्दर ओठोंसे सुशोभित उनका मुख कमलके सदृश सुन्दर और उसीके समान गन्धसे सुवासित होकर अपनी अद्भुत शोभा फैला रहा था ॥ ६ ॥
शिखाभिस्तस्य मुक्ताभी रराज मुखपङ्कजम्।
वृतं षट्पदपंक्तीभिर्यथा स्यात् पद्ममण्डलम् ॥ ७ ॥
उनका मुखारविन्द खुले अलकोंसे आवृत होकर ऐसी शोभा पा रहा था, मानो भ्रमरावलियोंसे युक्त कमलमण्डल सुशोभित हो रहा हो ॥ ७ ॥
तस्यार्जुनकदम्बाढ्या नीपकन्दलमालिनी।
रराज माला शिरसि नक्षत्राणां यथा दिवि ॥ ८ ॥
उनके मस्तकपर अर्जुन और कदम्बके फूलोंसे युक्त एक माला शोभा पा रही थी, जो नीपके पुष्पों तथा नूतन अंकुरोंसे सुशोभित थी। वह आकाशमें तारिकाओंकी भाँति अपनी छटा छिटका रही थी ॥ ८ ॥
स तया मालया वीरः शुशुभे कण्ठसक्तया।
मेघमालाम्बुदश्यामो नभस्य इव मूर्तिमान् ॥ ९ ॥
वैसी ही माला उनके कण्ठमें भी पड़ी हुई थी, जिससे वीरवर घनश्याम श्रीकृष्ण मेघमालाओंकी श्यामकन्तिसे सम्पन्न मूर्तिमान् भाद्रपद मासकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ९ ॥
एकेनामलपत्रेण कण्ठसूत्रावलम्बिनां।
रराज बर्हिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना ॥ १० ॥
उनके कण्ठगत सूत्रमें एक निर्मल मोरपङ्ख लटक रहा था, जो मन्दगतिसे बहनेवाली वायुके हलके आघातसे हिल रहा था। उस मोरपङ्खसे भी उनके श्रीअङ्गोंकी शोभावृद्धि हो रही थी ॥ १० ॥
क्वचिद् गायन् क्वचित् क्रीडंश्चञ्चूर्यैश्च क्वचित् क्वचित्।
पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयँश्च क्वचिद् वने ॥ ११ ॥
वे वनमें कहीं गाते, कहीं खेलते, कहीं भ्रमण करते और कहीं कानोंको सुख देनेवाला पत्तोंका बाजा बजाते थे ॥
गोपवेणुं सुमधुरं कामात् तमपि वादयन्।
प्रह्लादनार्थं च गवां क्वचिद् वनगतो युवा ॥ १२ ॥
किसी समय वनमें जाकर तरुणरूप धारण करके गौओंको आनन्दित करनेके लिये इच्छानुसार अत्यन्त मधुर स्वरमें मुरली बजाया करते थे, जो उस समयके गोपोंका प्रमुख वाद्य थी ॥ १२ ॥
गोकुलेऽभ्युदरश्यामश्चचार द्युतिमान् प्रभुः।
रेमे च तत्र रम्यासु चित्रासु वनराजिषु ॥ १३ ॥
नूतन जलधरके समान श्याम एवं कान्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलके आसपास विचरने तथा रमणीय एवं विचित्र वनश्रेणियोंमें विहार करने लगे ॥ १३ ॥
मयूररवघुष्टासु मदनोद्दीपनीषु च।
मेघनादप्रतिव्यूहेर्नादितासु समन्ततः ॥ १४ ॥
वहाँ मयूरोंकी केकाध्वनि गूँजती रहती थी। वे वन-पंक्तियाँ कामी पुरुषोंके मनमे कामभावका उद्दीपन करनेवाली थीं। मेघोंकी गर्जनाकी प्रतिध्वनियोंसे वहाँ सब ओर कोलाहल मचा रहता था ॥ १४ ॥
शाद्वलच्छन्नमार्गासु शिलीन्ध्राभरणासु च।
कन्दलामलपत्रासु स्रवन्तीषु नवं जलम् ॥ १५ ॥
उनके मार्ग घासोंसे ढक गये थे। जगह-जगह उगे हुए छत्रक उनके आभूषण-से प्रतीत होते थे। उनमें नये-नये पल्लव अंकुरित हो रहे थे तथा वे नूतन जल टपका रही थीं ॥
केसराणां नवैर्गन्धैर्मदनिःश्वसितोपमैः।
अभीक्ष्णं निःश्वसन्तीषु कामिनीष्विव नित्यशः ॥ १६ ॥
मदजनित निःश्वासके समान केसरोंकी नूतन गन्धसे वे