विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
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Read in contextविष्णुपर्व ] द्वांविशोऽध्यायः २८५
ऐसा कर्म कर डाला, जिसके कारण यादवोंके ऊपरसे सबका विश्वास उठ गया। तुमने यदुवंशियोंको कलङ्कित करके निन्दाके योग्य बना दिया ॥ ८३ ॥
अशाम्यं वैरमुत्पन्नं मम कृष्णस्य चोभयोः।
शान्तिमेकतरे शान्ते गते यास्यन्ति यादवाः ॥ ८४ ॥
'अब तो हम दोनोंमें—मुझ कंस और कृष्णमेकभी शान्त न होनेवाला वैर उत्पन्न हो गया है। हममेसे किसी एक व्यक्तिके शान्त होने—मर जानेपर ही यादवोंको शान्ति मिलेगी ॥ ८४ ॥
गच्छ दानपते क्षिप्रं ताविहानयितुं व्रजात्।
नन्दगोपं च गोपांश्च करदान् मम शासनात् ॥ ८५ ॥
'दानपते अक्रूर ! तुम मेरे आदेशसे वसुदेवके उन दोनों पुत्रोंको, नन्दगोपको तथा मुझे कर देनेवाले अन्य गोपोंको भी ब्रजसे यहाँ बुला लानेके लिये शीघ्र जाओ ॥ ८५ ॥
वाच्यश्च नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम्।
शीघ्रमागच्छ नगरं गोपैः सह समन्वितः ॥ ८६ ॥
'नन्दगोपसे कह देना कि तुम हमारा वार्षिक कर लेकर गोपोंके साथ शीघ्र ही मथुरापुरीको चलो ॥ ८६ ॥
कृष्णसंकर्षणौ चैव वसुदेवसुतावुभौ।
द्रष्टुमिच्छति वै कंसः सभृत्यः सपुरोहितः ॥ ८७ ॥
'वसुदेवके ये दोनों पुत्र जो श्रीकृष्ण और संकर्षण हैं, इन्हें सेवकों और पुरोहितोंसहित महाराज कंस देखना चाहते हैं ॥ ८७ ॥
एतौ युद्धविदौ रङ्गे कालनिर्माणयोधिनौ।
दृढौ च कृतिनौ चैव शृणोमि व्यायतोद्यमौ ॥ ८८ ॥
'सुनता हूँ कि ये दोनों अखाड़ेमे लड़ना जानते हैं और सामयिक युद्धकी कलामे कुशल हैं। इन्होंने दीर्घकालसे इसके लिये विशेष यत्न और परिश्रम किया है तथा ये दोनों भाई सुदृढ़ और चतुर हैं ॥ ८८ ॥
अस्माकमपि मल्लौ द्वौ सज्जौ युद्धकृतोत्सवौ।
ताभ्यां सह नियोत्स्येते तौ युद्धकुशलावुभौ ॥ ८९ ॥
'हमारे यहाँ भी दो पहलवान लड़ाईके लिये तैयार हैं। इन्हें लड़ने-भिड़नेमें बड़ा आनन्द आता है। वे दोनों ही युद्धमे कुशल हैं, जो उन दोनों श्रीकृष्ण और संकर्षणके साथ युद्ध करेंगे ॥ ८९ ॥
द्रष्टव्यौ च मयावश्यं बालौ तावमरोपमौ।
पितृष्वसुः सुतौ मुख्यौ व्रजवासौ वनेचरौ ॥ ९० ॥
'वे दोनों देवोपम बालक मेरी चचेरी बहिनके प्रधान पुत्र हैं, जो इस समय ब्रजमे रहते और वनमे विचरते हैं। मुझे अवश्य उन दोनोंको देखना चाहिये ॥ ९० ॥
वक्तव्यं च व्रजे तस्मिन् समीपे व्रजवासिनाम्।
राजा धनुर्मखं नाम कारयिष्यति वै सुखी ॥ ९१ ॥
'उस ब्रजमे जाकर व्रजवासियोंके समीप तुम्हे यह कहना चाहिये कि सुखी राजा कंस धनुर्यज्ञका उत्सव करायेंगे ॥९१॥
संनिकृष्टे वने ते तु निवसन्त्व यथासुखम्।
जनस्यामन्त्रितस्यार्थे यथा स्यात् सर्वमव्ययम् ॥९२ ॥
