विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 743 of 1169
Read in context[विष्णुपर्व ] पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२१
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णके जृम्भास्त्रसे भगवान् शङ्करका जँभाईके वशीभूत होना, ब्रह्माजीके द्वारा शिवजीको विष्णुके साथ उनकी एकताका स्मरण दिलाना तथा ब्रह्माजीके पूछनेपर मार्कण्डेयजीका हरिहरकी एकता स्थापित करते हुए माहात्म्यसहित हरिहरात्मक स्तोत्रका वर्णन करना
वैशम्पायन उवाच
अन्धकारीकृते लोके प्रदीप्ते त्र्यम्बके तथा।
न नन्दी नापि च रथो न रुद्रः प्रत्यदृश्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैष्णवास्त्रका प्रयोग होनेपर जब सम्पूर्ण जगत्में अन्धकार छा गया और भगवान् शङ्कर उसके तेजसे जलने-से लगे, उस समय उस अस्त्रसे आच्छादित होनेके कारण न नन्दी, न रथ और न रुद्रदेव ही दिखायी देते थे ॥ १ ॥
द्विगुणं दीप्तदेहस्तु रोषेण च बलेन च।
त्रिपुरान्तकरो बाणं जग्राह स चतुर्मुखम् ॥ २ ॥
तब रोष और बलसे त्रिपुरान्तकारी भगवान् शिवका शरीर दुगुना दमक उठा। उन्होंने चार फलवाला बाण अपने हाथमें लिया ॥ २ ॥
संदधत् कार्मुकं चैव क्षेप्तुकामस्त्रिलोचनः।
विज्ञातो वासुदेवेन चित्तज्ञेन महात्मना ॥ ३ ॥
वे भगवान् त्रिलोचन उस बाणको धनुषपर रखकर छोड़ना ही चाहते थे कि सबके मनकी बात जाननेवाले महात्मा वासुदेवने उनके मनोभावको समझ लिया ॥ ३ ॥
जम्भणं नाम सोऽप्यस्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः।
हरं संजृम्भयामास क्षिप्रकारी महाबलः ॥ ४ ॥
फिर तो शीघ्रकारी महाबली पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने जृम्भणास्त्र उठाया और उसके द्वारा महादेवजीको जृम्भासे अभिभूत कर दिया ॥ ४ ॥
सशरः सधनुश्चैव हरस्तेनाशु जृम्भितः।
संज्ञां न लेभे भगवान् विजेतसुररक्षसाम् ॥ ५ ॥
इससे भगवान् शिव शीघ्र ही धनुष और बाण लिये जँभाई लेने लगे; असुरों और राक्षसोंपर विजय पानेवाले भगवान् शिवको उस समय सुध-बुध न रही ॥ ५ ॥
सशरं सधनुष्कं च दृष्ट्वाऽऽत्मानं विजृम्भितम् ।
बलोन्मत्तोऽथ बाणोऽसौ शर्वं चोदयतेऽसकृत् ॥ ६ ॥
धनुष और बाणसहित आत्मस्वरूप शिवको जँभाईके वशीभूत हुआ देख बलोन्मत्त बाणासुर बारंबार उन्हें युद्धके लिये प्रेरित करने लगा ॥ ६ ॥
ततो ननाद भूतात्मा स्निग्धगम्भीरया गिरा।
प्रध्मापयामास तदा कृष्णः शङ्खं महाबलः ॥ ७ ॥
तब सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महाबली भगवान् श्रीकृष्णने स्निग्ध गम्भीर वाणीमें सिंहनाद किया और जोर-जोरसे शङ्ख बजाया ॥ ७ ॥
पाञ्चजन्यस्य घोषेण शार्ङ्गविस्फूर्जितेन च।
देवं विजृम्भितं दृष्ट्वा सर्वभूतानि तत्रसुः ॥ ८ ॥
पाञ्चजन्य शङ्खके गम्भीर घोषसे, शार्ङ्ग-धनुषकी टङ्कारसे तथा महादेवजीको जृम्भाके वशीभूत देखकर समस्त प्राणी थर्रा उठे ॥ ८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र रुद्रस्य पार्षदा रणे।
मायायुद्धं समाश्रित्य प्रद्युम्नं पर्यवारयन् ॥ ९ ॥
इसी बीचमें रुद्रदेवके पार्षदोंने मायायुद्धका आश्रय ले रणभूमिमें प्रद्युम्नको घेर लिया ॥ ९ ॥
सर्वांस्तु निद्रावशगान् कृत्वा मकरकेतुमान् ।
दानवान् नाशयत् तत्र शरजालेन वीर्यवान् ।
प्रमाथगणभूयिष्ठांस्तत्र तत्र महाबलान् ॥ १० ॥
परंतु पराक्रमी मकरध्वज प्रद्युम्नने उन सबको निद्राके वशीभूत करके वहाँ बाणसमूहोंद्वारा महाबली दानवोंका—जिनमें प्रमथगणोंकी संख्या अधिक थी—विनाश कर डाला॥ १० ॥
ततस्तु जृम्भमाणस्य देवस्याक्लिष्टकर्मणः।
ज्वाला प्रादुरभूद् वक्त्राद् दहन्तीव दिशो दश ॥ ११ ॥
तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले तथा जृम्भाके वशीभूत हुए महादेवजीके मुखसे एक आगकी ज्वाला प्रकट हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ ११ ॥
ततस्तु धरणीदेवी पीड्यमाना महात्मभिः।
ब्रह्माणं विश्वधातारं वेपमानाभ्युपागमत् ॥ १२ ॥
उस समय उन महात्माओंसे पीड़ित हुई पृथिवीदेवी काँपती हुई विश्व-स्रष्टा ब्रह्माजीकी शरणमें गयी ॥ १२ ॥
पृथिव्युवाच
देवदेव महाबाहो पीड्यामि परौजसा।
कृष्णरुद्रभराक्रान्ता भविष्यार्काणवा पुनः ॥ १३ ॥
पृथिवी बोली—देवाधिदेव ! महाबाहो ! मैं महान् ओज (बल-पराक्रम) से पीड़ित हूँ। भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीके भारसे आक्रान्त हो पुनः एकार्णवके जलमें निमग्न हो जाऊँगी-ऐसा जान पड़ता है ॥ १३ ॥