हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१३ ] द्रव्यसंचय और पुरुषार्थकी प्रशंसा ८७ यतः,— जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः । स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ १० ॥ क्योंकि—जैसे जलकी एक एक बूंदके गिरनेसे धीरे २ घड़ा भर जाता है वही कारण सब प्रकारकी विद्याओंका, धनका और धर्मकाभी है ॥ १० ॥ दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै । स कर्मकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति' ॥ ११ ॥ दान और भोगके बिना जिसके दिन जाते हैं वह लुहारकी धोंकनीके समान सांस लेता हुआभी मरेके समान है ॥ ११ ॥ इति संचिन्त्य नन्दकसंजीवकनामानौ वृषभौ धुरि नियोज्य शकटं नानाविधद्रव्यपूर्णं कृत्वा वाणिज्येन गतः कश्मीरं प्रति । यह सोच कर नन्दक और संजीवक नाम दो बैलोंको जुएमें जोत कर और छकड़ेको नाना प्रकारकी वस्तुओंसे लाद कर व्यापारके लिये काश्मीरकी ओर गया। अन्यच्च,— अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य च संचयम् । अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद्दानाध्ययनकर्मसु ॥ १२ ॥ और दूसरे—काजलके क्रम क्रमसे घटनेको और वल्मीक नाम चींटीके संच- यको देख कर, दान, पढ़ना और कामधंधामें दिनको सफल करना चाहिये ॥१२॥ यतः,— कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ? । को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ? ॥ १३ ॥ क्योंकि—बलवानोंको अधिक बोझ क्या है ? और उद्योग करने वालोंको क्या दूर है ? और विद्यावानोंको विदेश क्या है ? और मीठे बोलने वालोंका शत्रु कौन है ? ॥ १३ ॥ अथ गच्छतस्तस्य सुदुर्गनाम्नि महारण्ये संजीवको भग्नजानु- र्निपतितः । फिर उस जाते हुएका, सुदुर्ग नाम घने वनमें, संजीवक घुटना टूटनेसे गिर पडा ।