हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context८६ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः ७- अपरं च,- निरुत्साहं निरानन्दं निर्वीर्यमरिनन्दनम् । मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥ ७ ॥ और निरुत्साही, आनन्दरहित, पराक्रमहीन तथा शत्रुको प्रसन्न करने वाले ऐसे पुत्रको कोई स्त्री न जने अर्थात् ऐसे पुत्रका जन्म न होनाही अच्छा है ॥७॥ तथा चोक्तम्,- अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेद्भवक्षयात् । रक्षितं वर्धयेत् सम्यग्वृद्धं तीर्थेषु निक्षिपेत् ॥ ८ ॥ जैसा कहा है—नहीं पाये धनके पानेकी इच्छा करना, पाये हुए धनकी चोरी आदि नाशसे रक्षा करना, रक्षा किये हुए धनको व्यापार आदिसे बढ़ाना और अच्छी तरह बढ़ाए धनको सत्पात्रमें दान करना चाहिये ॥ ८ ॥ यतो लब्धुमिच्छतोऽर्थयोगादर्थस्य प्राप्तिरेव । लब्धस्याप्यरक्षि- तस्य निधेरपि स्वयं विनाशः । अपि च, अवर्धमानश्चार्थः काले स्वल्पव्ययोऽप्यञ्जनवत्क्षयमेति । अनुपभुज्यमानश्च निष्प्रयोजन एव सः । क्योंकि लाभकी इच्छा करने वालेको धन मिलताही है, एवं प्राप्त हुए परंतु रक्षा नहीं किये गये खजानेकाभी अपने आप नाश हो जाता है, औरभी यह है कि-बढ़ाया नहीं गया धन कुछ कालमें थोड़ा थोड़ा व्यय हो कर काजलके समान नाश हो जाता है, और नहीं भोगा गया भी खजाना वृथा है । तथा चोक्तम्,- धनेन किं यो न ददाति नाश्नुते बलेन किं यश्च रिपून बाधते । श्रुतेन किं यो न च धर्ममाचरेत् किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत् ॥ ९ ॥ जैसा कहा है—उस धनसे क्या है ? जो न देता है और न खाता (उपभोग करता) है; उस बलसे क्या है ? जो वैरियाँको नहीं सताता है, उस शास्त्रसे क्या है ? जो धर्मका आचरण नहीं करता है; और उस आत्मासे क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है ॥ ९ ॥