हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context१५२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १७७- अपरं च,— भूम्येकदेशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमवतः प्रणाशः । भृत्यप्रणाशो मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा, न भृत्याः' ॥ १७७ ॥ और दूसरे—राज्यके एक टुकड़ेका और बुद्धिमान् तथा गुणवान् सेवकका इन दोनोंके नाशसे भी राजाओंको सेवकका नाश मरणके समान है, क्योंकि भूमि नष्ट हुईभी सहजमें मिल सकती है परन्तु सेवक नहीं मिल सकते हैं' ॥ १७७ ॥ दमनको ब्रूते—'स्वामिन् ! कोऽयं नूतनो न्यायो यदरातिं हत्वा संतापः क्रियते ? दमनक बोला—'स्वामी ! यह कोनसा नया न्याय है कि शत्रुको मार कर पछ- तावा करते हो ? तथा चोक्तम्,— पिता वा यदि वा भ्राता पुत्रो वा यदि वा सुहृत् । प्राणच्छेदकरा राज्ञा हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ १७८ ॥ जैसा कहा है—संपत्तिको चाहने वाले राजाको प्राणका नाश करने वाला पिता हो, या भाई हो, पुत्र हो, अथवा मित्र हो, मार देना चाहिये ॥ १७८ ॥ अपि च,— धर्मार्थकामतत्त्वज्ञो नैकान्तकरुणो भवेत् । न हि हस्तस्थमप्यन्नं क्षमावान् भक्षितुं क्षमः ॥ १७९ ॥ और भी—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनके सारको जानने वाले पुरुषको अत्यंत दयालु नहीं होना चाहिये; क्योंकि क्षमाशील पुरुष हाथ पर रक्खे हुए भी भोजनको नहीं खा सकता है ॥ १७९ ॥ किं च,— क्षमा शत्रौ च मित्रे च यतीनामेव भूषणम् । अपराधिषु सत्त्वेषु नृपाणां सैव दूषणम् ॥ १८० ॥ और—शत्रु तथा मित्र पर क्षमा करना केवल तपस्वियोंका ही भूषण है, और राजाओंका अपराध करने वाले प्राणियों पर क्षमा करना तो दूषणही है ॥१८०॥