हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-६ ] द्रव्यविषयक परामर्श ८५ यतः,— अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते ? । उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति ॥ २ ॥ क्योंकि—अपनेसे नीचे नीचे (हीन) अर्थात् दरिद्रियोंको देख कर किसकी महिमा नहीं बढ़ती है ? अर्थात् सबको अभिमान बढ़ जाता है, और अपनेसे ऊपर ऊपर अर्थात् अधिक धनवानोंको देख कर सब लोग अपनेको दरिद्री समझते हैं ॥ २ ॥ अपरं च,— ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम् । शशिनस्तुल्यवंशोऽपि निर्धनः परिभूयते ॥ ३ ॥ और दूसरे-जिसके पास बहुत-सा धन है उस ब्रह्मघातक मनुष्यकाभी सत्कार होता है और चन्द्रमाके समान अतिनिर्मल वंशमें उत्पन्न हुएभी निर्धन मनुष्यका अपमान किया जाता है ॥ ३ ॥ अन्यच्च,— अव्यवसायिनमलसं दैवपरं साहसाच्च परिहीनम् । प्रमदेव हि वृद्धपतिं नेच्छत्युपगूहितुं लक्ष्मीः ॥ ४ ॥ और जैसे नवजवान स्त्री बूढ़े पतिको नहीं चाहती है वैसेही लक्ष्मीभी निरुद्योगी, आलसी, 'प्रारब्धमें जो लिखा है सो होगा' ऐसा भरोसा रख कर चुपचाप बैठने वाले, तथा पुरुषार्थ हीन मनुष्यको नहीं चाहती है ॥ ४ ॥ अपि च,— आलस्यं स्त्रीसेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम् । संतोषो भीरुत्वं षड् व्याघाता महत्त्वस्य ॥ ५ ॥ औरभी आलस्य, स्त्रीकी सेवा, रोगी रहना, जन्मभूमिका स्नेह, संतोष और डरपोकपन ये छः बातें उन्नतिके लिये बाधक हैं ॥ ५ ॥ यतः,— संपदा सुस्थितंमन्यो भवति स्वल्पयापि यः । कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति'तस्य ताम् ॥ ६ ॥ क्योंकि-जो मनुष्य थोड़ीही संपत्तिसे अपनेको सुखी मानता है, विधाता समाप्तकार्य मान कर उस मनुष्यकी उस संपत्तिको नहीं बढ़ाता है ॥ ६ ॥