'इस उत्सवमें आमन्त्रित हुए लोगोंको जिस प्रकार हर तरहसे आराम मिले, उसके लिये तुम सब ब्रजवासी मथुराके समीपवर्ती वनमे आकर सुखपूर्वक रहो ॥ ९२ ॥
पयसः सर्पिषश्चैव दध्नो दध्युत्तरस्य च।
यथाकामप्रदानाय भोज्याधिश्रयनाय च ॥ ९३ ॥
'दूध, घी, दही और तक्र आदिको अतिथियोंकी इच्छाके अनुसार जुटाकर देना और खीर आदि बनानेके लिये जब जितने दूधको आगपर रखना आवश्यक हो, तब-तब उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये पर्याप्त दूध प्रस्तुत करना—इसी उद्देश्यसे तुम्हें नगरके निकट निवास करना है ॥ ९३ ॥
अक्रूर गच्छ शीघ्रं त्वं तावानय ममाज्ञया।
संकर्षणं च कृष्णं च द्रष्टुं कौतूहलं हि मे ॥ ९४ ॥
'अक्रूर ! शीघ्र जाओ। मेरी आज्ञासे उन दोनों संकर्षण और कृष्णको यहाँ ले आओ। मुझे उन्हे देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ९४ ॥
तयोरागमने प्रीतिः परमा मत्कृता भवेत्।
दृष्ट्वा तु तौ महावीर्यौ तद् विधास्यामि यद्धितम् ॥ ९५ ॥
'उनके आ जानेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, (जिसका श्रेय तुम्हे मिलेगा । ) उन दोनों महापराक्रमी बालकोंको देखकर मैं वही करूँगा, जिसमें मेरा हित होगा ॥ ९५ ॥
शासनं यदि वा श्रुत्वा मम तौ परिभाषितम्।
नागच्छेतां यथाकालं निग्राह्यावपि तौ मम ॥ ९६ ॥
'मेरी यह आज्ञा तथा बातें सुनकर यदि वे दोनों यहाँ ठीक समयपर आनेको तैयार न हों तो मेरी रायमें वे बंदी बना लेनेके भी योग्य हैं ( अर्थात् तुम उन्हें कैद करके भी ला सकते हो ) ॥ ९६ ॥
सान्त्वमेव तु वालेषु प्रधानं प्रथमो नयः।
मधुरेणैव तौ मन्दौ स्वयमेवानायाशु वै ॥ ९७ ॥
'समझा-बुझाकर काम लेना ही बालकोंके प्रति प्रधान एवं प्रमुख नीति है; इसलिये तुम उन दोनों मूर्खोंको मीठी बातोसे स्वयं ही राजी करके यहाँ शीघ्र ले आओ ॥ ९७ ॥
अक्रूर कुरु मे प्रीतिमेतां परमदुर्लभाम्।
यदि वा नोपजप्तोऽसि वसुदेवेन सुव्रत ।
तथा कर्तव्यमेतद्धि यथा तावागमिष्यतः ॥ ९८ ॥
'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अक्रूर ! यदि वसुदेवने तुम्हारे भी कान न भर दिये हों तो तुम मेरी इस परम दुर्लभ प्रीतिका सम्पादन करो। तुम्हे वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वे दोनों स्वतः यहाँ आ जायँ' ॥ ९८ ॥
एवमाक्षिप्यमाणोऽपि वसुदेवो वस्तूपमः।
सागराकारमात्मानं निष्प्रकम्पमधारयत् ॥ ९९ ॥
कंसके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी वसुओंके समान शक्तिशाली वसुदेवने अपने समुद्र-जैसे हृदयको क्षुब्ध या कम्पित नहीं होने दिया। उसे धैर्यपूर्वक काबूमें रखा ॥९९॥
वाक्छल्यैस्ताड्यमानस्तु कंसेनादीर्घदर्शिना।
क्षमां मनसि संधाय नोत्तरं प्रत्यभाषत ॥१००॥