हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
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Read in context४ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका १४- वार दुःखके करने वाले हैं. अंतिममें क्षण-क्षणमें (हमेशा) दुःख देता है ॥ १३ ॥ किंच,— वरं गर्भस्रावो वरमपि च नैवाभिगमनं वरं जातः प्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता । वरं वंध्या भार्या वरमपि च गर्भेषु वसति- र्न चाऽविद्वान् रूपद्रविणगुणयुक्तोऽपि तनयः ॥ १४ ॥ और गर्भका गिर पड़ना, स्त्रीका संसर्ग न करना, उत्पन्न होकर मर जाना, कन्याका होना, स्त्रीका बाँझ रहना, अथवा उसके गर्भमेंही रहना अच्छा है, परन्तु सुन्दरता तथा सुवर्णके आभूषणोंसे युक्त भी मूर्ख पुत्र होना अच्छा नहीं ॥ १४ ॥ किंच,— स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ? ॥ १५ ॥ और जिस पुत्रके उत्पन्न होनेसे वंशकी बड़ाई हो, वह जानों उत्पन्न हुआ, नहीं तो इस असार संसारमें मरकर कौन मनुष्य उत्पन्न नहीं होता है ? अर्थात् बहुत-से होते हैं और बहुत-से मरते हैं ॥ १५ ॥ गुणिगणगणनारम्भे न पतति कठिनी सुसंभ्रमाद्यस्य । तेनाम्बा यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी नाम ॥ १६ ॥ गुणियोंकी गिनतीके आरंभमें जिसका नाम गौरवपूर्वक खडियासे नहीं लिखा जाय, ऐसे पुत्रसे जो माता पुत्रवती कहलावे तो कहो बाँझ कैसी होती है ? अर्थात् जिसका पुत्र निर्गुणी है वही सचमुच बाँझ है ॥ १६ ॥ अपि च,— दाने तपसि शौर्ये च यस्य न प्रथितं मनः । विद्यायामर्थलाभे च मातुरुच्चार एव सः ॥ १७ ॥ और भी कहा है कि—दानमें, तपमें, शूरतामें, विद्याके पढ़नेमें और धनके लाभमें जिसका मन नहीं लगा वह पुत्र अपनी माताके मलमूत्रके समान वृथा है ॥ १७ ॥ १ मूर्ख.