हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context९८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४२- अपरं च, सेव्यसेवकयोरन्तरं पश्य,— लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च । श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥ ४२ ॥ और दूसरे—स्वामी और सेवकका भेद देखो-कुत्ता, टुकड़ा देने वालोंके सामने पूंछको हिलाता है, उसके चरणोंमें गिरता है, धरती पर लेट कर अपना मुख और पेट दिखाया करता है, परन्तु श्रेष्ठ हाथी तो स्वामीको धीरजसे देखता है, और सौ सौ उपाय करनेसे खाता है ॥ ४२ ॥ किंच,— यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यै- र्विज्ञानविक्रमयशोभिरभज्यमानम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४३ ॥ और शास्त्रज्ञान, पराक्रम, तथा यशसे विख्यात होकर जो मनुष्य क्षणभर भी जीते हैं, उसी जीनेको इस दुनियामें पण्डित लोग सफल कहते हैं, और यों तो काकभी बहुत दिन तक जीता है और खुराक खाता है ॥ ४३ ॥ अपरं च,— यो नात्मजे न च गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च बन्धुवर्गे । किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४४ ॥ और दूसरा—जो न पुत्र पर, न गुरु पर, न सेवकों पर, और न दीन बांधवों पर दया करता है उसके जीनेके फलसे मनुष्यलोकमें क्या है, और यों तो काकभी बहुत काल तक जीता है और बलि खाता है अर्थात् केवल पेट भरनाही जीवनका फल नहीं है ॥ ४४ ॥