हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context-१८३ ] दयालु राजा और लोभी ब्राह्मणकी निंदा १५३ अपरं च,— राज्यलोभादहंकारादिच्छतः स्वामिनः पदम् । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं जीवोत्सर्गो न चापरम् ॥ १८१ ॥ और दूसरे-राज्यके लोभसे अथवा अहंकारसे स्वामीके पदको चाहने वाले सेवकका, उस पापको नाश करनेमें प्राणोंका त्यागही एक प्रायश्चित्त है, और दूसरा कोई नहीं है ॥ १८१ ॥ अन्यच्च,— राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षः स्त्री चावशा दुष्प्रकृतिः सहायः । प्रेष्यः प्रतीपोऽधिकृतः प्रमादी त्याज्या इमे यश्च कृतं न वेत्ति ॥ १८२ ॥ और अत्यन्त दयालु राजा, सर्वभक्षी अर्थात् अत्यंत लोभी ब्राह्मण, अवश स्त्री, बुरी प्रकृति वाला सहायक, उत्तर देने वाला नोकर, असावधान अधिकारी, और पराये उपकारको नहीं मानने वाला—ये त्यागनेके योग्य हैं ॥ १८२ ॥ विशेषतश्च,— सत्यानृता सपरुषा प्रियवादिनी च हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या । नित्यव्यया प्रचुररत्नधनागमा च वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा' ॥ १८३ ॥ और विशेष करके-राजाकी नीति, कभी सच्ची, कभी झूठी, कभी कड़ी, कभी नरम, कभी हिंसा करने वाली, कभी दयालु, कभी धन लेने वाली, कभी उदार, कभी सदा व्यय करने वाली, कभी अनेक रत्न और धनको इकठ्ठा करने वाली, वेश्याके समान बहुत प्रकारकी है' ॥ १८३ ॥ इति दमनकेन संतोषितः पिङ्गलकः स्वां प्रकृतिमापन्नः सिंहासने समुपविष्टः । दमनकः प्रहृष्टमनाः 'विजयतां महाराजः, शुभमस्तु सर्वजगताम्' इत्युक्त्वा यथासुखमवस्थितः । इस प्रकार जब दमनकने संतोष दिलाया तब पिंगलकका जीमें जी आया और सिंहासन पर बैठा । दमनक प्रसन्न चित्त हो कर "जय हो महाराजकी, सब संसारका कल्याण हो" यह कह कर आनन्दसे रहने लगा ।