हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context२ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ५- संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५ ॥ जैसे नीच अर्थात् तुच्छ तृणादिसे मिलनेवाली नदी उस तृणादिकको अथाह समुद्रसे जा मिलाती है, उसी प्रकार विद्याभी नीच पुरुषको प्राप्त (वश) होकर राजासे जा मिलाती है, फिर सौभाग्य का उदय कराती है ॥ ५ ॥ विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥ ६ ॥ विद्या मनुष्यको नम्रता देती है और नम्रतासे योग्यता, योग्यतासे धन, धनसे धर्म, फिर धर्मसे सुख पाता है ॥ ६ ॥ विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये । आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥ ७ ॥ शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दोनों आदर करानेवाली हैं परंतु पहली अर्थात् शस्त्रविद्या बुढ़ापेमें “पुरुषार्थ न होनेसे” हँसी कराती है और दूसरी अर्थात् शास्त्रविद्या सदैव आदर कराती है ॥ ७ ॥ यन्नवे भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् । कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते ॥ ८ ॥ जैसे मृत्तिकाके कोरे बर्तनमें जिस वस्तुका संस्कार पहले होजाता है और पीछे वह उसमेंसे नहीं जाता है; उसी प्रकार मैं इस हितोपदेश ग्रन्थमें कथाके बहानेसे बालकों के लिये नीति कहता हूँ ॥ ८ ॥ मित्रलाभः सुहृद्भेदो विग्रहः संधिरेव च । पञ्चतन्त्रात्तथाऽन्यस्माद्ग्रन्थादाकृष्य लिख्यते ॥ ९ ॥ पंचतन्त्र तथा अन्य अन्य नीतिशास्त्रके ग्रन्थोंसे आशय लेकर, १ मित्रलाभ, २ सुहृद्भेद, ३ विग्रह और ४ सन्धि, ये चार भाग बनाये जाते हैं ॥ ९ ॥ अस्ति भागीरथीतीरे पाटलिपुत्रनामधेयं नगरम् । तत्र सर्व- १ यहां मनुष्य और तृणकी, विद्या और नदीकी, समुद्र और राजाकी समानता है. २ बालकोंका बचपन कोरे बर्तनके समान है. यदि इसमें कहानियोंके बहानेसे विद्याका संस्कार हो जाय तो वे जन्मपर्यंत शास्त्रसे विमुख न होंगे।