हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-४१ ] सेवाधर्मकी निन्दा और पराक्रमकी प्रशंसा ९७ औरभी-जिसके जीनेसे बहुतसे लोग जिये वह तो सचमुच जिया, और यों तो काकभी क्या चोंचसे अपना पेट नहीं भर लेता है ? ॥ ३७ ॥ पश्य,— पञ्चभिर्याति दासत्वं पुराणैः कोऽपि मानवः । कोऽपि लक्षैः कृती कोऽपि लक्षैरपि न लभ्यते ॥ ३८ ॥ देख-कोई मनुष्य पांच पुराण में दासपनेको करने लगता है, कोई लाख में करता है और कोई एक लाखमेंभी नहीं मिलता है ॥ ३८ ॥ अन्यच्च,— मनुष्यजातौ तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तत्रापि स किं जीवत्सु गण्यते ? ॥ ३९ ॥ और दूसरे-मनुष्योंको समान जातिमें सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकोंमेंभी जो प्रथम अर्थात् सबका मुखिया नहीं है क्या वह जीते हुओंमें गिना जा सकता है ? अर्थात् उसका जीना और मरना समान है ॥ ३९ ॥ तथा चोक्तम्,— वाजिवारणलोहानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम् ॥ ४० ॥ जैसा कहा है-घोड़ा, हाथी, लोहा, काष्ठ, पत्थर, वस्त्र, स्त्री, पुरुष और जल इस प्रत्येकमें बड़ा अन्तर है ॥ ४० ॥ तथा हि, स्वल्पमप्यतिरिच्यते । और उसी प्रकार-थोड़ा बहुतभी गिना जाता है. स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थिकं श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न भवेत्तस्य क्षुधः शान्तये । सिंहो जम्बुकमङ्कगं तमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं, सर्वः कृच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥४१॥ कुत्ता थोड़ी नस तथा चरबीसे मलिन विना मांसकी हड्डीको पा कर उसीमें संतोष कर लेता है, कुछ उससे उसकी भूख दूर नहीं होती है; और सिंह गोदमें आये हुए सियारको भी छोड़ कर हाथीको मारता है इसलिये सब प्राणी क्लेशको सह कर भी अपने पराक्रमके अनुसार फलकी इच्छा करते हैं ॥ ४१ ॥ १ पुराण=८० कौडी याने एक पैसा; ६४ कौडीका एक पैसा माना जाता है. हि० ७