विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास
Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)
Page 751 of 1169
Read in contextविष्णुपर्व ] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७२९
एहोहि जय मां बाण जितो वा वसुधातले ।
चिरायावाङ्मुखो दीनः पतितः शेष्यसेऽसुरैः ॥ ५१ ॥
बाण ! आ ! आ !! मुझे युद्धमें जीत ले अथवा मेरे द्वारा पराजित हो तू ही पृथ्वीपर नीचे मुँह किये दीन-हीन हो चिरकालके लिये गिरकर असुरोंके साथ सो जायगा ॥ ५१ ॥
इत्येवमुक्त्वा बाणं तु मर्मभेदिभिराशुगैः ।
निर्बिभेद तदा कृष्णस्तममोघैर्महाशरैः ॥ ५२ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्णने उस समय मर्मस्थानोंका भेदन करनेवाले शीघ्रगामी अमोघ महाबाणोंद्वारा बाणासुरको घायल कर दिया ॥ ५२ ॥
विनिर्भिन्नस्तु कृष्णेन मार्गणैर्मर्मभेदिभिः ।
स्मयन् बाणस्ततः कृष्णं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५३ ॥
श्रीकृष्णके मर्मभेदी बाणोंद्वारा क्षत विक्षत हुए बाणासुरने मुसकराकर उन्हें भी बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ५३ ॥
ज्वलद्भिरिव संयुक्तं तस्मिन् युद्धे सुदारुणे ।
ततः परिघनिस्त्रिंशैर्गदातोमरशक्तिभिः ॥ ५४ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव छादयामास केशवम् ।
उस अत्यन्त भयानक युद्धमें उन प्रज्वलित बाणोंसे विंधे हुए श्रीकृष्णको बाणासुरने फिर परिघ, खङ्ग, गदा, तोमर, शक्ति, मूसल और पट्टिशोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ५४॥
स तु बाहुसहस्रेण गर्वितो दैत्यसत्तमः ॥ ५५ ॥
योधयामास समरे द्विबाहुमथ लीलया ।
अपनी सहस्र भुजाओंसे घमंडमें भरा हुआ दैत्यप्रवर बाणासुर लीलापूर्वक द्विबाहु बने हुए श्रीकृष्णके साथ समराङ्गणमें युद्ध करने लगा ॥ ५५॥
लाघवात्तु तस्य कृष्णस्य बलिसूनू रुषान्वितः ॥ ५६ ॥
ततोऽस्त्रं परमं दिव्यं तपसा निर्मितं महत् ।
यदप्रतिहतं युद्धे सर्वामित्रविनाशनम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मणा विहितं दिव्यं तन्मुमोच दितेः सुतः ।
श्रीकृष्णकी फुर्तीसे बलिपुत्र बाणासुरको बड़ा रोष हुआ। उस दैत्यने तपस्याद्वारा निर्मित एक परम दिव्य एवं महान् अस्त्रको, जो ब्रह्माजीके द्वारा रचा गया था, युद्धमे कभी प्रतिहत नहीं होता था और समस्त शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ था, श्रीकृष्णपर छोड़ दिया ॥ ५६-५७॥
तस्मिन् मुक्ते दिशः सर्वास्तमःपिहितमण्डलाः॥ ५८ ॥
प्रादुरासन् सहस्राणि सुघोराणि च सर्वशः ।
उस अस्त्रके छूटते ही सम्पूर्ण दिशाओंका मण्डल अन्धकारसे आच्छन्न हो गया। सब ओर अत्यन्त भयंकर सहस्रों (अपशकुन) प्रकट होने लगे ॥ ५८॥
तमसा संवृते लोके न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५९ ॥
साधु साध्विति वाणं तु पूजयन्ति स्म दानवाः ।
हा हा धिगिति देवानां श्रूयते वागुदीरिता ॥ ६० ॥
वहाँका सारा जगत् अन्धकारसे ढक जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं होता था। उस समय समस्त दानव 'साधु ! साधु !!' कहकर बाणासुरकी प्रशंसा करने लगे और देवताओंके मुखसे निकली हुई वाणी—'हाय ! हाय !! धिक्कार है।' इत्यादि रूपसे सुनायी देने लगी ॥ ५९-६० ॥
ततोऽस्त्रबलवेगेन सार्चिष्मन्त्यः सुदारुणाः ।
घोररूपा महावेगा निपेतुर्बाणवृष्टयः ॥ ६१ ॥
तत्पश्चात् उस अस्त्रके बल और वेगसे आगकी लपटोंसे युक्त परम दारुण बाणोंकी अत्यन्त वेगपूर्वक घोर वर्षा होने लगी ॥६१॥
नैव वाताः प्रवायंन्ति न मेघाः संचरन्ति च ।
अस्त्रे विसृष्टे बाणेन दह्यमाने च केशवे ॥ ६२ ॥
बाणासुरके उस अस्त्रके छूटते ही भगवान् केशव दग्ध-से होने लगे। उस समय आकाशमें न तो हवा चलती थी और न मेघोंका ही संचार होता था ॥ ६२ ॥
ततोऽस्त्रं सुमहावेगं जग्राह मधुसूदनः ।
पार्जन्यं नाम भगवान् कालान्तकनिभं रणे ॥ ६३ ॥
तब भगवान् मधुसूदनने उस रणभूमिमें काल और अन्तकके समान भयंकर तथा महान् वेगशाली पार्जन्यनामक अस्त्र उठाया और चला दिया ॥ ६३ ॥
ततो वितिमिरे लोके शराग्निः प्रशमं गतः ।
दानवा मोघसंकल्पाः सर्वेऽभूवंस्तदा भृशम् ॥ ६४ ॥
फिर तो जगत्का अन्धकार दूर हो गया, बाणासुरके बाणोंकी आग बुझ गयी और समस्त दानवोंके मनसूबे उस समय व्यर्थ हो गये ॥ ६४ ॥
दानवास्त्रं प्रशान्तं तु पर्जन्यास्त्रेऽभिमन्त्रिते ।
ततो देवगणाः सर्वे नदन्ति च हसन्ति च ॥ ६५ ॥
पार्जन्यास्त्रके अभिमन्त्रित होनेपर उस दानवास्त्रको शान्त हुआ देख समस्त देवता सिंहनाद करने और हँसने लगे॥
हते शस्त्रे महाराज दैतेयः क्रोधमूर्च्छितः ।
भूयः स छादयामास केशवं गरुडे स्थितम् ॥ ६६ ॥
मुसलैः पट्टिशैश्चैव च्छादयामास केशवम् ।
महाराज ! अपने अस्त्रके नष्ट हो जानेपर वह दैत्य क्रोधसे अचेत-सा हो गया। उसने गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्णको पुनः मूसलों और पट्टिशोंकी वर्षासे ढक दिया ॥ ६६॥
तस्य तां तरसा सर्वो वाणवृष्टिं समुद्यताम् ॥ ६७ ॥
प्रहसन् वारयामास केशवः शत्रुसूदनः ।
शत्रुसूदन केशवने उसके द्वारा वेगपूर्वक की हुई उस सारी बाणवर्षाका हँसते-हँसते निवारण कर दिया ॥ ६७॥