हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
by विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर)
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२ किलों पर अचानक चढ़ाई कर दी और बड़ी वीरता और निपुणता के साथ लड़ कर उन्हें हस्तगत कर लिया। बीजापुर की सेना पर—जो कि सेनापति अफ़ज़लखां की अध्यक्षता में लड़ रही थी—भली प्रकार दोहरी विजय पा कर मुग़लों का खुल्लमखुल्ला सामना करना आरम्भ कर दिया। शिवाजी अपनी चतुराई से कभी पीछे हटने और कभी अचानक शत्रुओं पर चढ़ आते थे। इस प्रकार अनेक मुग़ल सरदारों और सेनापतियों का दमन कर उन्हें लड़ाई में सब प्रकार से नीचा दिखा कर पीछे हटाते रहे। इस प्रकार शत्रुओं के दिल में इतना भय समा गया कि शाहंशाह औरङ्गज़ेब ने भी भयभीत होकर थोड़े काल के लिये युद्ध बन्द करने में ही अपनी बुद्धिमानी समझी और अपने अजयशत्रु शिवाजी को प्रलोभनादि द्वारा जाल में फंसाने का निश्चय किया। परन्तु शिवाजी औरङ्गज़ेब के कपटजाल में कब आने वाले थे ? उन्होंने शत्रु के कपट जाल को तोड़ दिया और उसकी आशा को सब प्रकार निराशा में पलट दिया अर्थात् आगरे के क़ैदख़ाने से बिना किसी हानि उठाये निकल भागे, और सकुशल रायगढ़ पहुंच कर मुग़लों से पुनः घोर लड़ाई छेड़ दी। शिवाजी ने सिंहनाद के दुर्ग को पुनः हस्तगत कर लिया। कई अन्य सेनापतियों ने भी मुसलमानों के छक्के छुड़ा कर यश प्राप्त किया। अन्त में शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करा कर हिन्दुओं का छत्रपति—अर्थात् हिन्दूधर्म और सभ्यता का अभिनेता—बनने में ही अपना हित समझा। विजयनगर के पतन के पश्चात् किसी भी हिन्दू-राजा को यह साहस न हुआ था कि वह स्वतन्त्र-छत्रपति के मुकुट से अपने सिर को पुनः सुशोभित करे। अब शिवाजी के नवीन राज्याभिषेक ने मुसलमानी धाक को समूल नष्ट कर दिया। इसके पश्चात् होने वाली किसी भी लड़ाई में मुसलमान हिन्दुओं का सामना न कर सके। उपरोक्त घटनायें स्वयम् उनके कार्यकर्त्ताओं के लिये भी आश्चर्य जनक थीं। उस समय के सब से प्रतिष्ठित और हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता