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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages

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-२३ ] गुणवान् और मूर्ख पुत्रकी समीक्षा ५ अपरं च,- वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि । एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणा अपि ॥ १८ ॥ और दूसरे-गुणी एकही पुत्र अच्छा परंतु मूर्ख सौ अच्छे नहीं, क्योंकि अकेला चन्द्रमा अंधेरेको दूर कर देता है किंतु अनेक तारोंके समूह भी नहीं कर सकते हैं ॥ १८ ॥ पुण्यतीर्थे कृतं येन तपः क्वाप्यतिदुष्करम् । तस्य पुत्रो भवेद्वश्यः समृद्धो धार्मिकः सुधीः ॥ १९ ॥ जिस मनुष्यने किसी पुण्य तीर्थमें अतिकठिन तप किया है, उसीका पुत्र आज्ञाकारी, धनवान्, धर्मशील और पंडित होता है ॥ १९ ॥ अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥ २० ॥ हे राजा ! नित्य धनका लाभ, आरोग्य, प्रियतमा और मधुरभाषिणी स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धनका लाभ कराने वाली विद्या, ये संसारमें छः सुख हैं ॥ को धन्यो बहुभिः पुत्रैः कुशूलापूरणाढकैः ? । वरमेकः कुलालम्बी यत्र विश्रूयते पिता ॥ २१ ॥ कुशूल नाम पात्रोंसे भरेजाने वाले, अनाज रखनेके आढक नाम पात्रोंके समान अर्थात् बहुत भोजन करने वाले पुत्रोंसे कौन बड़ाई पाता है ? परंतु जिसके उत्पन्न होनेसे पिता संसारमें विख्यात हो ऐसा कुलदीपक एकही पुत्र अच्छा है ॥ २१ ॥ ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता च व्यभिचारिणी । भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः ॥ २२ ॥ ऋणकर्ता पिता, व्यभिचारी याने बदचलन माता, अत्यंत सुन्दर स्त्री और मूर्ख पुत्र ये चारों शत्रुके समान हैं ॥ २२ ॥ अनभ्यासे विषं विद्या अजीर्णे भोजनं विषम् । विषं सभा दरिद्रस्य वृद्धस्य तरुणी विषम् ॥ २३ ॥