हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in contextहितोपदेशः भाषानुवादसमलंकृतः ꩜ प्र स्ता वि का सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः । जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला ॥ १ ॥ जिन्होंके ललाटपर चन्द्रमाकी कला गंगाजीके फेनकी रेखाके समान शोभाय- मान है उन चन्द्रशेखर महादेवजीकी कृपासे साधुजनोंका मनोरथ सिद्ध होय ॥ १ ॥ श्रुतो हितोपदेशोऽयं पाटवं संस्कृतोक्तिषु । वाचां सर्वत्र वैचित्र्यं नीतिविद्यां ददाति च ॥ २ ॥ यह हितोपदेश नामक ग्रंथ सुना हुआ ( सुननेसे ) संस्कृतके बोलने-चालनेमें चतुरताको, सब विषयोंमें वाक्योंकी विचित्रताको और नीतिविद्याको देता है ॥ २ ॥ अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ ३ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अपनेको कभी बूढ़ा न होऊँगा और कभी न मरूँगा ऐसा जानकर विद्या और धनसंचय का विचार करे, मृत्युने चोटीको आ पकड़ा है ऐसा सोच कर धर्म करे ॥ ३ ॥ सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । अहार्यत्वादनर्घ्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥ ४ ॥ पण्डित लोग सब कालमें ( कभी ) चौरादिकोंसे नहीं चुराये जानेसे, अनमोल होनेसे और कभी क्षय न होनेसे, सब पदार्थोंमेंसे उत्तम पदार्थ विद्याकोही कहते हैं ॥ ४ ॥