हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-४७] मनुष्यकी उन्नति और अवनति ९९ अपरमपि, — अहितहितविचारशून्यबुद्धेः श्रुतिसमयैर्बहुभिस्तिरस्कृतस्य । उदरभरणमात्रकेवलेच्छोः पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः ?' ॥ ४५ ॥ औरभी-हित और अहितके विचार करनेमें जडमति वाला, और शास्त्रके ज्ञानसे रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट भरनेकी ही रहती है, ऐसा पुरुषरूपी पशु और सचमुच पशुमें कौनसा अन्तर समझा जा सकता है ? अर्थात् ज्ञानहीन एवं केवल भोजनकी इच्छा रखने वालेसे घास खाकर जीने वाला पशु अच्छा है ॥ ४५ ॥ करटको ब्रूते—'आवां तावदप्रधानौ। तदप्यावयोः किमनया विचारणया ?'। दमनको ब्रूते—'कियता कालेनामात्याः प्रधा- नतामप्रधानतां वा लभन्ते । करटक बोला-'हम दोनों मंत्री नहीं हैं फिर हमें इस विचारसे क्या ?' दमनक बोला-'कुछ कालमें मंत्री प्रधानता वा अप्रधानताको पाते हैं । यतः,— न कस्यचित्कश्चिदिह स्वभावा- द्भवत्युदारोऽभिमतः खलो वा । लोके गुरुत्वं विपरीततां वा स्वचेष्टितान्येव नरं नयन्ति ॥ ४६ ॥ क्योंकि—इस दुनियामें कोई किसीका स्वभावसे अर्थात् जन्मसे सुशील अथ- वा दुष्ट नहीं होता है; परन्तु मनुष्यको अपने कर्मही बड़पनको अथवा नीचपन- को पहुंचाते हैं ॥ ४६ ॥ किंच,— आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । निपात्यते क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः ॥ ४७ ॥ और जैसे पर्वत पर बड़े यत्नसे पाषाणकी सिला चढ़ाई जाती है और छिनभ- रमें ढुलका दी जाती है वैसेही मनुष्यके चित्तकी वृत्तिभी गुण और दोषमें लगाई और हटा ली जाती है अर्थात् मनुष्यकी उन्नति कठिनतासे और अवनति सहज- में हो सकती है ॥ ४७ ॥