विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 287 of 1169
Read in contextविष्णुपर्व ] अष्टादशोऽध्यायः २६५
मेघोंके बरसाये हुए तथा बारंबार बरसाये जाते हुए जलसे आवृत हो वहाँ सब ओरकी भूमि जलमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥ १७ ॥
विनेदुर्वर्हिणस्तत्र तोककन्दरुताः खगाः। विवृद्धिं निम्नगा याताः प्लवगाः सम्प्लवं गताः ॥ १८ ॥
उस समय वहाँ मोर जोर-जोरसे बोलने लगे। पक्षियोंकी आवाज बहुत कम हो गयी। नदियोंमें बाढ़ आ गयी और किनारेके वृक्ष प्रवाहमें बह गये ॥ १८ ॥
गर्जितेन च मेघानां पर्जन्यनिनदेन च। तर्जितानीव कम्पन्ते तृणानि तरुभिः सह ॥ १९ ॥
मेघोंकी गर्जना तथा पर्जन्यदेवके गम्भीर नादसे डाँटे गयेकी भाँति वृक्षोंसहित तृण काँपने लगे ॥ १९ ॥
प्राप्तोऽन्तकालो लोकानां व्यक्तमेकार्णवा मही । इति गोपगणा वाक्यं व्याहरन्ति भयार्दिताः ॥ २० ॥
उस समय भयसे पीड़ित हुए गोप आपसमें कहने लगे कि 'निश्चय ही समस्त लोकोंका अन्तकाल आ पहुँचा है और पृथ्वी एकार्णवमें मग्न हो रही है' ॥ २० ॥
तेनोत्पाताम्बुवर्षेण गावो विप्रहता भृशम् । हम्भारवैः क्रन्दमाना न चेलुः स्तम्भितोपमाः ॥ २१ ॥
उस उत्पातस्वरूप जलकी भारी वर्षासे अत्यन्त ताड़ित एवं पीड़ित हुई गौएँ रँभानेकी ध्वनिसे करुणक्रन्दन करती हुई हिल-डुल भी न सकीं। ऐसा जान पड़ता था, उनके सारे अङ्ग अकड़ गये हैं ॥ २१ ॥
निष्कम्पसक्थिचरणा निष्प्रयत्नखुराननाः । हृष्टरोमार्द्रतनवः क्षामकुक्षिपयोधराः ॥ २२ ॥
उनकी जाँघें और पैर हिल नहीं पाते थे, खुर और मुख निश्चेष्ट थे, भीगे हुए शरीरमें रोंगटे खड़े हो गये थे और पेट तथा थन अत्यन्त दुबले होकर सिकुड़ गये थे ॥२२॥
काश्चित् प्राणाञ्जहुः श्रान्ता निपेतुः काश्चिदातुराः । काश्चित्सवत्साः पतिता गावः शीकरवेजिताः ॥ २३ ॥
कुछ गौओंने पीड़ासे श्रान्त होकर अपने प्राण त्याग दिये। कुछ आतुर होकर गिर पड़ीं और कितनी ही गौएँ जलके छींटोंसे उद्विग्न होकर बछड़ोंसहित धराशायिनी हो गयीं ॥ २३ ॥
काश्चिदाक्रम्य क्रोडेन वत्सांस्तिष्ठन्ति मातरः । विमुखाः श्रान्तसक्थ्यश्च निराहाराः कृशोदराः। पेतुराता॑ वेपमाना गावो वर्षपराजिताः ॥ २४ ॥
कुछ गौमाताएँ बछड़ोंको अपने अङ्कमें छिपाकर खड़ी थीं, कितनी ही बछड़ोंकी ओरसे विमुख हो गयी थीं, उनकी जाँघें शिथिल हो रही थीं, कुछ दाना-घास न मिलनेके कारण उनके पेट भीतरको धँस गये थे। वर्षासे परास्त होकर पीड़ित हुई गौएँ थर-थर काँपती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ती थीं ॥ २४॥
वत्साश्चोन्मुखका बाला दामोदरमुखाः स्थिताः । त्राहीति वदनैर्दीनैः कृष्णमूचुरिवार्दिताः ॥ २५ ॥
छोटे-छोटे बछड़े मुँह ऊपर उठाकर दामोदरकी ओर देखते हुए खड़े थे, मानो वे पीड़ित बछड़े अपने दीन मुखों- से श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कह रहे थे कि 'प्रभो ! हमारी रक्षा कीजिये' ॥ २५ ॥
गवां तत् कदनं दृष्ट्वा दुर्दिनागमजं महत् । गोपांश्चासन्ननिधनान् कृष्णः कोपं समादधे ॥ २६ ॥
इस दुर्दिनके आनेसे गौओंका वह महासंहार होता देख और गोपोंको भी मौतके निकट पहुँचा हुआ जान श्रीकृष्णने इन्द्रके प्रति महान् कोप धारण किया ॥ २६ ॥
स चिन्तयित्वा संरब्धो दृष्टो योगो मयेति च । आत्मानमात्मना वाक्यमिदमूचे प्रियंवदः ॥ २७ ॥
प्रिय वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णने कुछ देर सोच- विचारकर रोषावेशसे युक्त हो स्वयं ही अपने-आपसे इस प्रकार कहा— 'इस वर्षासे बचनेका उपाय मैंने देख लिया ॥ २७ ॥
अद्याहमिममत्पाट्य सकाननवनं गिरिम् । कल्पयेयं गवां स्थानं वर्षत्राणाय दुर्धरम् ॥ २८ ॥
'आज मैं वन और काननोंसहित इस दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उखाड़कर गौओंको वर्षासे बचानेके लिये सुरक्षित स्थानका निर्माण करूँगा ॥ २८ ॥
अयं धृतो मया शैलः पृथ्वीगृहनिभोपमः । त्रास्यते सव्रजा गा वै मद्ध्वयस्थ भविष्यति ॥ २९ ॥
'मेरे द्वारा धारण किया हुआ यह पर्वत पृथ्वीपर बने हुए घरके समान होकर व्रजसहित समूची गौओंका परित्राण करेगा और मेरे अधीन हो जायगा' ॥ २९ ॥
एवं स चिन्तयित्वा तु कृष्णः सत्यपराक्रमः । वाह्रोर्बलं दर्शयिष्यन् समीपं तं महीधरम् । दोर्भ्यामुत्पाटयामास कृष्णो गिरिरिवापरः ॥ ३० ॥
इस प्रकार सोच-विचारकर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्णने अपनी दोनों भुजाओंका बल दिखाते हुए उस निकटवर्ती पर्वतको दोनों हाथोंसे पकड़कर उखाड़ लिया। उस समय श्रीकृष्ण दूसरे पर्वतके समान ही जान पड़ते थे ॥ ३० ॥
स धृतः संगतो मेघैर्गिरिः सव्येन पाणिना। गृहभावं गतस्तत्र गृहाकारेण वर्चसा ॥ ३१ ॥
भगवान्के बाये हाथसे धारण किया गया और मेघोंसे सटा हुआ वह पर्वत उनके गृहाकारक तेज या संकल्पसे वहाँ गृहभावको प्राप्त हो गया ॥ ३१ ॥