Skip to content
BharatKosha
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास

Source: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (origin)

DevanagariHindipublished1,169 pages

Page 95 of 1169

Read in context
Page 95

७२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


ते वयं सामपूर्वं वै दानं भेदं तथैव च ।
प्रयोक्ष्यामस्ततः शुद्धो दैवतान्यभिवाद्य च ॥ ६० ॥
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैर्वह्नीन् सम्पूज्य च द्विजान् ।
ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः प्रयास्यसि जयाय वै ॥ ६१ ॥

हम पहले उसपर साम, दान और भेद नीतियोंका प्रयोग करेंगे। तबतक आप शुद्ध भी हो जायेंगे, फिर आप देवताओंको प्रणाम करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्नि और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर विजयके लिये प्रस्थान कीजियेगा ॥ ६०-६१ ॥

अस्त्राणि न प्रयोज्यानि न प्रवेष्टव्यञ्च संगरः ।
अशौचे वर्तमाने तु वृद्धानामिति शासनम् ॥ ६२ ॥

वृद्धोंका कथन है कि जब अशौच चल रहा हो, उस समय अस्त्रोंका प्रयोग और युद्धमे प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

सामदानादिभिः पूर्वमपि भेदेन वा ततः ।
तं हनिष्यसि विक्रम्य शम्बरं मघवानिव ॥ ६३ ॥

अतः पहले साम, दान, भेदसे इसको वशमें करनेका यत्न किया जाय (तब भी न माने तो) फिर जैसे इन्द्रने शम्बरासुरको मार डाला था, उसी प्रकार पराक्रम करके आप इसको मार डालियेगा ॥ ६३ ॥

प्राज्ञानां वचनं काले वृद्धानां च विशेषतः ।
श्रोतव्यमिति तच्छ्रुत्वा निवृत्तोऽस्मि नराधिप ॥ ६४ ॥

समय पड़नेपर बुद्धिमानों और वृद्धोंकी बात विशेषरूपसे सुननी चाहिये। राजन्! यह सुनकर मैं युद्धसे रुक गया ॥ ६४ ॥

ततस्तैः संक्रमः सर्वैः प्रयुक्तः शास्त्रकोविदैः ।
तस्मिन् काले कुरुश्रेष्ठ कर्म चारब्धमुत्तमम् ॥ ६५ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! तब उन शास्त्रज्ञानमें चतुर सम्पूर्ण मन्त्रियोंने साम, दान, भेद आदि दूसरे उपायोंद्वारा शान्ति-स्थापनका प्रयोग किया और इसके लिये उत्तम कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ६५ ॥

स सामादिभिरेवाद्याद्युपायैः प्राज्ञचिन्तितैः ।
अनुनीयमानो दुर्बुद्धिरनुनेतुं न शक्यते ॥ ६६ ॥

परंतु वे बुद्धिमानोंके विचारे हुए साम, दान आदि उपायोका प्रयोग करके भी उस दुर्बुद्धिको न समझा सके ॥ ६६ ॥

प्रवृत्तं तस्य तच्चक्रमधर्मनिरतस्य वै ।
परदाराभिलाषेण सद्यस्तात निवर्तितम् ॥ ६७ ॥

तात ! इतने समयमें अधर्ममें मग्न रहनेवाले उग्रायुधका प्रतापचक्र भी पर-स्त्रीकी कामना करनेसे तत्क्षण ही रुक गया ॥ ६७ ॥

न त्वहं तस्य जाने तन्निवृत्तं चक्रमुत्तमम् ।
हतं स्वकर्मणा तं तु पूर्वं सद्भिश्श्च निन्दितम् ॥ ६८ ॥

उसका उत्तम चक्र निवृत्त हो गया है और पहले सत्पुरुषोंसे निन्दित होकर वह अपने कर्मोंद्वारा ही मर गया है; इस बातको मैं नहीं जानता था ॥ ६८ ॥

कृतशौचः शरी चापी रथी निष्क्रम्य वै पुरात् ।
कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः प्रायोधयमहं रिपुम् ॥ ६९ ॥

जब मैं अशौच-निवृत्तिके पश्चात् शुद्ध हुआ, तब ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर धनुष-बाण ले रथमें बैठ नगरसे बाहर निकला और शत्रुसे युद्ध करने लगा ॥ ६९ ॥

ततः संसर्गमागम्य बलेनास्त्रबलेन च ।
त्र्यहमुन्मत्तवद् युद्धं देवासुरमिवाभवत् ॥ ७० ॥

तदनन्तर उसके निकट पहुँचकर शरीर-बल और अस्त्र-बलके द्वारा देवासुर-संग्रामकी तरह तीन दिनोंतक हम दोनोंका उन्मत्त-सा युद्ध चलता रहा ॥ ७० ॥

स मयास्त्रप्रतापेन निर्दग्धो रणमूर्धनि ।
पपाताभिमुखः शूरस्त्यक्त्वा प्राणानरिंदम ॥ ७१ ॥

शत्रुदमन ! तत्पश्चात् मेरे अस्त्रके प्रतापसे भस्म होकर वह वीर रणके मुहानेपर अपने प्राणोंको त्यागकर गिर पड़ा ॥ ७१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तात काम्पिल्ये पृषतोऽभ्ययात् ।
हते नीपेश्वरे चैव हते चोग्रायुधे नृपे ॥ ७२ ॥
आहिच्छत्त्रं स्वकं राज्यं पित्र्यं प्राप महाद्युतिः ।
द्रुपदस्य पिता राजन् ममैवानुमते तदा ॥ ७३ ॥

तात ! इसी बीचमें (उग्रायुधद्वारा) नीपेश्वर तथा (मेरे द्वारा) राजा उग्रायुधके मारे जानेपर पृषतने भी काम्पिल्य नगरपर आक्रमण कर दिया। राजन् ! तब मेरी अनुमतिसे महाकान्तिमान् द्रुपदके पिताने अपने पैतृक राज्य अहिच्छत्रपर (पुनः) अधिकार कर लिया ॥ ७२-७३ ॥

ततोऽर्जुनेन तरसा निर्जित्य द्रुपदं रणे ।
आहिच्छत्त्रं सकाम्पिल्यं द्रोणायाथापवर्जितम् ॥ ७४ ॥

तदनन्तर अर्जुनने युद्धमें द्रुपदको बलपूर्वक जीतकर काम्पिल्य और अहिच्छत्रको द्रोणाचार्यके (चरणोंमें) समर्पित कर दिया था ॥ ७४ ॥

प्रतिगृह्य ततो द्रोण उभयं जयतां वरः ।
काम्पिल्यं द्रुपदायैव प्रायच्छद् विदितं तव ॥ ७५ ॥

तब विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ द्रोणने दोनों देशोंको लेकर काम्पिल्यनगर तो द्रुपदको ही वापस कर दिया था, जिसे तुम जानते ही हो ॥ ७५ ॥

एष ते द्रुपदस्यादौ ब्रह्मदत्तस्य चैव ह ।
वंशः कात्स्न्र्येन वै प्रोक्तो नीपस्योग्रायुधस्य च ॥ ७६ ॥

इस प्रकार मैंने तुमसे द्रुपद, ब्रह्मदत्त, नीप और उग्रायुधके वंशका पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया ॥ ७६ ॥